भाजपा की बुजुर्ग ब्रिगेड का अटैक…सन्निपात में संगठन

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राघवेंद्र सिंह

भोपाल = मध्यप्रदेश में आम चुनाव का एलान भले ही न हुआ हो लेकिन भाजपा और कांग्रेस दोनों में सरगर्मियां जोरों पर हैैं। कोलारस और मुंगावली विधानसभा उप चुनाव में भाजपा की हार के बाद पार्टी की बुजुर्ग ब्रिगेड आक्रमण पर है। नित नये मुद्दे और सनसनीखेज खुलासे से संगठन भाजपा संगठन मानो सन्निपात में है। न तो बुजुर्ग नेताओं की बातों को कोई सुनने वाला है न समझने वाला और यह सब हो जाए तो कोई कुछ करने वाले नहीं हैैं। भाजपा में अनुशासन तार-तार हो रहा है। चुनावी साल में लगता है किसी को कोई सुध नहीं है। लंबे समय तक सरकार में रहने के बाद 15 साल से सत्ता से बाहर कांग्रेस इस कदर फीलगुड में है कि पहले तो उसने सदस्यता शुल्क ढाई सौ रुपये किया और अब टिकट मांगने वालों से 50 हजार रुपये लेने का फैसला किया है। इसमें कोई शक नहीं कि भाजपा का विरोध जनता के साथ कार्यकर्ताओं में भी है मगर इसे अपने पक्ष में भुनाने वाले कितने कांग्रेस के नेता हैैं।
भाजपा मध्यप्रदेश में अब तक की सबसे खराब दौर से गुजर रही है। सरकार, संगठन और संघ से भेजे गए पूर्णकालिक सब कमजोर और बेअसर साबित हो रहे हैैं। विषयों को लेकर गहराई और गंभीरता नदारद है। वैसे तो उदाहरण बहुत हैैं लेकिन हाल ही में दो विधानसभा चुनाव की हार के बाद भाजपा की बुजुर्ग ब्रिगेड का धैर्य टूट सा गया है। इसीलिए पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर से लेकर वरिष्ठ नेता रघुनंदन शर्मा और बुजुर्ग विधायक सरताज सिंह ने जो बातें कही हैैं वे बताती हैैं कि कुछ लोगों को छोड़ सत्ता और संगठन में ज्यादातर कार्यकर्ता घुट घुट कर जी रहे हैैं। इवेंट में बदली भाजपा के लिए यह चुनावी साल लगता है भारी पडऩे वाला है। वजह यह है कि श्री गौर कहते हैैं कि हमने ज्योतिरादित्य सिंधिया को अभिमन्यु समझा था मगर अटेर के बाद कोलारस मुंगवली चुनाव जीत उन्होंने साबित कर दिया कि वे भाजपा के चक्रव्यूह के तोडऩे वाले अर्जुन हैैं। इससे दो बातें साफ हो गईं कि राम को मानने वाली भाजपा कौरव भले ही न हो कम से कम पांडव तो नहीं है। इस पर रघुनंदन शर्मा ने चिंता जताते हुए कहा था लगातार हार चिंतन का नहीं अब चिंता का विषय बन रहा है। ऐसे ही सरताज सिंह ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि राजनीतिक माहौल घुटन भरा है। पार्टी में कोई सुनने वाला नहीं है। सुन ले तो समझने वाला नहीं है और वह आगे कहते हैैं अगर समझ ले तो करने वाला नहीं है। वे यहीं नहीं रुकते आगे कहते हैैं कि इस बार का चुनाव साधारण नहीं होगा। अब पार्टी और कार्यकर्ता नहीं बल्कि जन भावनाएं चुनाव लड़ेंगी और यह जन भावनाएं फिलहाल भाजपा के पक्ष में नहीं हैैं। इसके बाद सरताज सिंह कुछ दिन रुककर फिर एक मिसाइल दागी उन्होंने कहा – मेरे बीमार होने