अच्छा बुरा दोनों बताओ…………

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काशीनाथ

कोई चीज पूरी अच्छी नहीं होती, तो पूरी बुरी भी नहीं होती। कहीं न कहीं बहुत बुराई में भी अच्छाई छिपी होती है। इसलिए हर बात,घटना,वस्तु, कर्म, निर्णय, हालात के दोनों पहलू और पक्ष को जानकर नजरिया बनाया जाना ठीक होता है। दो दिन से आपात काल को लेकर सोशल मीडिया, मीडिया, समाचारों में सियासी बहस चल रही है। 43 बरस बाद भी उसे प्रासंगिक बनाए रखा गया है। गैर कांग्रेस दलों के लिए आपातकाल एक ऐसा औजार जिसे दिखाकर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा किया जा सकता है। कांग्रेस इसे सुनकर थोड़ा असहज भी होती है। मजे की बात यह है कि आपातकाल के कथित कष्ट, कथित दमन, कथित अत्याचार,कथित बर्बरता, कथित तानाशाही और एकछत्र राज को देखने, समझने और महसूस करने वाले सब इस समय 55 पार ही हैं। जो 130 करोड़ आबादी में 30-32 फीसदी ही होंगे। अब 18 से 30 के बीच की उम्र वाले देश की 60-65 फीसदी आबादी के लिये इमरजेंसी किस्से-कहानी जैसी है। जिसे प्रेमचंद और तुलसीराम की किस्सागोई के अलग अंदाज और समझ में सुना जा सकता है। देश में बड़े परिवर्तन का आधार बनी इमरजेंसी के अच्छे-बुरे दोनों पक्षों पर चर्चा की जाना चाहिए। 25-26 जून 1975 की दरम्यानी रात को राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा की। 26 जून 1975 की सुबह देश इमरजेंसी में उठा। वह जब सो रहा था तब आपातकाल लगाने के दस्तावेज पर राष्ट्रपति ने दस्तखत किए। आज 43 बरस हो गए। 26 जून 1975 से 17 जनवरी 1977 (19 माह) तक इमरजेंसी रही। इस दौरान सत्ता ने वह सब किया जिसे निरंकुश सत्ता कहा जा सकता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने सभी विरोधियों को जेल में बंद कर दिया। जो राजनीतिक विरोधी हुआ वह प्रताडऩा का शिकार भी हुआ। बोलने की आजादी, विरोध का अधिकार, व्यवस्था की मुखालफत के अधिकार छीन लिए गए। समाचार संस्थानों पर सेंसरशिप लागू हो गई। जबरन नसबंदी कर लोगों के साथ ज्यादती की गई। लोकतंत्र जैसी कोई बात दूर-दूर तक नहीं थी। यहां तक की सारे विपक्षी नेता गिरफ्तार होने से संसद भी इकतरफा हो गई। संविधान में कुछ संशोधन हुए, जो इंदिरा गांधी को राहत देने के लिए किए गए। आपातकाल की घोषणा के साथ ही अखबारों ने भी तीखा विरोध किया। इसके बाद की सेंसरशिप और कष्ट भी उठाए। यह वह किस्से हैं जो इमरजेंसी की भयावह तस्वीर सामने लाते हैं। दूसरा पहलू यह है कि 26 जून 1975 से 18 जनवरी 1977 तक देश की सबसे लचर रेल व्यवस्था सही समय पर रही। ट्रेनें इतने समय चलीं की घड़ी मिला लो। बसें समय पर। मुनाफाखोर और सूदखोर जेल में। जो बाहर रह गए वे ईमनादारी के बुत बन गए। दफ्तरों के खुलने का समय दुरुस्त, आफिस के सामने के चाय पान के टपरों पर बाबुओं की धींगामुश्ती बंद। साहब से लेकर चपरासी तक अपनी जगह पर मुस्तैद। उधर जनता ने दरख्वास्त दी और काम शुरू। यह कहा जा सकता है कि आपातकाल आजाद भारत का वह दौर भी है जब भ्रष्टाचार सबसे न्यूनतम स्तर पर था। उसकी शिकायत पर कार्रवाई का आंकड़ा भी सबसे ऊपर होगा। दूसरे अपराध सर्वाधिक नियंत्रण में। अपराधियों की धरपकड़ भी सबसे अधिक ही रही। मौजूदा दौर में हम अपनी नौजवान पीढ़ी को इमरजेंसी के बारे में बताना चाहते हैं तो दोनों पहलुओं को बराबरी से उसके सामने रखना चाहिए। इमरजेंसी को लेकर देश में इस बात की चर्चा भी होना चाहिए कि और क्या मिला आपातकाल से। कष्ट, दमन, नसबंदी, वृक्षारोपण पर बहस और चित्रण अलग बात है। इमरजेंसी ने देश को जगाया, सिखाया भी। चुप रहने और सहने वाली जनता को बोलने, लिखने और पढऩे की आजादी का एहसास इमरजेंसी से ही हुआ। धर्म की समानता-स्वतंत्रता समझ आई। सरकार के विरोध की हिम्मत, अत्याचार के खिलाफ उठाने का सलीका समझ आया । वोट का अधिकार और उससे सरकार को उखाड़ फेंकने की ताकत का अहसास भी इमरजेंसी करा गई। जब उसने एक तरह से अजेय इंदिरा गांधी को भी चुनाव हरा दिया। यह इंदिरा के लिये लोकतंत्र की शक्ति का पाठ था। 43 बरस बाद इसके हर घटनाक्रम, तौर तरीकों, सरकारी कामकाज, व्यवस्था, प्रशासन, अनुशासन, सत्ता और राजनीति पर भी बहस की जाना चाहिए। यह नहीं माना जाए कि जो विपक्षी थे और जेल गए थे। वे सब सही बोल रहे हैं। उनका बताया ही सब कुछ है। इंदिरा गांधी के 25-26 जून 1975 की दरम्यानी रात के निर्णय की निंदा होना चाहिए। तभी 18 जूनवरी 1977 के ऐलान कि देश में चुनाव होंगे की तारीफ भी होना चाहिए। यह लोकतंत्र पर भरोसे की निशानी है। 16 और 20 जनवरी 1980 में सत्ता में धमाकेदार वपासी कर ली। यह भी याद रखना होगा कि अगर इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा जैसा नारा देने वाले देवकांत बरूआ कांग्रेस अध्यक्ष थे। तो अपने आप की देश से तुलना मत कीजिए, भारत अविनाशी है, आप नहीं। जैसी ललकार लगाने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण भी थे। इसलिए जरूरी है कि युवा पीढ़ी के सामने इमरजेंसी हो या इतिहास सारी बात के हर पहलू, अच्छाई-बुराई को बिना लाग लपेट के रखें। फैसला उसे करने दें। अपने आग्रह, दुराग्रह न थोपें। आपातकाल के मीसाबंदी पेंशन और सुविधाओं के हकदार हैं या नहीं इसका फैसला भी जनता से करा लें। यह भी तो बिना जनता की राय और सहमति पर ही मिल रही है। क्या इसे तानाशाही, अलोकतांत्रिक और जनता पर अत्याचार न माना जाए। विचार करें, मनन करें और सार्वजनिक बहस करें।