फिर एक मोड़ पर प्रेस की आजादी

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.जयराम शुक्ल

भारत में प्रेस की आजादी के सवाल को लेकर दो घटनाएं चर्चाओं में हैं। एक गंभीर चिंता में डालने वाली,दूसरी उम्मीदों की लौ को बचाए रखने वाली। इन दोनों को लेकर शुरू हुआ विमर्श भारत में आजाद प्रेस के भविष्य को लेकर निश्चित ही कोई न कोई तस्वीर रेखांकित करेगा मैं ऐसा मानकर चल रहा हूँ।

शुरूआत गंभीर चिंता में डालने वाली घटना के साथ। अँग्रेज़ी अखबार द ट्रिब्यून ने एक खबर छापी कि किस तरह आधारकार्ड की जानकारी कोई भी आसानी से प्राप्त कर सकता है। अखबार की रिपोर्टर ने बाकायदा एक ई-बैंक के माध्यम से ऐसी जानकारी प्राप्त कर बताया कि किस तरह कुछ भुगतान करके आधारकार्ड की गोपनीय जानकारी उसने हाँसिल की।

खबर यह स्थापित करने में समर्थ है कि देश के नागरिकों की निजता जिसे सरकार ने विशिष्ट पहचान पत्र(आधार) के लिए प्राप्त की है उसकी रक्षा करने में अक्षम है। भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण(यूआईडीएआई) ने इस खबर को संग्यान में लिया तो लेकिन सिस्टम को दुरुस्त करने के लिए नहीं अपितु उस अखबार और उसकी रिपोर्टर को दुरुस्त करने के लिए, जिसने प्रमाण के साथ सरकार की नाकामियों का आईना दिखाने का कर्तव्य निभाया।

अखबार व उसकी रिपोर्टर के खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम व आईपीसी की धारा 410,420,468,471 के तहत अपराध दर्ज करवा दिया।

इस घटना को लेकर स्वाभाविक रूप से एडिटर गिल्ड से लेकर तमाम मीडिया संगठनों ने प्रेस की आजादी को लेकर सरकार की नियति पर सवाल उठाया है।

जब हम प्रेस नाम की किसी संस्था की छवि जेहन में लाते हैं तो उससे यही अपेक्षा करते हैं कि वह व्यापक लोकहित व राष्ट्रहित में ऐसी जानकारियों को सामने लाए।

आजाद प्रेस की पक्षधर और लोकतंत्र पर यकीन करने वाली सरकार का ये दायित्व बनता है कि ऐसी जानकारियों का स्वागत करते हुए अपना सिस्टम दुरुस्त करे व ऐसे प्रेस के प्रति आभारी रहे जो उसकी गल्तियों को समय समय पर अवगत कराता है।

लेकिन यहाँ तो ऐसे मामले सरकार के लिए प्रतिष्ठा के प्रश्न बन जाते हैं और उसका पूरा जोर प्रेस की आजादी को कुचलने व तथ्यों को झुठलाने में रहता है।

अमेरिका के लोकतंत्र को हम रोलमाँडल मानते हैं। जब हर नकल उसी की करते हैं तो प्रेस की आजादी के संदर्भ में भी उससे सीख लेनी चाहिए। यहाँ दो उदाहरण दे रहे हैं।

पहला मोरारजी देसाई बनाम सेमूरहर्ष का है। अमेरिका पत्रकार सेमूर ने अपनी एक किताब में मोरारजी भाई को सीआईए का एजेंट लिखा और बताया कि भारत-पाक युद्ध के समय वो डालर लेकर भारत की गोपनीय जानकारी सीआईए से साझा करते थे। किताब 1985 में आई। यद्यपि इसपर भारत में प्रतिबंध लग गया था फिर भी आहत मोरारजी भाई देसाई ने अमेरिकी अदालत में सेमूर के खिलाफ मानहानि और करोड़ों डालर के मुआवजे का मुकदमा दायर कर दिया।

