जेटली साहब उनकी ईमानदारी भी परख लेते…..

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ज़हीर अंसारी
मुल्क के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने फिर कहा कि भारतीय समाज को ईमानदारी से टैक्स देना चाहिए। लोगों को टैक्स चोरी नहीं करना चाहिए। जेटली की इस बात से कमोबेश सही सहमत होंगे, विशेषकर उनके अपने समर्थक। देशहित में प्रत्येक नागरिक का यह दायित्व भी बनता है कि वे अपने हिस्से का टैक्स पूरी ईमानदारी से अदा करें।

लेकिन… जेटली जी बेईमान लोगों की श्रेणी बताना भूल गए। टैक्स चोरों में कौन सी जमात शामिल है इसका ख़ुलासा भी नहीं किया उन्होंने। माना जाना है कि मध्यम और लघु श्रेणी के करदाता टैक्स चोरी ज़्यादा करते हैं। इसीलिए उनके यहाँ कभी सर्वे के नाम पर या कभी रेड के रूप में खानातलाशी ली जाती है। छोटी सी पर्ची तक का हिसाब माँग लिया जाता है।

लेकिन…. हिसाब उनसे कभी नहीं माँगा जाता जो बिना कोई धंधा-पानी किए करोड़ों-अरबों के मालिक बन जाते हैं। देखते ही देखते सैकड़ों सम्पत्तियों के स्वामी हो जाते हैं। होटल-मॉल, कमर्शियल कम्पलेक्स, रियल स्टेट और कारपोरेट कारोबार में भागीदार बन जाते हैं।

उन नेताओं से नहीं पूछा जाता कि भैया पूरे जीवन आपने समाजसेवी और राजनीति की है, कोई काम-धंधा नहीं किया, आयकर रिटर्न में थोड़ी सी इनकम दिखाई है फिर ये आलीशान बंगला, महँगी कारें, फ़ार्महाउस और ये राजसी ठाटबाट कैसे ?

उन बड़े नौकरशाहों से सवाल क्यों नहीं किया जाता कि भ्रष्ट तरीक़े से अर्जित कमाई कहाँ ठिकाने लगे रहे हो ? तुम्हारे नातेदारों के पास अचानक इतनी धन-दौलत कैसे इकट्ठा हो गई ?

बड़े कारोबारियों और कारपोरेट घरानों पर नकेल क्यों नहीं कसी जाती ? फ़र्ज़ीगिरी करके सरकार को चूना लगाते हैं। फेब्रिकेटेड डक्यूमेंट बनाकर बैंकों से ऋण और सरकार से ज़मीन तथा अनुदान लेते हैं।

उन दलों से क्यों नहीं पूछा जाता जो सरकार में बैठते ही पब्लिक मनी का धुआँ उड़ाने लगती है। वोट और सत्ता की ख़ातिर मुफ़्तख़ोरी वाली योजनायें चलाती है।

उनसे यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाता कि अपनी छवि चमकाने के लिए सरकारी धन की फ़िज़ूलख़र्ची क्यों की जा रही है ?क्यों सरकारी ख़र्चे पर दलीय प्रोग्राम किए जा रहे हैं ? क्यों सरकारों का क़र्ज़ और ख़र्च बढ़ रहा है ?

जेटली साहब कह रहे हैं कि नोटबंदी और जीएसटी के बाद सरकार की आय में बढ़ोतरी हुई है। लेकिन सरकारी घाटा बढ़ रहा है। सरकारी घाटे का रोना कब तक चलेगा। इधर आय बढ़ रही है उधर घाटा। जनता सरकारी अप्रबंधन में बेवजह पिस रही है और चोर-बेईमान समझी जा रही है।

वित्त मंत्री ने पेट्रोल-डीज़ल पर ‘उत्पाद कर’ कम न करना पड़े इसलिए सियासी पैंतरा चल दिया। पब्लिक को समझाईश दे दी कि ईमानदार ‘टैक्स पेयर’ बनो। बस ये समझाना भूल गए कि सबकुछ पटरी पर कैसे और कब तक आएगा। राजनैतिक दलों और धार्मिक-सामाजिक ट्रस्टों की अकूत धन-संपदा पर कब टैक्स लगाया जाएगा।

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जय हिन्द
ज़हीर अंसारी