किसान आंदोलन ः पिक्चर अभी बाकी है…

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राघवेन्द्र सिंह

पिछला सप्ताह सूबे की सियासत के हिसाब से दस दिनी किसान आंदोलन के साथ राहुल गांधी की यह घोषणा कि सरकार में आने पर दस दिन में किसानों का कर्जा माफ कर देंगे, खूब सुर्खियों में रहा। इस बीच भाजपा में किसानों को लेकर भी खासी चिंता है। दरअसल किसान आंदोलन दोनों पार्टियों के लिए खतरा भी है और एक किस्म का मौका भी है। जो उन्हें साध लेगा वो सिकंदर बनने के ज्यादा करीब होगा। लेकिन लगता है ये दोनों बड़ी पार्टियां किसान की समस्या को समझने की बजाए पत्तों पर पानी डालती दिख रही हैं। इन दिनों मुद्दा भाजपा सरकार और संगठन को लेकर गफलत का भी नजर आता है। भाजपा नेता भी समझ नहीं पा रहे हैं कि नेतृत्व गफलत में है या नेतृत्व में गफलत है। वजह है एक दर्जन कमेटियों की घोषणा होती है और दूसरे ही दिन प्रदेश नेतृत्व दिल्ली तलब किया जाता है और तीसरे दिन कमेटियों की तय बैठक रद्द कर दी जाती है। गफलत का दौर यहीं से शुरू होता है।

भाजपा पर चर्चा बाद में पहले किसानों से रूबरू हो लिया जाए। चुनावी साल है और किसान सबसे हाट इश्यू है। मंदसौर किसान गोलीकांड की बरसी पर छह जून को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को सुनने आए जमघट ने भाजपा को चिंता में डाल दिया है। नाराज किसानों को खुश करने के लिए राहुल ने ऐलान कर दिया कि कांग्रेस की सरकार बनती है तो दस दिन के भीतर किसानों का कर्जा माफ कर दिया जाएगा। इस घोषणा से तालियां जरूर पिट गईं मगर किसानों की समस्या को लेकर कांग्रेस की नासमझी भी उजागर हुई है। असल में अब किसान मेहरबानी अनुदान,रियायत और कर्ज माफी के साथ समर्थन मूल्य नहीं चाहता। वह चाहता है तो केवल अपने कृषि उत्पाद का लागत मूल्य के साथ पचास फीसदी मुनाफा जोड़कर बाजार मूल्य। कर्ज माफी की बातें अब गुजरे जमाने की हो गईं हैं। कर्ज माफी को भाजपा ने घोषणा पत्र में लिखे जाने के बावजूद अमल में शायद इसलिए नहीं लाए क्योंकि उसे पता है मसला अब कर्ज माफी का नहीं बल्कि बाजार मूल्य का है। सरकार में बैठी भाजपा के पास एक अवसर है कृषि उत्पाद को बाजार मूल्य दिलाने का। इसमें वह सफल हुई तो अवसर और असफल हुई तो सत्ता खोने का खतरा। प्रदेश में करीब एक करोड़ किसान हैं। एक परिवार में चार सदस्य भी माने जाएं तो यह संख्या राज्य की आधी आबादी से ऊपर निकल जाती है।

इन चार करोड़ किसानों को कांग्रेस भी वोट के तौर पर भाजपा की तरह ललचाई नजर से देख रही होगी। मजदूरों के मामले में मनरेगा के बाद किसानों को बड़ा वोटबैंक माना जा रहा है। कांग्रेस गेहूं चावल सोयाबीन चना, टमाटर प्याज लहसुन आदि फसलों का बाजार मूल्य दिलाने का एक्शन प्लान पेश कर किसान को पटा लेती है तो किसानों का आंदोलन या असंतोष उसके लिए सरकार में आने का अवसर बन जाएगा। वरना जिस तरह किसान अभी अपने को अलग थलग महसूस कर रहा है उसके लिए राज्य में किसानों से जुड़ी एक नई पार्टी की संभावना को भी जन्म देता है। बहुत संभव है किसान नेता गांव-गरीब के नाम पर चुनाव मैदान में भी उतर सकते हैं। अभी तो खबरें ये हैं कि दस जून को समाप्त हुआ किसान आंदोलन अगले कुछ दिनों में गांव-गांव में धन्यवाद और आभार यात्रा के रूप में फिर दिखाई पड़ सकता है। किसान नेताओं के हिसाब से पिक्चर अभी बाकी है। किसान नेताओं में शामिल शिव कुमार शर्मा, विनायक परिहार, केदार शंकर सिरोही और उनकी टीम का मानना है कि उनका आंदोलन सफल हुआ क्योंकि पहली बार किसानों की समस्या पर पूरे देश में चर्चा हो सकी।

