ढोंग-पाखंड रहित दिग्विजय की नर्मदा परिक्रमा….

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ज़हीर अंसारी

जटिलो मुण्डी लुञ्छितकेशः, काषायाम्बरबहुकृतवेषः।
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः,
उदरनिमित्तं बहुकृतवेषः ॥१४॥

बड़ी जटाएं, केश रहित सिर, बिखरे बाल , काषाय (भगवा) वस्त्र और भांति भांति के वेश ये सब अपना पेट भरने के लिए ही धारण किये जाते हैं, अरे मोहित मनुष्य तुम इसको देख कर भी क्यों नहीं देख पाते हो ॥१४॥

आदि शंकराचार्य रचित ‘भज गोविंदम’ का यह स्त्रोत भले ही सामान्य व्यक्ति की समझ में न आए पर विवेकशील व्यक्ति इसे आत्मसात कर लेता है। उदाहरण के तौर पर मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इसे अपने जीवन का आधार मार्ग बना लिया है। आडंबररहित हिंदुत्व के पैरोकार दिग्विजय सिंह कई बार यह वक्तव्य दे चुके हैं कि वे सच्चे सनातनी हैं, कट्टर नहीं। धर्म-अध्यात्म में पूर्ण विश्वास रखने वाले दिग्विजय सिंह सपत्निक इन दिनों नर्मदा परिक्रमा पर हैं।

राघोगढ रियासत के राजा दिग्विजय सिंह दस सालों तक मप्र के मुख्यमंत्री रहे। भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित नेताओं में श्री सिंह को शुमार किया जाता है। हर विषय और मुद्दे पर बेबाक़ राय देना और ट्वीट करना उनकी ख़ासियत है। इसके एवज़ में उन्हें बेशुमार आलोचनाएँ भी झेलनी पड़ी। पत्नी आशा रानी सिंह के निधन के बाद जब उन्होंने पत्रकार अमृता राय से विवाह किया तो भी उन पर ख़ूब छींटा-कशी की गई। विचलित होना शायद उनकी फ़ितरत नहीं है इसलिए आलोचनाओं और राजनीति की ऊँच-नीच दरकिनार रखते हुए माँ नर्मदा की शरण में आ गए। यूँ तो दिग्विजय सिंह शुद्ध आध्यात्मिक मानसिकता के व्यक्ति हैं और जगतगुरु द्विपीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज के विशेष कृपापात्र शिष्य हैं। सनातन धर्म में घोर आस्था के बावजूद सर्वधर्म समभाव में उनका विश्वास है।

दिग्विजय सिंह की सनातनी आस्था का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि 70 वर्ष की आयु में नर्मदा परिक्रमा का संकल्प किया और पत्नी सुश्री अमृता राय के साथ पैदल परिक्रमा पर निकल पड़े। 30 सितंबर से प्रारंभ उनकी परिक्रमा यात्रा क़रीब 24 सौ किलोमीटर की दूरी तय कर चुकी है। सिंह दम्पत्ति पूरी आस्था और हृदयी भाव से अपने संकल्प को पूरा करने की दिशा में अग्रसर हैं।

नर्मदा परिक्रमा करने वाले दिग्विजय दम्पत्ति कोई अनोखे नहीं हैं। हज़ारों-लाखों सालों से नर्मदा परिक्रमा का सिलसिला अनवरत चला आ रहा है। धर्म शास्त्र कहते हैं कि सर्वप्रथम भगवान श्रीराम ने त्रेता युग में नर्मदा की परिक्रमा की थी। वनवास के दौरान जब भगवान राम श्रीलंका जाते वक़्त नर्मदा तट पहुँचे तो उन्होंने नर्मदा नदी का लंघन करना अपनी मर्यादा के विपरीत समझा। चूँकि नर्मदा चिर कुँआरी और पतित पावनी थी, लिहाज़ा पर्याप्त सम्मान देते हुए उन्होंने लंघन करने की बजाय एक तट से दूसरे तट तक घूमकर पहुँचे। कहते हैं तभी से नर्मदा परिक्रमा का सिलसिला शुरू हुआ।

हर साल हज़ारों श्रद्धालु इस पवित्र नदी की परिक्रमा करते हैं। जिसमें हर उम्र के लोग शामिल होते हैं। धनवान-अधनवान सभी अपने-अपने भाव और संसाधन से परिक्रमा करते हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. अनिल माधव दवे ने हेलीकाप्टर से परिक्रमा की थी तो पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री एवं सांसद प्रह्लाद पटैल पैदल नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं। अब दिग्विजय सिंह कर रहे हैं तो इसमें कोई नयापन नहीं है, अधिकांश लोग यही सोच रहे हैं और कई लोग इस यात्रा को राजनीतिक नेत्र से देख रहे हैं। ख़ैर, सबका अपना व्यक्तिगत नज़रिया होता है, इस पर ज़्यादा चिंतन की आवश्यकता नहीं है।

चिंतन तो इस बात पर किया जाना चाहिए धन-दौलत, मान-प्रतिष्ठा और संसाधनों से युक्त कोई राजनेता जब परिक्रमा करे तो ज़रूर उसकी धार्मिक आस्था कितनी प्रगाढ़ होगी, इसका सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है। आश्चर्य इस बात पर भी किया जाना चाहिए कि दिल्ली की पाँच सितारा संस्कृति में रची-बसी उनकी पत्रकार पत्नी अमृता राय भी क़दम-क़दम से मिलकर साथ दे रही हैं। वे भी पूरी श्रद्धा और भारतीय संस्कारों को सहेजे परिक्रमा में लीन हैं। साथ-साथ नर्मदा नदी के सौंदर्य और ग्रामीण इलाक़ों का अध्ययन करती जा रही हैं।

दिग्विजय सिंह की परिक्रमा पर तरह-तरह के क़यास लगाए जा रहे हैं। वे किस संकल्प से यह परिक्रमा कर रहे हैं, यह तो वो ही जाने, पर नर्मदा जी को सिद्धीदात्री भी माना जाता है। बड़े-बड़े संत-महात्माओं ने यहाँ से ज्ञान और सिद्धियाँ प्राप्त की है। शायद राघोगढ रियासत के राजा दिग्विजय को भी कोई तत्वज्ञान की तलाश हों।

दिग्विजय दंपति को नर्मदा किनारे चलते-चलते साढ़े चार महीने हो गए। ऊँचे-नीचे पहाड़, छोटी-छोटी पगडंडियों और दुर्गम मार्गों से गुज़रते हुए भी दिग्विजय दंपति की आस्था डिगी नहीं बल्कि और मज़बूत होती चली गई। पैरों में छाले पड़े, दर्द-तकलीफ़ सही फिर भी नर्मदा मैया का आँचल थामे अनवरत चलते जा रहे हैं। उनके चेहरे की बेफ़िक़्र मुस्कान और सौम्यता बताती है कि वे अभी भी ऊर्जा से भरे हुए हैं।

चूँकि शुरुआत आदि शंकराचार्य के स्त्रोत से हुई थी तो अंत भी वैसा ही होना चाहिए। शायद राजा साहब की इस धर्म यात्रा का मक़सद तत्वज्ञान अथवा मोक्ष प्राप्ति के लिए भी हो सकता है।

सत्संगत्वे निस्संगत्वं,
निस्संगत्वे निर्मोहत्वं।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं
निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥९॥

सत्संग से वैराग्य, वैराग्य से विवेक, विवेक से स्थिर तत्त्वज्ञान और तत्त्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥९॥