इन टिकटों से इसलिए नहीं चौंकिए!

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.जयराम शुक्ल

ये तो लगभग नरसिंहराव जैसी ही घटना हुई, हैदराबाद लौटने के लिए डेरा-डकूला बाँधे बैठे थे कि बन गए प्रधानमंत्री। अपने राजमणि पटेलजी के साथ भी कुछ ऐसा ही घटा। दोबार कबीना मंत्री रहने वाले पटेल को काँग्रेस की टिकट बंदकर रिटायरमेंट दे दिया था, हमेशा राष्ट्रीय प्रतिनिधि रहने वाले व पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष रह चुके राजमणिजी को इस बार प्रदेश प्रतिनिधि बनने के लिए मशक्कत करनी पड़ी और आज उन्हें संसद के उच्च सदन राज्यसभा की टिकट मिल गई।

इधर भाजपा के बड़े-बड़े तुर्रमखाँ दिल्ली भोपाल एक कर टीपते रह गए, टिकट अजयप्रताप सिंह और कैलाश सोनी को मिल गई। सही ही कहते हैं- राजनीति तड़ित की तरह चंचल और भुजंग की भाँति कुटिल होती है। कोई मुझसे पूछे तो अपनी प्रतिक्रिया होगी कि भले ही यह जातीय संतुलन के राजनीतिक गुणाभाग की मजबूरी रही हो लेकिन दोनों पार्टियों ने टिकट को लेकर जो फैसला लिया है वह नई-पुरानी पीढ़ी के लिए उम्मीद जगाने वाली है, वरना अबतक तो राज्यसभा टिकट पर थैलीशाहों और लाबिस्टों का पट्टा सा लिख गया था।

चलिए बात शुरू करते हैं राजमणि पटेल से। कांग्रेस में यह भी कमाल की बात हुई। 24अकबर रोड में जिन दिनों राजमणि पटेल को राज्यसभा भेजने की बात चल रही थी उन्हीं दिनों काँग्रेस मुख्यालय के दूसरे कक्ष में कहीं भाजपा से डिफाल्टर हो चुके एक ऐसे नेता को काँग्रेस में धूमधड़ाके के साथ शामिल करने का निर्णय लिया जा रहा था जिसने सही मायनों में राजमणि पटेल के राजनीति की लुटिया-डोर को डुबो दी थी। जी हाँ रीवा जिलापंचायत अध्यक्ष अभय मिश्र ने ही सेमरिया विधानसभा से 2008 में राजमणि पटेल को इतने भारी अंतर से हराया कि पार्टी ने पटेल को अगले चुनाव में टिकट देने के बारे में एक दफे भी विचार नहीं किया। अभय मिश्र अब बाजे-गाजे के साथ काँग्रेस में आने का जस लूट रहे हैं और पटेलजी राज्यसभा कूँच करने की तैयारी में हैं। वाकय क्रिकेट और राजनीति में कुछ भी संभव है।

राजमणि पटेल कांग्रेस की पुरानी पीढ़ी के आखिरी चरागों में से हैं जिसे बुझने से पहले ही तेल मिल गया और लौ टिमटिमा उठी। मुझे लगता है कि कांग्रेस के अष्टधातुओं को पटेलजी की याद अभी मुँगावली-कोलारस चुनाव और उसके कुछ हफ्ते पहले मंत्रीमंडल में शामिल कुनबी लोधी जाति के दो सदस्यों की वजह से आई होगी। मुँगावली-कोलारस का चुनाव वोटरों के बीच नहीं जातियों की गोलबंदी के बीच हुआ लोधी,किरार,धाकड़,कुनबी,काछी जातियों के घोषित सम्मेलन हुए और जातीय भावनाओं के आधार पर प्रत्याशी चुनने के लिए खुले मुँह कहा गया। असर दिखा, काँग्रेस जीती जरूर पर उसके वोट सिमटे।

आजकल लोक-वोकतंत्र, संविधान की मर्यादाओं का ख्याल रखता ही कौन है। कास्ट-क्रीड-रेस-रिलीजन से ऊपर उठकर काम की शपथ लेनें वाले ही घूमफिरकर कुनबी-काछी,लोधी-किरार में आकर अरझ जाते हैं, क्या करियेगा। राजनीति इसी दिशा में चल पड़ी है। खुद कुरते के ऊपर जनेऊ पहनकर गाँधी की कसमें खाओ या जातीय सम्मेलनों में उन दीनदयाल को भजो जिन्होंने जाति-संप्रदाय को चुनने की बजाय जौनपुर लोकसभा में चुनावी हार को चुना था। हाथी के दाँत खाने के कुछ,दिखाने के कुछ, खाते जाइए दिखाते जाइए। राजनीति में अब लोकलाज कहाँ?