हमने पहले भी संकेत दिया था कि मध्यप्रदेश के देव दुर्लभ कार्यकर्ता और उनके नेताओं को कोई समझ नहीं पा रहा है। यहां तक कि राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी अब तक तो इसमें सफल नहीं हो पाए। उन्होंने अपनी पिछली यात्रा में स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे और राजमाता विजयाराजे सिंधिया को याद कर उनके तराशे हुए कार्यकर्ताओं से चौथी बार राज्य में सरकार बनाने का आव्हान किया था। उन्होंने कहा था इस बार चुनाव में कोई चेहरा नहीं होगा। मतलब संगठन आगे रहेगा। राजस्थान में मुख्यमंत्री वसुंधराराजे सिंधिया की पसंद का प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हटाने के बाद नए की नियुक्ति नहीं कर पाने के कारण शाह टीम पिटी हुई मानी जा रही है। इस घटना के बाद मध्यप्रदेश दूसरा राज्य होगा जहां उनकी बातें अनसुनी की जा रही हैं। पिछले साल अगस्त दौरे के समय शाह ने जो कार्यक्रम प्रदेश संगठन को दिए थे वे पूरे नहीं हो पाए थे। नतीजतन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान ने अपने संसदीय क्षेत्र पर ध्यान नहीं दे पाने का स्कूली बहाना बताकर अध्यक्ष पद छोड़ दिया था। तब हमने लिखा था अगर अब संगठन असफल होता है तो कौन जिम्मेदार होगा ? यह सवाल बहुत जल्दी फिर पूछना पड़ रहा है कि अमित शाह के निर्देशों का नंदू भैया के हटने के बाद पालन नहीं हो रहा है तो कौन जिम्मेदार है ? शाह ने कहा था कि अगले चुनाव में पार्टी का कोई चेहरा नहीं होगा । सब संगठन के पीछे खड़े होंगे। मतलब प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह सर्वेसर्वा। मगर हुआ क्या । चार नेताओं ने एक मीटिंग कर बारह कमेटियां बना दीं। इसमें 15 जुलाई से शुरू होकर 25 सितम्बर को संपन्न होने वाली मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में होने वाली जनआशीर्वाद यात्रा भी शामिल है। इसके प्रभारी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा बनाए गए हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि कमेटी गठित होने के साथ ही अगले दिन प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री दिल्ली बुलाए जाते हैं और इसके साथ ही एक दर्जन कमेटियों की बैठक स्थगित कर दी जाती हैं। एक और महत्वपूर्ण मामला है भाजपा में पहली बार मीडिया समन्वयक का। प्रभात झा को इसकी कमान सौंपी गई है। यह बताता है कि भाजपा की मीडिया सेल में प्रवक्ताओं में पैनालिस्ट और संवाद प्रमुख में तालमेल का भारी अभाव था। इससे अब तक जो मीडिया में नेता काम कर रहे हैं यह उनकी योग्यता पर भी सवाल खड़े करता है। आने वाले दिन बताएंगे कि भाजपा में गफलत का दौर और कितना लंबा चलेगा। चुनावी साल में यह पेंचबाजी भाजपा के लिए मुश्किल भरी भी हो सकती है।
(लेखक IND24 चैनल MP/CG समूह के प्रबंध संपादक हैं )