हाय…. मेरा ‘स्मार्ट’ तीन साल बाद भी कुपोषित है…….

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ज़हीर अंसारी
आज ‘स्मार्ट’ का जन्मदिन है। वह पूरे तीन साल का हो गया है। ‘स्मार्ट’ के तीसरे जन्मदिन का जश्न मनाने कोई प्रोग्राम इस बार आयोजित नहीं किया गया। पिछले साल के प्रोग्राम में ‘स्मार्ट’ को आशीर्वाद देने और ‘स्मार्ट’ की स्मार्ट्नेस की तारीफें करने दादा, ताऊ, चाचा, मामा, मौसी और बुआ वग़ैरह के साथ ऐहले-ख़ानदान इकट्ठा हुए थे।

आपको याद ही होगा कि तीन साल पहले ‘स्मार्ट’ का जन्म टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक से हुआ था। ‘स्मार्ट’ के 99 भाई और थे जिन्हें डिलेवरी कराने वाले डाक्टर ने मुल्क के अलग शहरों में भेज दिया था, ताकि सबका ठीक तरह से लालन-पालन हो सके।

अपने ‘स्मार्ट’ को भी कंगाल माता-पिता को सौंप दिया गया था। माता-पिता तो जैसे बे-औलाद बैठे थे, फ़ौरन ‘स्मार्ट’ को लपक लिया। ‘स्मार्ट’ के गोद में आते ही ऐसा लगा कि शहर में किसी दूसरी दुनिया से कोई ‘अवतार’ उतर आया। सबने हाथों-हाथ लेकर ख़ूब दुलार किया। सबने कहा ‘स्मार्ट’ का ‘अवतार’ मेरे कारण हुआ। धीरे-धीरे सब अपने कामधाम में लग गए, बचे माता-पिता तो ‘स्मार्ट को पालने-पोसने में लगे रहे। कंगाली के चलते ‘स्मार्ट की परवरिश में शुरुआती काल में काफ़ी परेशानी हुई। परेशानी की ख़बर टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक के एक्सपर्ट डाक्टर को भेजी गई। उन्होंने ‘स्मार्ट’ की हालत पर तरस खाते हुए, कपड़े-लत्ते और खेल-खिलौने के लिए कुछ आर्थिक मदद पहुँचा दी। साल भर में तो बच्चे चलने लगते हैं पर ‘स्मार्ट’ कुपोषण का शिकार था सो घुटने के बल ही चलता रहा। चूँकि माता-पिता को अपनी औलाद प्यारी होती है इसलिए माता-पिता बिना किसी शिकवा-शिकायत के ‘स्मार्ट’ को कभी झूले पर तो कभी गोदी में झुलाते रहे।

डाक्टर साहब की आर्थिक मदद से माता-पिता को बड़ी राहत मिली। वे थोड़ा ख़ुश हुए। उन्होंने फ़ौरन ‘स्मार्ट’ के लिए कपड़े-लत्ते बनवाए, खिलौने ख़रीदे और ‘स्मार्ट’ को ख़ुश रखने मनोरंजक, शारीरिक और मानसिक विकास के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। मेहमान कलाकारों को बुलाया गया।

बहुत सारे गेस्ट ‘स्मार्ट’ को देखने देश-विदेश से आए। इन्हें बुलाया भी इसलिए ही गया था वे (जिनके पास ख़ूब धन-दौलत है) आएँ और ‘स्मार्ट’ को प्रोग्रेसीव और हैंडसम बनाने के लिए आर्थिक सहायता दें। ताकि ‘स्मार्ट भी दुनिया के हैंडसम्स की बराबरी पर आ जाए। बाहरी लोग आए भी, ‘स्मार्ट’ को और उसके घर-आँगन को ख़ूब अच्छे से देखा और परखा। पर बिना कोई उपहार या टिप्स दिए वापस चले गए, बाद में पलट के भी नहीं देखा।

इधर ‘स्मार्ट’ के ताऊ और चाचा आदि अलग-अलग कामों में उलझ गए। इन लोगों ने भी ध्यान देना बंद कर दिया। हाँ कुछ मामा लोग ‘स्मार्ट’ के इर्द-गिर्द घूमते रहे। बेचारे माँ-बाप अकेले ही ‘स्मार्ट’ को लिए जूझते रहे। एक तरफ़ ‘स्मार्ट’ की नई-नई ज़रूरतों की ज़िद थी तो दूसरी तरफ़ शहर वालों का विरोध। यहाँ तक कि ‘स्मार्ट’ के एक चाचा ने पत्र बम पटककर तीन धमाका भी किया था। माता-पिता की हिम्मत की दाद देना पड़ेगी कि इन्होंने अब तक हिम्मत नहीं हारी। ‘स्मार्ट’ को छाती से लगाए उसके लिए जी-जोड़ मेहनत कर रहे हैं।

मगर इस बार ‘स्मार्ट’ के माता-पिता कुछ हताश और निराश हैं। ‘स्मार्ट’ की परवरिश में अब तक काफ़ी धन बहा दिया फिर भी ‘स्मार्ट’ की न तो ऊँचाई बढ़ी, न ही तन्दुरुस्ती। उलटे ‘स्मार्ट’ कुपोषित बच्चे की तरह दिखने लगा। ‘स्मार्ट’ के केयरटेकर भी उसे छोड़कर चले गए। जब तक वो थे तो अपने काँधे पर ‘स्मार्ट’ को लेकर घुमाया करते थे। भोपाल-दिल्ली के चिकित्सकों से वक़्त-वक़्त पर चैकअप करवाया करते थे। पुराने की जगह जो नए केयरटेकर आएँ हैं वो ‘स्मार्ट’ की नब्ज़ टटोलने की कोशिश कर रहे हैं। कुपोषण की वजह से ‘स्मार्ट’ की नब्ज़ भी पकड़ाई नहीं रही है।

शायद इसीलिए ‘स्मार्ट’ के थर्ड बर्थ डे पर बड़ा जलसा नहीं किया गया है। जलसे में ताऊ, चाचा, मामा, मौसी, बुआ किसी को आमंत्रित नहीं किया गया।

इन तीन सालों के दौरान ‘ स्मार्ट’ के लालन-पालन में माता-पिता इतने मशगूल रहे कि कोख से जन्मे दीगर बच्चों की तरफ़ माक़ूल ध्यान नहीं दे पाए जिससे पहले वाले बच्चे बदहाली की हालत में कहीं भी नज़र आ जाते हैं। लोगों की अपेक्षा है कि ‘स्मार्ट’ के साथ-साथ बाक़ी बच्चों की भी समुचित देखभाल की जाए।

हम सब जबलपुरियन को ‘स्मार्ट’ की तीसरी वर्षगाँठ पर बधाई देना चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए कि जल्द ही उसे कोई गोद लेना वाला धन्ना सेठ मिल जाए ताकि उसका पालन-पोषण और विकास द्रुत गति से हो सके और जबलपुरियन ‘स्मार्ट’ पर गर्व कर सकें।