फैंस की उम्मीदों पर खरे उतरे रजनी, एक्शन-रोमांस का तड़का है ‘काला’

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साउथ के सुपरस्टार रजनीकांत की फिल्म ‘काला’ गुरुवार को रिलीज हो गई है। फिल्म को फैंस का अच्छा रिसपॉन्स मिल रहा है। फिल्म का नाम सोचकर आपको भी लग रहा होगा कि ये कैसा नाम है। लेकिन इसका जवाब आपको फिल्म देखने के बाद मिल जाएगा। फिल्म की शुरुआत भी विलेन के इसी सवाल से होती है। ‘कइसा नाम है रे तेरा? काला… लेते ही मुंह खट्टा हो जाता है!’यह कहानी है मुंबई के धारावी की बस्ती में रहने वाले करिकालन यानी काला की, जो वैसे तो एक डॉन है, पर वहां के लोगों का मसीहा है। लोग उसे बहुत मानते हैं। काला का परिवार बहुत साल पहले तमिलनाडु से मुंबई शिफ्ट हो गया था। काला के परिवार में उसकी पत्नी सेल्वी (ईश्वरी राव), तीन बेटे, बहुएं और पोते-पोतियां हैं। काला की उम्र जरूर ढल रही है, पर इरादे अब भी बुलंदी पर हैं। वह बस्ती के बच्चों के साथ क्रिकेट भी खेलता है और पत्नी सेल्वी के साथ रोमांस भी करता है।
यहां तक कि अफ्रीका में रह कर आईं जरीना (हुमा कुरैशी) जो उसकी पूर्व मंगेतर रह चुकी हैं, को देखकर भी उनके दिल में पुराने जज्बात जिंदा हो जाते हैं। फिल्म का विलेन यानी हरि अभ्यंकर (नाना पाटेकर) धारावी की जमीन पर कब्जा करना चाहता है। उसके रास्ते का सबसे बड़ा कांटा है काला। पूरी फिल्म में इन्हीं दोनों के बीच रस्साकशी चलती रहती है और आखिर में क्या होता है, उसका अंदाजा आप खुद ही लगा लेंगे, इसका हमें पूरा भरोसा है। फिल्म में कुछ चीजें काबिल-ए-तारीफ भी हैं, जैसे अलग-अलग प्रतीकों के जरिए हीरो-विलेन के बीच का विरोधाभास दिखाना। फिल्म में एक जगह रजनी का पोता उससे पूछता है, ‘दादाजी, क्या आपका नाम काला इसलिए रखा गया है क्योंकि आपका रंग काला है?’ इस पर रजनी की पत्नी यानी ईश्वरी उसे बताती हैं कि काला दरअसल एक देवता का नाम है। काला को फिल्म में कई जगह रावण का प्रतीक भी बताया गया है। यानी काला, गरीबी, बदहाली, गंदगी में पनप रही जिंदगी का प्रतीक है। यह किरदार कहीं न कहीं अल्पसंख्यकों का प्रतीक है। दूसरी तरफ फिल्म का विलेन हरि है, जो बहुसंख्यकों का प्रतीक है। जो धारावी की मलिन बस्तियों को ही साफ कर देना चाहता है।
धार्मिक प्रवृत्ति का यह विलेन काले रंग से नफरत करता है। हमेशा सफेद कुर्ता-पायजामा पहनता है। अब बात करते हैं रजनी के लुक की। लुंगी, कुर्ते और एविटर चश्मे के साथ वह अपने पूरे स्वैग में नजर आए हैं। इन चीजों के बाद भी उनके पूरे व्यक्तित्व में एक सादगी है और शायद इसी सादगी का आकर्षण है जो लोगों को खींचता है। फिल्म के कुछ हिस्सों में रजनी, हुमा आदि कलाकारों का अतीत दिखाने के लिए एनिमेशन का सहारा लिया गया है, जो फिल्म की गंभीरता को कम करता है। ठीक यही काम इसके कई गाने भी करते हैं। एक किरदार की मौत पर बस्ती के कुछ युवाओं का गमगीन रैप गीत गाना कुछ अखरता है। हुमा की उम्र उनके किरदार के लिहाज से कम लगी है। बेहतर होता कि या तो मेकअप के जरिए उनकी उम्र को ज्यादा दिखाया जाता या उनकी जगह किसी अन्य अदाकारा को लिया जाता। रजनी की केमिस्ट्री हुमा के बजाए ईश्वरी के साथ ज्यादा बेहतर नजर आई है। फिल्म में हुमा कुरैशी के अलावा अंजलि पाटिल, पंकज त्रिपाठी जैसे उत्तर भारतीय फिल्मों के कलाकार भी हैं जिन्होंने छोटी पर प्रभावी भूमिकाएं निभाई हैं। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी अच्छी है। अंत में रंगों का अच्छा इस्तेमाल किया गया है। बैकग्राउंड स्कोर भी फिल्म की गति के अनुरूप है।