सियासत में सुतंगेबाजी का सैलाब…

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राघवेंद्र सिंह/

सियासत में सुतंगेबाजी का दौर खूब चल रहा है। पहले गप और सुतंगे यदा कदा और छोटे किस्म के लीडर किया करते थे। मगर अब लगता है झूठ सुतंगे जुमले गप और आसमानी सुल्तानी वादे के बिना पालिटिक्स कलरफुल नहीं दिखती। अगर मौसम चुनाव का हो तो फिर इन तमाम बातों की न केवल घटाएं घनघोर होती हैं बल्कि जमकर बरसती भी हैं। उसकी रेलमपेल में अच्छे अच्छे समझदार वोटर और उनके समूह डूबते उतराते दिखते हैं।चुनाव तक जनता खूब देखेगी गप्पों के तीर। क्योंकि वोट मांगने आएंगे हर पार्टी के घोषणावीर।
यही वजह है कि हालात को भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष ने 2017 अगस्त में ही ताड़ लिया था। इसलिए अमित शाह ने मध्यप्रदेश विधानसभा की 230 सीटों में से दो सौ पार का नारा उछाल दिया था। अब कांग्रेस इससे बड़ा कोई सुतंगा लाए तभी गप्पों के दौर में वह अपने विरोधियों को मात दे पाएगी। फिलवक्त मतलब 6 जून को राहुल गांधी ने मंदसौर में एक जुमला उछाला है। हम सरकार में आए तो दस दिन में किसानों का कर्जा माफ कर देंगे। अलग बात है कि किसान कह रहा है उसे मजबूर नहीं मजबूत बनाईये। मतलब कृषि उत्पाद का समर्थन नहीं बाजार मूल्य चाहिए। ऐसे मुद्दों पर कोई भी दल दमदारी से अमल नहीं कर रहा है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सज्जनता और भलमनसाहत पर शायद ही कोई संदेह करे लेकिन वादे और घोषणाओं के मामले में अब तक वे अपनी पार्टी के भीतर और बाहर सबसे बढ़त बनाए हुए हैं। यही कारण है कि उनके पास कोई भी जरूरतमंद और वोटों के समूह के मुकद्दम पहुंच जाए तो वे आसमान से तारे लाने की मांग पर भी हामी में सिर जरूर हिला देंगे। एक जमाने में मध्यप्रदेश के एक मुख्यमंत्री ऐसे भी थे जिनकी शराफत और सौजन्यता के मुरीद विरोधी भी होते थे। एक ही मामले में कोई चाहे तो उनसे दो तरह की सिफारिश करा सकता था। जैसे किसी का तबादला रुकवाना हो तो चाहो तो बाद में दूसरे आवेदन पर रवानगी के लिए भी मंजूरी ले लें। तब एक कार्टूनिस्ट ने वोरा जी की इस सीधे पन के बारे में लिखा था अगर वे महिला होते तो हमेशा गर्भवती होते। क्योंकि वे कभी मना ही नहीं करते। ऐसे ही अब राजनीति में आने वाली पौध पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक के चुनाव में जीत हासिल करने के लिए कोई भी वादा कर सकती है और किसी भी स्तर का सुतंगा छोड़ सकती है। अलग बात है कि अब सुतंगेबाजी करने वाले ग्राम पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक पावर में है। जो पार्टी सत्ता में होती है अक्सर ये तमगा उसके माथे पर चस्पा हो जाता है। जाहिर है कि इन दिनों भाजपा हुकुमत में है तो ये मैडल उसके खाते में है। हमने पहले भी जिक्र किया है मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की घोषणाओं का। करीब पन्द्रह हजार घोषणाएं ऐसी हैं जिनपर अमल होना बाकी है। अफसरों के मुताबिक सीएम ने जो कहा है उसे पूरा करने के लिए एक और बजट की जरूरत पड़े तो अतिशंयोक्ति नहीं होगी। इसके बाद भी अगर मुख्यमंत्री से पूछा जाए तो वो कहेंगे अभी भी कुछ कसर बाकी रह गई है।
सत्ता में आने के लिए बेचैन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का यह ऐलान पार्टी सत्ता में आई तो किसानों का कर्जा दस दिन में माफ । फिर एक सियासी सुतंगे की तरफ ध्यान खींचता है। हम यह नहीं कहते कि कांग्रेस सरकार में नहीं आ सकती। यह तो वोटर ही तय करेगा। मगर कहां माननीय अमित शाह का लक्ष्य अबकी बार दो सौ पार। इस हिसाब से राहुल बाबा का कर्ज माफी का गणित कितना कारगर होगा यह तो नतीजे ही बताएंगे। लेकिन भाजपा की तरह कांग्रेस ने भी जीतने वाले नेता को ही चुनाव लड़ाने की रणनीति बनाई है। मसलन भाजपा के बागियों की कांग्रेस में पौ बारह हो सकती है। कहा जा रहा है कि लगभग सौ भाजपा विधायकों की टिकट कट सकते हैं। ऐसे में आधे नेताओं का कांग्रेस दामन थामना भी एक सुतंगे के मुताबिक तय माना जा रहा है। और जिन्हें टिकट नहीं मिलेगा वे भी कह रहे हैं अबकी बार जीते भलें ही न नेतृत्व को बता देंगे हम हराने का माद्दा तो रखते हैं। अलग बात है कि भाजपा अपने कैडर को छोड़ 2013 के चुनाव में कांग्रेस के नेताओं को टिकट देकर चुनाव जीत चुकी है। होशंगाबाद लोकसभा से राव उदय प्रताप सिंह, भागीरथ प्रसाद भिण्ड से। इसी तरह विधानसभा चुनाव में कांग्रेस छोड़कर आए संजय पाठक,नारायण त्रिपाठी जैसे नेताओं के नाम भाजपा की सूची में शामिल हैं। इनमें धनबल और बाहुबल में श्रेष्ठ माने गए संजय पाठक ने तो तमाम विरोधों और कैडर की दुहाई के बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ मंच भी साझा किया था। भाजपा में ऐसा भाग्य हर किसी का नहीं माना जाता। इस तरह के मामले तब तूफान में बदलने की संभावना लेने लगे जब अमित शाह ने कहा कि दो सौ पार के लिए कांग्रेस के जिताऊ उम्मीदवार भी तोड़ने पड़ें तो यह सहर्ष किया जाना चाहिए।

