ईश्वर के साथ अनैतिकता…

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ज़हीर अंसारी
मुल्क की आबादी इस वक़्त क़रीब एक सौ पैंतीस करोड़ होगी। इनमें से लगभग सवा सौ करोड़ लोग धार्मिक होंगे। धर्म कोई भी हो सकता है पर इतने लोगों की धर्म में भरपूर आस्था है। आस्था थोड़ी मोड़ी कम-ज़्यादा हो सकती है पर धर्म का झंडा सब थामे हैं। अपने-अपने धर्म और स्वर्ग के लिए कुछ भी करने तैयार हैं। उनका धार्मिक विश्वास वाक़ई प्रशंसनीय है। हर किसी को अपने धर्मानुसार आचरण करना चाहिए। धारणा का मतलब ही धर्म है और धारणा अनुसार ही आचरण करना चाहिए।

लेकिन अब आचरण धर्मानुसार होने की बजाय विकृत मानसिकतानुसार हो रहा है। धर्म की गूढता और कट्टरपंथ के बावजूद सामाजिक विकृति में बढ़ोत्तरी हो रही है। बात ज़रूर कठुआ, उन्नाव, बिहार या जबलपुर के पनागर की हो या देश के दीगर कोनों की, हर तरफ़ मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म की घटनाएँ लगातार सामने आ रही है। लोग अलग, भाषायें अलग, संस्कृति अलग, धर्म अलग मगर मानसिकता समान। दुष्कर्म का तौर-तरीक़ा भी समान। इंसानियत और मज़हब का पैमाना भले सबका अलग हो परंतु मानसिक विकृति का पैमाना एक है। बच्चियों की साथ बढ़ रही दुराचार की घटनाओं को लेकर हो सकता है कई लोग शर्मिंदगी महसूस कर रहे हों, कई लोग व्यथित हों, कई माताएँ ग्लानि से भर गई होंगी। लेकिन उससे क्या फ़र्क़ पड़ने वाला है। निर्भया के बाद क्या सामूहिक दुष्कर्म की घटनाएँ समाप्त हो गईं ? नहीं न। बल्कि उसके बाद इस तरह की घटनाएँ बढ़ी हैं। हर घटना के बाद शासन-प्रशासन की कान खिंचाई। बकवास पूर्ण बहस, सड़कों पर धरना-प्रदर्शन। धर्म आधारित आरोप-प्रत्यारोप। इसके बाद क्या.? वही ढर्रा फिर.. फिर बच्चियों, कन्याओं और औरतों के साथ दुराचार, सामूहिक दुष्कर्म।

इन घटनाओं बाद प्रायः सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने तौर-तरीक़े से ‘कैश’करता है। धर्म के ठेकेदार अपनी धार्मिक उच्चता और श्रेष्ठता के अनुसार बयानबाज़ी करते हैं और इतिश्री कर लेते हैं। इनमें से कोई भी पक्ष ऐसा नहीं है जो बच्चियों के साथ हो रही जिस्मानी क्रूरता के ख़िलाफ़ निरंतर जागरूकता पैदा करे। जन-जागरण फैलाए। इंसानियत का सबक़ पढ़ाए। हर धर्म कहता है कि बच्चे की मासूमियत में ईश्वर का वास होता है। जब बच्चों के साथ अनैतिकता होती है तो स्वाभाविक है ईश्वर के साथ अनैतिकता हो रही है। सरकारें तो निष्ठुर और निरपेक्ष होती हैं लेकिन धर्म सापेक्ष। सब धर्म गुरुओं का कर्तव्य बनता है कि अपने-अपने धर्म के अनुसार मानवता, नैतिकता और समानता का पाठ पढ़ाएँ। कोई तो आगे आए जो धर्म की बजाय समाज सुधार की बात उठाए। समाज रहेगा तो धर्म रहेगा। धर्म रहेगा तो स्वर्ग और मोक्ष मिलेगा।

ऐसे धर्म और समाज के ठेकेदार किस काम के जो आठ-दस-बारह साल की बालिकाओं के साथ दुष्कर्म को नहीं रोक पा रहे हैं। जो सम्मान से ज़िंदा रहने की समझ पैदा नहीं कर पा रहे हैं। जो अपनी मातृशक्ति की औलादों को सुरक्षित नहीं कर पा रहे। अबोध बालिकाओं को मरने के बाद स्वर्ग की लालसा नहीं होती है वो तो इतनी मासूम होती हैं कि अपने लड़कपन को भी नहीं समझ पाती। फिर दुराचार के बाद मौत के मुँह में धकेली जा रही हैं।