पर मेडीकल बिल के लिए कमीशन मांगा गया। पिछले साल तक शिवराज सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे सरताज के इस बयान से प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान तिलमिला जाते हैैं। उन्होंने चेतावनी के अंदाज में कहा मैैं सरताज सिंह की बात असहमत हूं और तल्खी के साथ कहते हैैं यह बात उन्हें पार्टी फोरम में कहनी चाहिए थी। इसके बाद प्रतीक्षा थी शायद संगठन सरताज से उनकी दिक्कत और दर्द पूछ कर इलाज करेगा। अगर सही हुआ तो दोषी पर कार्रवाई और गलत हुआ तो सरताज को नोटिस। मगर दोनों ही बातें नहीं हुईं। इसके बाद सरताज सिंह ने एक और हैरतअंगेज खुलासा किया उन्होंने कहा सिवनी नगर पालिका अध्यक्ष पद केउम्मीदवार का टिकट संगठन मंत्री जितेंद्र लिटौरिया ने पांच लाख रुपये में बेचा था। अब हम इसकी कैफियत में नहीं जाना चाहते। सरताज सिंह वो लीडर हैैं जिन्होंने होशंगाबाद लोकसभा सीट से चाणक्य कहे जाने वाले अर्जुन सिंह को हराया था। अटल जी सरकार में वे कैबिनेट मंत्री थे। इसके बाद शिवराज सरकार में भी पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर रह चुके हैैं। उनकी बात को गंभीरता से पार्टी नहीं लेगी। बीस साल पहले की भाजपा में अगर ऐसे होता तो यह अकल्पनीय बात मानी जाती। मगर अब ऐसा हो रहा है। अध्यक्ष नंदू भैया एतराज तो जताते हैैं लेकिन वे उनके पास मिलने नहीं जाते कि आखिर इतने पुराने नेता तो क्या हो गया है जो वे इस तरह की बातें कर रहे हैैं।
याद होगा 75 पार के फार्मूले के तहत एक साल पहले ही नंदू भैया प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे के साथ सरताज और बाबूलाल गौर के घर इस्तीफा मांगने गए थे तो अब उनका दुख साझा करने क्यों नहीं जा रहे। यहां खतरनाक बात यह है कि भाजपा में संघ से भेजे गए संगठन महामंत्री सुहास भगत और उनकी टीम भी चुप्पी साधे हुए है। ऐसा लगता है कि भगत जी अभी तक अपने को भाजपा में आया हुआ नहीं मान पा रहे हैैं और उनके साथ की बच्चा टीम अभी तक बड़ी नहीं हो पा रही है। ऐसे में पूरा संगठन नानसीरियस हो गया है। इवेंट में बदल चुकी पार्टी ने कार्यकर्ताओं की चिंता करना पहले ही कम कर दिया था और अब जीवन लगाने वाले नेताओं की चिंता भी नहीं हो रही है। गौर और सरताज सिंह के संबंध में कहा जाता है कि उन्हें सरकार से जैसा बेआबरू करके निकाला गया वैसा भाजपा में किसी दुश्मन के साथ भी कोई न करे। अपमानित हो निकाले गए ये नेता और उपेक्षित कार्यकर्ताओं का अब एक समूह से बन रहा है। आगे जाकर यह समूह एक किस्म का प्रेशर ग्र्रुप बनेगा जो चुनाव में टिकट वितरण से लेकर मतदान तक पार्टी के लिए रोज संकट पैदा करेगा। यह सब कार्यकर्ताओं की वजह से नहीं बल्कि संगठन में रंगरूट और इवेंट की टीम की वजह से होगा। एक समय था जब संघ और कार्यकर्ताओं का फीडबैक प्रत्याशी चयन का बढ़ा आधार था। मगर अब हालात बदले और इवेंट और एजेंसियां उम्मीदवार तय करती हैैं। अधिकारी मंत्री तय करते हैैं। ऐसे में उपेक्षित नेताओं का यह कहना कि घुटन है और कोई सुनने वाला नहीं है। इस पर दुष्यंत कुमार यह शेर बढ़ा मौजूं है – यहां कैसे मंजर सामने आने लगे हैैं। गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैैं।