मध्यप्रदेश यात्रा के दौरान भाव शून्य और खिंचा हुआ चेहरा लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सबका ध्यान अपनी तरफ बार बार खींचा है। लेकिन दो दिन पहले प्रदेश की इंदौर यात्रा के दौरान लोगों ने मोदी के चेहरे पर थोड़ी ही सही मुस्कुराहट जरूर देखी है। अक्सर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा खूबसूरत फूलों से भरे गुलदस्ता देने और उसके बाद यह कहने पर भी कि मोदी भारत के लिए भगवान का दिया हुआ वरदान है। सुनकर भी लोगों ने मोदी को मुस्कुराते हुए नहीं देखा था। स्वच्छता में देश में प्रथम आए इंदौर में जब मोदी आए तो वे मुस्कुराए भी और थोड़ा हंसे भी। इस थोड़ी सी खुशी के पीछे लोगों ने कहा शायद मोदी का दिल अगले लोकसभा चुनाव में इंदौर से मैदान में उतरने का तो नहीं है। यूपी में बीजेपी के विरुद्ध महागठबंधन चुनाव लड़ता है तो बनारस में मोदी को मुश्किल हो सकती है। ऐसे में मध्यप्रदेश की इंदौर और भोपाल सीट भाजपा के इस महानायक के मिजाज के हिसाब से मुफीद लगती है। इंदौर होलकर की मराठा रियासत का केन्द्र होने के साथ मालवा का गढ़ भी है। यहां से लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा ताई सांसद हैं । उनके स्थान पर भाजपा में मोदी का नाम आने से किसी को दिक्कत भी नहीं होगी। इंदौर में मोदी के स्वागत के लिए लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन, राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह, महापौर मालिनी लक्ष्मण गौड़, राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय और महिला बाल विकास अर्चना चिटनीस भी मौजूद थीं।
(लेखक IND24 न्यूज समूह के प्रबंध हैं)