नये चेहरे नहीं उतारे तो भाजपा का भट्टा बैठना तय

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रवीन्द्र बाजपेयी

मप्र विधानसभा चुनाव को चंद महीने बचे हैं । कांग्रेस इस मर्तबा जिस तरह जोश दिखा रही है वह भाजपा के लिए खतरे की घण्टी साबित हो सकता है । कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को कमान सौंपकर पार्टी ने आक्रामक होने के संकेत दे दिए हैं । किसानों की नाराजगी , पेट्रोल – डीजल के आसमान छूते दाम , नोटबन्दी और जीएसटी जैसे मुद्दे कांग्रेस की ताकत बने हुए हैं । वहीं अपने परंपरागत मुद्दों पर कुछ भी न कर पाने की वजह से भाजपा रक्षात्मक हो जाने के लिए मजबूर हो गई है । संगठन महामंत्री पद से अरविंद मेनन की विदाई के बाद से संगठन की पकड़ कमजोर हो चली है । उनके उत्तराधिकारी सुहास भगत उतने प्रभावशाली साबित नहीं हुए । उनके सहयोगी बनाए अतुल रॉय भी चूंकि अंतर्मुखी हैं इसलिए पार्टी कैडर से उनका अपेक्षित तादात्म्य स्थापित नहीं हो पा रहा । यही वजह है भाजपा की तैयारियां जोर पकड़ नहीं पा रहीं । नन्दकुमार सिंह चौहान को हटाकर प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए जबलपुर के सांसद राकेश सिंह को पूरे प्रदेश के हालात जानने में जितना समय लगेगा उतने में तो लोकसभा चुनाव तक आ जाएगा । बचे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह तो अकेले गाड़ी खींचते – खींचते आई थकान अब उनके चेहरे पर झलकने लगी है । भाजपा माने या न माने लेकिन सत्ता विरोधी रुझान महसूस किया जा सकता है । पार्टी हायकमान राजस्थान को तो हारा हुआ मान ही चुका है किन्तु मप्र को लेकर अभी भी उम्मीदें बनी हुई हैं पर अकेले शिवराज सिंह चौहान के दम पर वैतरणी पार करना कठिन हो गया है । इसका कारण प्रदेश में भाजपा के दूसरी पंक्ति के नेतृत्व का नितांत अभाव होना है । एक दौर था जब भाजपा में राजमाता सिंधिया ,सुन्दरलाल पटवा , कैलाश जोशी , वीरेंद्र कुमार सखलेचा , विक्रम वर्मा , बाबूलाल गौर जैसे नेता होते थे । मध्यभारत , मालवा , महाकोशल और विंध्य अंचलों में क्षेत्रीय क्षत्रप भी थे। संगठन में कुशाभाऊ ठाकरे , प्यारेलाल खंडेलवाल और नारायण प्रसाद गुप्ता सदृश तपे-तपाये व्यक्तित्व थे जिनका सभी सम्मान करते थे । युवाओं में शिवराज सिंह चौहान , नरेंद्र सिंह तोमर , कैलाश विजयवर्गीय और प्रह्लाद पटैल जैसी जुझारू टीम थी । बाद में उमाश्री भारती भी उभरकर सामने आईं । विपक्ष से उठकर भाजपा सत्ता में आ गई और अब तक जमी है । मतभेद तब भी हुआ करते थे किन्तु मनभेद नहीं । लेकिन विगत एक दशक में पार्टी का स्वरूप बदल गया । सत्ता में वह इस तरह रम गई कि संगठन का खयाल तक नहीं रहा । दरबारी नेता महिमा मंडित किए जाने लगे । विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर जनता से कटे रहने वाले चेहरे बिठा दिए गए । प्रवक्ताओं के तौर पर उन्हें आगे किया गया जिन्हें पार्टी की नीतियों का ज्ञान तक ठीक से नहीं है । कुल मिलाकर पूरी तरह उसी कांग्रेस संस्कृति को अपना लिया गया जिससे देश को मुक्त करवाने नरेन्द्र मोदी और अमित शाह दिन रात एक करने में जुटे हुए हैं । 