उसने कहा- ज़िंदगी मेरी है, मैं तो जियूँगी ख़ुशी से……..

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ज़हीर अंसारी
वो बला की ख़ूबसूरत थी। सुसंकृत और शिक्षित भी थी। ब्याह के बाद उसने एक बच्चे को जन्म दिया। कहीं कोई कमी नहीं थी। सब कुछ राज़ी-ख़ुशी चल रहा था सिवाय पारिवारिक तांनेबाज़ी और झंझावातों के। अमूमन ऐसा हर परिवार में होता। बहुओं के प्रति शुरुआती व्यवहार कैसा रहता है, कम से कम हम सब से छिपा नहीं है। काफ़ी दिनों तक पारिवारिक गतिविधियां उतर-चढ़ाव के साथ गुज़रती रही। कभी नरम तो कभी गरम, वो ज़िंदगी की गाड़ी अपनी रफ़्तार से घसीटती रही। उसे कोई मलाल न था। ख़ुशी का लबादा ओढ़े वो सब कुछ सहती गई। उसके पास जीवन यापन के लिए तमाम चीज़ें थी। किसी चीज़ का कहीं कोई अभाव नहीं था। कमी थी तो सम्मान और प्रेम की, जिसकी दरकार हर भारतीय नारी को होती है।

जब कोई मीलों ऊँचे पहाड़ चढ़ने के बाद अपने आगे गहरी खाई देखता है तो वह टूटकर वहीं ढेर हो जाता है। इतने ऊँचे चढ़ आए कि अब वापस जाने की हिम्मत ना बची, आगे बढ़े तो जाने कितने गहरे गिरेंगे, इसका भी अन्दाज़ा नहीं लगाया जा सकता। उसके साथ भी यही हालात बने। वो न आगे जा सकती थी और न पीछे लौट सकती। लिहाज़ा वो अपने उसी आशियाने में ही रहने लगी। वक़्त अपनी रफ़्तार से दौड़ रहा था लेकिन उसकी ज़िंदगी थमने सी लगी थी। नतीजा यह हुआ कि वो डिप्रेशन की शिकार हो गई। डिप्रेशन का असर उसके शरीर पर पड़ने लगा। धीरे-धीरे वो कमज़ोर होने लगी।

फिर एक दिन उसने ख़ुद से गुफ़्तगू की। मन-मस्तिष्क के द्वन्द से ख़ुद को बाहर निकाला। फ़ैसला किया कि मैं अपनी ज़िंदगी की मालिक हूँ इसलिए आज से मैं ख़ुश रहूँगी। हालात कैसे भी रहें, ख़ुश रहूँगी। ख़ुश रहने के लिए उसने संगीत को अपना साथी चुना। घर-बार से या सामाजिक दायित्वों से जब भी उसे फ़ुर्सत मिलती वो संगीत सुनने लगती। उसने अपने मान-सम्मान और अपमान को संगीत में डूबा दिया। अब उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कौन क्या सोच रहा है, या क्या कह रहा है। वो तो घर-परिवार की मर्यादा के भीतर संगीतमय रहकर अपने दायित्वों का निर्वहन कर रही है और मस्त रह रही है। उसने समझ लिया है कि ये ज़िन्दगी फिर न मिलेगी दोबारा।

कहानी का सार—–
पुरुष हो या महिला, युवा हो युवती किसी न किसी वजह से डिप्रेशन के शिकार होते हैं। डिप्रेशन से बचने का सबसे बेहतर तरीक़ा है कि वे ख़ुद को उन चीज़ों से जोड़ ले, जो कभी उसका पैशन रहा हो। यदि यह संभव न हो तो संगीत सुने। संगीत में गीत, लोकगीत, ग़ज़ल, क़व्वाली, भजन, प्रवचन, आयतें, श्लोक, वर्सेस, हास्य-व्यंग्य जो भी आपको कर्णप्रिय लगे, वो सुनें। पर इन्हें देखें नहीं। जब आप टीवी पर ऐसी चीज़ें देखते और सुनते हैं तो आपका ध्यान बटता है, आपकी एकाग्रता बन नहीं पाती, इसलिए सिर्फ़ गीत-संगीत सुनिए। संगीत भी ध्यान का एक माध्यम है। जब आपका ध्यान संगीत में एकाग्रचित्त रहेगा तो बहुत सारे तनाव आपसे दूर रहेंगे।

चेतावनी…….
जो भी सुनना चाहें आप सुने, पर ध्यान रखिए जो सुने, मधुर हो, सॉफ़्ट हो। धूम-धड़ाका, चीख़-चिल्लाहट वाली चीज़ें बिलकुल न सुनें।

अगर आप डिप्रेशन या टेंशन में तो कुछ दिनों के लिए ऐसा करके देखिए। आपको राहत ही मिलेगी।