व्यंग = हाँ…..मैं पकौड़ा हूँ, डोंट इन्सल्ट……

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ज़हीर अंसारी
हाँ मैं पकौड़ा हूँ। मेरा जन्म यहीं हुआ है। यहीं लोगों का चहेता बना। हर आम और ख़ास मुझे पसंद करते हैं। गर्मागर्म अगर मैं किसी के सामने आ जाऊँ तो गप्प मुझे भीतर कर लिया जाता है। हर मौसम का मैं माक़ूल भोज्य हूँ। फ़ाईव स्टार से लेकर गली-कूचे तक मुझे तला और बेचा जाता है। बच्चा हो या बूढ़ा सब मुझे पसंद करते हैं। सेहत का ख़्याल रखने वाले मुझे उम्दा तेल में घर के साफ़-सुथरे किचिन में बनाते हैं और लापरवाह लोग कहीं भी मुझे ख़रीद कर खा लेते हैं। ग़रीब और शौक़ीन मेरे आशिक़ हैं। शौक़ीन रेस्टोरेंट में मुझे खाते हैं और ग़रीब सड़क पर। ग़रीब यह भी भूल जाता है कि मैं गर्द से लपटा हुआ हूँ। सड़क पर मैं सस्ते में बिकता हूँ। बेचारे मेहनतकश मुझसे ही अपने पेट की आग बुझा लेते हैं। अमीर मुझे शाही तरीक़े से पकाते हैं। सुबह-शाम तो मुझे हल्की भूख मिटाने या चेंज के लिया खाया जाता है। शौक़ और चटकारे से रात वाले खाते हैं। एक घूँट एक पकोड़े का कोमबिनेशन स्वर्ग सा एहसास कराता है।

सुनों, मेरा नाम लेकर मज़ाक़ उड़ाने वाले मैं तुम सबसे बेहतर हूँ। राजनेताओं और बुद्धिजीवियों की तरह न मैं साम्प्रदायिक हूँ और न ही असहिष्णु। मेरा सेवन हर वर्ग, तबके और धर्म के लोग चाव से करते हैं। सब के पेट में ख़ुशी-ख़ुशी फुदकता हूँ। यह अलग बात है कि तीखी चटनी के साथ लेने पर कभी-कभी किसी को अलसेट भी दे देता हूँ।

हाँ तो बात पकौड़ा रोज़गार से शुरू हुई थी। मैं दशकों से लाखों को रोज़गार पर लगाए हुए हूँ। मेरे कई भाईबंद हैं। हम सबने मिलकर कईयों का परिवार पाल दिया, बिल्डिंग्स बनवा दी। बावजूद इसके मेरा नाम ले लेकर खिल्ली उड़ाई जा रही है। अबे खिल्ली उड़ाने वालों सही सलाह को मज़ाक़ मत बनाओ। मैं ही कम पूँजी का धंधा बचा हूँ। एक भट्टी, एक कढ़ाई, एक झारा, आधा किलो तेल, पाव भर बेसन, पाव भर प्याज़ और चुटकी भर नमक से कोई भी कहीं भी कारोबार शुरू कर सकता है। इस काम में डिग्री, लायसेंस, जगह की ज़रूरत नहीं पड़ती। बस शुरुआत में थोड़ी इज़्ज़त कम रहती है परंतु पकौड़े की क्वालिटी अच्छी बनाई तो इज़्ज़तदार लाईन लगाए खड़े रहेंगे। इज़्ज़त से नाम लेंगे और दाम भी देंगे। आजकल युवा नाइंटी प्लस मार्क्स लेकर बेरोज़गारी का रोना रो रहे हैं। पकोड़े तलने से सस्ता और सुलभ कोई रोज़गार नहीं है। सारी सड़कें और गलियाँ इस व्यवसाय के लिए उपयुक्त स्थान होते हैं।

सुनों, पकोड़े बिरादरी का मज़ाक़ उड़ाने वालों मेरी वजह से ही सेंसेक्स धड़ाम से नीचा गिरा। जानते हो क्यों ? पिज़्ज़ा-बर्गर खाने वालों को पकोड़े से सरकार की मोहब्बत रास नहीं आई। विदेशियों ने शेयर बाज़ार में रुपया इसलिए लगाया था कि गली-गली फ़्रेंच फ़राइज तलेंगे और रुपया कमायेंगे। यहाँ तो उलटा हो रहा है। सरकार पकोड़े तलवाने पर तुली है। लिहाज़ा विदेशियों ने शेयर मार्केट से धड़ाधड़ अपना पैसा निकाल लिया।

बस अब बहुत हो गया। पकौड़ा के नाम पर राजनीति बंद होनी चाहिए। मूल मुद्दे और समस्याओं पर जिरह होना चाहिए और इस पर सरकार और राजनेताओं से जवाब लेना चाहिए। मुख्य मुद्दों से भटके तो यूँ तले जाते रहोगे।