15 साल से सरकार चलाने के बाद आज भाजपा के पास न तो सत्ता और न ही संगठन में ऐसे चेहरे हैं जिन्हें शिवराज सिंह का विकल्प कहा जा सके । नंदकुमार सिंह चौहान को हटाकर सांसद राकेश सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भी भाजपा प्रदेश भर में अपेक्षित उत्साह अपने कार्यकर्ताओं में नहीं भर सकी । पूरे मप्र पर निगाह डालने पर लगता है कि सिवाय मुख्यमंत्री के भाजपा के पास कोई दूसरा ऐसा व्यक्तित्व नहीं है जो जनता और कार्यकर्ताओं दोनों को प्रभावित कर सके । जो वरिष्ठ नेता सत्ता और संगठन में थे उन्हें भी पूरी तरह किनारे कर दिया गया । स्थानीय स्तर पर जिस तरह के लोगों को आगे बढ़ाया गया उससे पार्टी की छवि और खराब होती गई । सच बात ये है कि भाजपा के आकार में हुई वृद्धि हार्मोन का इंजेक्शन लगाकर रातों-रात बड़ी की जाने वाले लौकी जैसी हो गई है जिसमें स्वाद और गुणवत्ता दोनों का अभाव होता है । इस स्थिति में 2018 की जंग जीतने के लिए पार्टी को नई रणनीति पर चलना होगा जिसमें विधानसभा चुनाव में नए और सक्षम चेहरे उतारना प्रमुख है। मौजूदा विधायक और मंत्रियों में से तीन चौथाई मिट्टी के माधो साबित हुए हैं । न तो उनमें कार्यक्षमता ही दिखी और न ही आचरण की कसौटी पर वे खरे उतरे । ईमानदारी तो यूँ भी अब भाजपा की पहिचान नहीं रही । यही वजह है अकेले शिवराज सिंह के भरोसे चुनावी नैया पार लगने की संभावना पर आशंका के बादल छा रहे हैं । कांग्रेस बहुत मजबूत हो ऐसा कतई नहीं है लेकिन भाजपा की कमजोरियों से उसे ताकत मिल रही है । उसका सबसे बड़ा कारण लंबे समय से लदे वे जनप्रतिनिधि हैं जिन्हें देख – देखकर मतदाताओं को उबकाई आने लगी है । जबलपुर में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह विधानसभा चुनाव की तैयारियों के सिलसिले में जबलपुर आये है इस सम्मेलन के जरिये भाजपा प्रदेशाध्यक्ष राकेश सिंह अपना आभामण्डल श्री शाह को दिखाने का प्रयास करेंगे लेकिन कोई सार्थक चिंतन होगा ये मान लेने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि अमित शाह और शिवराज सिंह के सामने सच बोलकर अपने लिए गड्ढा खोदने वाले नेता अब भाजपा में जनसंघ वाला दिया लेकर ढूंढऩे पर भी नहीं मिलते । राकेश सिंह में यदि साहस है तो उन्हें श्री शाह की मौजूदगी में ये कहना चाहिए कि यदि मौजूदा विधायकों में बमुश्किल 25-30 को छोड़कर बाकी की छुट्टी नहीं की गई तथा गुटबाजी को ताक पर रखते हुए योग्य और अच्छी छवि के उम्मीदवार नहीं उतारे गए तो अबकी बार 200 पार का नारा मुंगेरीलाल का सपना बनकर जाएगा । जनता में भाजपा की नीति और नीयत के प्रति उतना गुस्सा नहीं जितनी वितृष्णा और घृणा उसके बिगड़ैल नेताओं और नकचढ़े भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों को लेकर है । यदि भाजपा अभी भी शिवराज सिंह के करिश्मे को अचूक मानकर जनअपेक्षाओं के अनुरूप प्रत्याशी नहीं उतारती और जनाधार वाले नेताओं और ईमानदार कार्यकर्ताओं को आगे नहीं बढ़ाती तब उसके लिए कोई संभावना फिलहाल तो नजर नहीं आ रही । भाजपा को ये नहीं भूलना चाहिये कि शिवराज सिंह के जी तोड़ प्रयासों के बाद भी वह कोलारस और मुंगावली उपचुनाव जिस तरह हारी वे भविष्य का संकेत थे । और ये भी कि नरेंद्र मोदी का नाम भी अब जीत की शत प्रतिशत गारंटी नहीं रहा । बसपा , सपा और आदिवासियों के बीच सक्रिय छोटे छोटे संगठनों से कांग्रेस का गठजोड़ भाजपा के लिए सिरदर्द बनने जा रहा है ।

लेखक मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और हिंदी एक्सप्रेस के संपादक है