क्या भाजपा का संकल्प है कि आओ रे आओ सबरे आ जाओ ?

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ज़हीर अंसारी
‘पार्टी विथ डिफ़्रेंस’ कभी भाजपा का नारा हुआ करता था। अब यह नारा बिलकुल हक़ीक़त बन गया है। जो काम किसी अन्य दल ने नहीं किया वह भाजपा बड़ी रफ़्तार से कर रही है। हर ऐरे-गौरे को चंदन का तिलक लगाकर अपने भरे-पूरे घर में प्रवेश करा रही है। बाहरी भीड़ के दबाव से घर-गृहस्थी के सदस्यों का दम घुटने लगा है। अपनों की घुटन ही डिफ़्रेंस की परिभाषा बन गई है।

भाजपा के भीतर ताज़ा ताजपोशी नरेश अग्रवाल की हुई है। अग्रवाल जी उत्तरप्रदेश के दल बदलने वाले सबसे तेज़ नेता हैं। कांग्रेस, बसपा, निर्दलीय और फिर सपा में अपना जौहर दिखा चुके हैं। सपा ने उन्हें काफ़ी महत्व दिया, राज्यसभा में पहुँचाया। संगठन में ऊँचा पद दिया फिर भी नरेश जी राज्यसभा न भेजे जाने से ख़फ़ा हो गए। उनकी इस नाराज़गी को भाजपा ने फ़ौरन ‘कैश’ कर लिया और अपनी विशाल बाहों में समेट लिया। ऐसे जैसे कुंभ के मेले में बिछुड़ा भाई मिल गया हो।

हो सकता यूपी भाजपा को यह लगा हो कि बिना अग्रवाल जी के सरकार चलाना मुश्किल है। अग्रवाल जी जिन्हें यूपी सरकार रहने का ख़ासा अनुभव है, उनका अनुभव मुख्यमंत्री योगी के लिए सहायक बनेगा। नरेश अग्रवाल को बाक़ी सभी पार्टियों के छेद पता हैं, ये छेद मठा डालने के काम आएँगे।

यूँ तो, भाजपा में अलग-अलग राज्यों में बहुत से दलों के नेता और कार्यकर्ताओं का स्वागत हुआ है। अश्वमेध यज्ञ का अश्व जब दौड़ता है तो बहुतेरे जीव-जंतु या तो उसकी चपेट में आ जाते हैं या फिर पीछे-पीछे चल पड़ते हैं। लेकिन यहाँ आश्चर्य की बात यह है कि अश्वमेध यज्ञ पर अटूट विश्वास करने वाले धर्म और उस धर्म के भगवान का उपहास उड़ाने वाले व्यक्ति का भाजपा में आना भाजपा जनों को हज़म नहीं हो रहा है। इन्हीं अग्रवाल साहब ने राज्यसभा में सनातन धर्मावलंबियों के आराध्य भगवान विष्णु, भगवान राम और भगवान ब्रह्मा की तुलना व्हिस्की, रम और बीयर से की थी। तब भाजपा ने सदन से लेकर सड़क तक हाय-तौबा मचा डाली थी। आज वही भाजपा बिना माँगे तौबा क़बूल करके नरेश अग्रवाल को स्वयं में समाहित कर लिया।

वैसे भी किसी महान राजनीतिज्ञ ने कहा है कि राजनीतिक युद्ध में कभी-कभी विभीषण का सहारा लेना पड़ता है। इस लिहाज़ से देखा जाए तो सपा की लंका को नेस्तनाबूद करने में नरेश अग्रवाल का यूज किया जाएगा। सोशल मीडिया का रुझान और भाजपा नेताओं का आश्चर्य इतना तो दर्शाता है कि लोग मटका भी ठोंक बजाकर ख़रीदते हैं लेकिन पार्टी सिर्फ़ ख़रीदने में विश्वास करने लगी है। यही हाल रहा तो दीगर पार्टियों के बिकाऊ और विवादित नेता सब इस तरफ़ नज़र आएँगे।