ख़िलजी ख़ुद ही जौहर कर लेता….

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ज़हीर अंसारी

किसी ने सपना देखा। सपने में क्या देखा यह जानने की उत्सुकता सब को होती है। कोई पूछता है क्या देखा, कोई देखे हुए सपने की हक़ीक़त बाबा-टाबा से पूछता है। कोई सपनों को लेकर लिखी किताबों में झाँकता है। किसी को सपने में साँप डस लेता है, किसी को हूर मिल जाती है, कोई मैले में चुपड़ जाता है तो कोई ईत्र के टब में हूरों के साथ नहाता है। सपना है सपनों का क्या। जैसा मर्ज़ी देख लो। सपना ही तो फ़्री है वरना हर चीज़ टैक्स वाली है। उठते ही ख़र्च और टैक्स का मीटर चालू। हैंड वाश किया तो ख़र्च पानी यूज किया तो टैक्स।

ऐसा ही एक सपना कल्लू स्वामी ने देखा। देखा कि संसद लगी हुई है। ( वो वाली संसद नहीं जहाँ हो-हल्ला, नारेबाज़ी, विरोध या बहिर्गमन की परंपरा अपनाई जाती है और पब्लिक मनी के साथ-साथ वक़्त की बर्बादी की जाती है) कल्लू स्वामी ने जो संसद देखी वह सलीक़ा वाली थी। सभी पार्टी के नेता पान-गुटका, सिगरेट के सेवन के बिना हाज़िर रहे। ऊँची से कुर्सी पर सभा प्रमुख विराजमान हुए। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही एक फ़िल्म को लेकर बवाल शुरू हो गया। विपक्ष के सभी सदस्य खुली बहस चाहते थे। वहीं सत्ता पक्ष इसका विरोध कर रही थी। सत्ता पक्ष का कहना था कि यह एक जाति की आन-बान और शान का मसला है, इस पर राजनीति नहीं की जाना चाहिए। सरकार नहीं चाहती कि ऐसी किसी जाति को दबाया या कुचला जाए जो हमारी वोट बैंक है। यह सही है कि एक संवैधानिक संस्था ने फ़िल्म प्रदर्शन की अनुमति दी है पर इस बात गारंटी नहीं दी है कि राज्य सरकारें फ़िल्म को दिखाने बाध्य हैं। उनके पास फ़िल्म दिखाने न दिखाने का ठेका नहीं है। राज्य सरकारें जिसे चाहे प्रश्रय दें, न चाहे तो क़ानून-व्यवस्था की आड़ लेकर किसी भी तरह का प्रतिबंध लगा सकती हैं। आख़िर उन्हें भी अपने अपने वोट बैंक को सुरक्षित रखने का अधिकार है। सत्ता पक्ष का तर्क था कि इस तरह का विरोध कभी भी किसी भी मुद्दों को लेकर उठ सकता है। हमें जनमत मसलों को सुलझाने के लिए नहीं देश को आगे ले जाने के लिए मिला है।

सत्ताधारी नेता अपनी बात पूरी कर पाते उसके पहले ही सिंगल सांसद वाली पार्टी के नेता अपनी शेरवानी ठीक करते हुए बोल पड़े। जिस फ़िल्म पर बहस हो रही है वह फ़िल्म ‘मनहूस’ है। सारा विवाद जानबूझकर खड़ा किया गया। एक सम्प्रदाय विशेष के लोगों को ठेस पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है। नेता जी ने अपनी बात बढ़ाते हुए कहा कि इस तरह की हिंसक घटनाओं पर सत्ता पक्ष की छाती क्यों सिकुड़ रही है। इसी के साथ बहस गर्माने लगी। दूसरे दल भी अपनी बात रखने कसमसा रहे थे। चीख़ना-चिल्लाना चाह रहे थे। कोने-कोने में लगे विडियो के ज़रिए अपनी परफ़ोरमेंस जनता को दिखाना चाहते थे। लेकिन अनुशासनी चाबुक के भय से अपने अवसर का इंतज़ार करते रहे।

चूँकि फ़िल्म एक बहादुर जाति की अस्मिता और स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने वाली थी, और इस जाति के लोगों का रसूख़ भी सियासत को प्रभावित करने वाला है इसलिए सभी दल के नेता इनके साथ खड़ा होना चाहते थे। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता अपनी बाँहें सिकोड़ते हुए बहस में कूद पड़े। कहा…सभासद महोदय फ़िल्म को लेकर खड़ा किया गया विवाद कोई मामूली घटना नहीं है, इसके पीछे गहरी साज़िश है। मैं यह देख पा रहा हूँ कि इसके दूरगामी परिणाम होंगे। यानी देश की सर्वोच्च अदालत जब भी सत्ता विरोधी फ़ैसला देंगी तो उसे जन आक्रोश और जनभावना के नाम किस तरह नज़रंदाज किया जा सकता है, उसका यह प्रयोग मात्र है। इस वक़्त पूरा देश भ्रम की स्थिति में है। देश समझ नहीं पा रहा कि यह अच्छा हो रहा है या बुरा। क्या खाना है, क्या पहनना है, क्या देखना और क्या बोलना है, इसकी स्वतंत्रता संविधान ने आम नागरिकों को दी।

चिकने-चुपड़े विपक्षी नेता अपनी बात पूरी कर पाते बीच में ही एक वज़नदार महिला नेता बोल पड़ीं। फ़िल्म को बेवजह तूल दी जा रही है। जौहर का मुद्दा उठाया जा रहा है।अगर मैं पद्मावत होती तो कभी जौहर न करती। महिला नेता की इस बात पर सज़ायाफ्ता एक नेता तपाक से फ़ुल स्पीड विदाऊट ब्रेक बोल पड़े…ससुरी शक्ल देख अपनी, तुझे देखकर ख़िलजी ख़ुद ही जौहर कर लेता।

उनका इतना बोलना था कि पूरा सदन ठहाकों से गूँज उठा। सत्ता पक्ष से जवाब लेना सभी भूल गए।कल्लू स्वामी भी ठहाका लगाते-लगाते बेड से धड़ाम गिर पड़े।