राज्यसभा के लिए अजय और कैलाश ने चौंकाया
भाजपा में तमाम वादविवाद, जोड़तोड़, खरीद फरोख्त, इवेंट, चापलूसी और चम्पूगिरी के बावजूद पार्टी की बुनियाद में शामिल रहे कैलाश सोनी का राज्यसभा के लिए रास्ता दिखा दिया गया है। नरसिंहपुर जिले से संबंध रखने वाले श्री सोनी साफ साफ कहने वालों में शुमार रहे हैैं। मीसाबंदी होने के साथ वे इन दिनों भाजपा की मुख्य पत्रिका चरैवेति के कोषाध्यक्ष हैैं। कई बार बहुत गलतियां होने के बाद भी कुछ काम धोखे से अच्छे हो जाते हैैं उसमें सोनी का चयन माना जा रहा है। हालांकि विक्रम वर्मा, कृष्ण मुरारी मोघे, दीपक विजयवर्गीय, विनोद गोटिया अलबत्ता अपना नाम नहीं आने से दुखी होंगे। यह सब राज्यसभा जाने की कतार में थे। इसी तरह लो प्रोफाइल नेताओं में शुमार विन्ध्य के अजय प्रताप सिंह का नाम भी राज्यसभा के लिए फाइनल हो गया है। अजय प्रताप को भाजपा में निर्देशों का पालन करने वाले नेताओं में माना जाता है। एेसा कहा जाता है कि अजय प्रताप सिंह अब भाजपा में दूर की कौड़ी हंै। इनको लेकर अब सियासत का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। इसके पहले संपतिया उइके का नाम भी राज्यसभा के लिए लोगों को चकित कर गया था।

कांग्रेस का फील गुड
ऐसे ही कांग्रेस ने सदस्यता के लिए शुल्क पांच रुपये से बढ़ाकर सीधा ढाई सौ रुपये सालाना कर दिया है। अभी इसी सदमे से कांग्रेस के चाहने वाले उबरे भी नहीं थे कि टिकिट मांगने वालों के लिए 50 हजार रुपए फीस तय कर दी गई। माना कि कांग्रेस चार विधानसभा उप चुनाव जीतकर उत्साह में है लेकिन टिकिट मांगने के लिए 50 हजार रुपए? यह बात किसी के गले नहीं उतर रही है। इसलिए नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल ने अपनी पार्टी में इस मुद्दे पर विरोध दर्ज कराया है। कांग्रेस की इस नीति पर अभी तो यही कहा जा सकता है कि – बनिया उधार दे नहीं रहा है और अपन कह रहे हैैं कम मत तौलना। जनता आपको 2018 में सत्ता सौपेगी या नहीं मगर अभी से कांग्रेस इतनी फील गुड में आ गई कि उसे लगा डिमांड बहुत है क्यों न सदस्यता के बाद अब टिकिट मांगने वालों से वसूली हो जाए। अलग बात है कि करीब सौ आवेदन आ गए हैैं और लगभग 25 ने पचास हजार रुपए जमा भी कर दिए हैैं। बेशक भाजपा के खिलाफ इंटीइनकम्वेंसी है लेकिन कांग्रेस में ऐसे कितने नेता हैैं जो इस विरोध को पार्टी पक्ष में इतना भुना सके कि सरकार बन जाए। कह सकते हैैं कि 2003 के पहले जो कांग्रेस सत्ता में थी उसे 15वें साल में भी लगता है हरा ही हरा दिख रहा है।
(लेखक आईएनडी 24 के समूह प्रबंध संपादक हैं)