राजमणि पटेल जातिवादी राजनीति की पैदाइश नहीं हैं। वे छात्र जीवन में यमुनाप्रसाद शास्त्री और चंद्रप्रताप तिवारी के चेले थे। चंद्रप्रताप जब काँग्रेस में गए और 72 में विंध्य में टिकट बँटवारे में उनकी चली तो कालेज में पढ़ रहे राजमणि को अपने पुराने समाजवादी साथी यमुनाशास्त्री के खिलाफ लड़ाने के लिए चुना। यह राजनीति का अद्भुत उदाहरण था। कि शिष्य गुरू के खिलाफ लड़ने की आग्या उसी गुरू से लेता है और फिर चुनाव प्रचार में उसी प्रतिद्वंदी गुरू की तारीफ करते हुए (जो कि शास्त्री जी थे)उसी को हरा देता है। शास्त्री जी को राष्ट्रीय ख्याति मिल चुकी थी। उनको हराने के बाद राजमणि राष्ट्रीय भले न बने हों पर काँग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की नजर के नजारे तो बन ही गए।

राजमणिजी इसके बाद 2008 तक सभी चुनाव लड़े पर 72 के बाद सफलता मिली 80, 85 व 98 में। अर्जुन सिंह तथा दिग्विजय सिंह के मंत्रिमंडल में सदस्य रहे। राजनीतिक प्रतिबद्धता इसी से समझ सकते हैं कि जब अर्जुन सिंह ने तिवारी काँग्रेस बनाई तब पटेलजी पद प्रलोभन के बाद भी अर्जुन सिंह के साथ डटे रहे। पटेलजी कार्यकर्ताओं के लिए कितने दरियादिल हैं कि राजस्वमंत्री रहते एक बार बेटे की जगह बाप का ट्राँसफर कर दिया था, वजह सिफारिश करने आए बाप ने पुरची में अपना नाम लिखकर थमा दिया उसी की नोटशीट बन गई, बाद में संशोधित हुई। मंत्री-विधायक रहे हों या फुर्सत में घर बैठे, ये ऐसे विरले नेता हैं जो हर किसी के लिए फोन करने,चिट्ठी लिखने में जरा भी वक्त जाया नहीं करते। यही सहज मिलनसारिता उन्हें अन्य नेताओं से विशिष्ट बनाती है। पर उन्हें राज्यसभा की टिकट इस विशिष्टता के लिए मिलनी होती तो कब की मिल जाती। विधानसभा चुनाव में इसबार काँग्रेस भाजपा के ही अस्त्रों से लड़ना चाहती है। भाजपा ने पिछड़ा वोटबैंक मुकम्मल कर रखा है,राजमणिजी निःसंदेनिःसंदेह काँग्रेस के लिए पिछड़ों में प्रदेशव्यापी परिचय वाले बड़े चेहरे हैं।

अब आते हैं अजयप्रताप और कैलाश सोनी पर। अजयप्रताप ऐसे मेहनतकश संगठक हैं कि जिम्मेदारी पर जिम्मेदारी ओढ़ने और उसे डूबकर निभाने में उफ् तक नहीं करते। भाजपा के प्रदेश कार्यालय में पूरी रात भोर तक बैठकर वे लिखापढ़ी करते मिल जाएंगे। पिछले सालों में संगठन के चुनाव और सिंहस्थ की जिम्मेदारी को जिस तरह निभाया उसके मुरीद शिवराज सिंह चौहान भी थे नंदू भैय्या के कहने ही क्या। एक बात शायद पार्टी के बाहर के लोगों को न मालूम हो, अजयप्रताप पिछले पाँच सालों से वो काम कर रहे हैं जिसमें विक्रम वर्मा को महारत माना जाता था। इन वर्षों में प्रदेश कार्यसमिति और अधिवेशनों के जितने भी राजनीतिक प्रस्ताव बने उसे ड्राफ्ट करने वाले अजयप्रताप ही थे। वे चुरहट के बघेल हैं और बघेली में एक कहावत है- गाए गाए बिआह होइन जात है। अजयप्रताप पिछले कई चुनावों से राज्यसभा प्रत्याशियों के पैनल में डमी रहते थे इस बार असली हो गए। चाहा था विधानसभा विधिना ने पहुँचा दिया पार्लियामेंट। सच है- भाग्य से ज्यादा वक्त से पहले कुछ नहीं मिलता।

अख्खड़-फक्कड़ कैलाश सोनी के पास हर मर्ज की पुड़िया रहती है। मजाक नहीं वे आयुर्वेद और देसी जड़ी बूटियों के गजब के जानकार हैं। इस बार उन्होंने राजनीति की नब्ज सही तरीके से पकड़ली। नरसिंहपुर में वे दो-दो मुश्रानों श्यामसुंदर नारायण और अजय नारायण से लोहा लेते आए हैं। इस बार एक बात मार्के की पकड़ी वो ये कि पिछड़ों में लोधी-कुनबी-किरार भर नहीं औधिया-दर्जी-सुनार भी हैं। मीसाबंदियों के राष्ट्रीय नेता तो वे हैं ही सो इस बार उनकी दिल्ली ने भी सुन ली। प्रदेश की राजनीति के पचड़े में कभी फँसे नहीं हाँ राजधानी के पत्रकारमित्र जरूर यह बता रहे हैं कि प्रहलाद पटेल को संतुलित करने के लिए यह शिवराज सिंह चौहान का सोचा समझा दाँव है। वैसे कैलाशजी को लेकर जितना मैं जानता हूँ उस हिसाब से वे दाँव पर नहीं आर-पार पर भरोसा रखते हैं। इस आरपारी मूड की बदौलत ने ही प्रदेश संगठन ने उनका नाम आगे बढ़ाया। अब 2024 तक इन तीनों के लिए उच्चसदन में सीटें बुक,अब चाहे वहाँ जाकर मौज काटें या यहाँ एक के बाद एक चुनावों में जातीय वोटों की फसल।

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