अमेरिकी अदालत में बर्डन आफ प्रूफ मोरारजी पर डाल दिया। यानी कि उन्हें अदालत में यह साबित करना था कि वे निर्दोष हैं। चूँकि सरकार इंदिरा गांधी की थी और वे आवश्यक कागजात हाँसिल नहीं कर पाए जिससे वे अपनी बेगुनाही साबित कर पाते इसलिए इतना बड़ा कलंक लेकर ही स्वर्ग सिधार गए।

अमेरिका में प्रेस की आजादी की सुरक्षा की यह स्थिति है कि उसे कोई चुनौती नहीं दे सकता भले ही उसकी रिपोर्ट वहां के राष्ट्रपति के खिलाफ ही क्यों न हो।

दूसरा मामला वियतनाम युद्ध के दौरान राष्ट्रपति निक्सन से जुड़ा है। 1971 के पेंटागन पेपर्स के मामले में व्हाइटहाऊस ने द न्यूयार्क टाइम्स, द वाशिंगटन पोस्ट व अन्य समाचारपत्रों को वियतनाम युद्ध में अमेरिकी कार्रवाई से जुड़ी सच्चाई को सार्वजनिक करने से रोकने के लिए अदालत से दरख्वास्त की।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए राष्ट्रपति निक्सन को अनुमति देने से रोक दिया कि एक स्वतंत्र प्रेस को वह सब छापने का अधिकार है जो वह जानता है और यदि राष्ट्र के शीर्ष अधिकारी भी इसका विरोध करते हैं तो कोई फर्क नहीं पड़ता।

हम भारत में इन उदाहरणों के बरक्स प्रेस की भूमिका देखें तो आधार वाली घटना सामने आने के बाद सरकार का दायित्व बनता है कि वह खुद यह साबित करके दिखाए कि विशिष्ट पहचान पत्र के डाटा वाकय सुरक्षित हैं, न कि ऐसी खबर छापने वाले के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज कराए।

यह बात सही है कि अमेरिका की तरह भारत में प्रेस की आजादी की गारंटी नहीं है। अमेरिका में तो संविधान में ही प्रेस की आजादी को सुनिश्चित किया गया है।

अमेरिका ने 1791 में बिल आँफ राइट्स के फ़र्स्ट एमंडमेंट में ही मीडिया की आजादी व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को शामिल किया था।

हमारे यहाँ स्थिति भिन्न है। यहाँ प्रेस की आजादी संविधान प्रदत्त नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)ए में जितनी आजादी एक आम नागरिक को है वही आजादी प्रेस को है।

इसलिए जब भी प्रेस से जुड़े ऐसे मसले आते हैं तो प्रेस व उसके रिपोर्टर को एक आम नागरिक के तौरपर ही ट्रीट किया जाता है। प्रेस के लिए अलग से न कोई कानूनी प्रावधान है न ही संवैधानिक सुरक्षा।

प्रेस की आजादी को लेकर अदालतों द्वारा समय-समय पर दी गई रूलिंग्स नजीर के तौरपर काम आती हैं। यह बात अवश्य है की अदालतें खासतौर पर सुप्रीम कोर्ट अभिव्यक्ति की आजादी के संवैधानिक अधिकार के दायरे में ही सही प्रेस को लेकर हमेशा से संजीदा रहा है।

समय-समय पर उसकी व्यवस्थाओं ने प्रेस को सरकारों के कोप से बचाया है। आधारकार्ड वाला मामला निश्चित ही भविष्य में एक नजीर बनेगा जो यह सुनिश्चित करेगा कि भारतीय प्रेस की आजादी का भविष्य क्या है।

पूरे मामले के व्यापक विमर्श में आने के बाद सरकार बैकफुट पर है और किंतु-परंतु की भाषा में उतर आई है। इस प्रकरण को वह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के दायरे में ही लेकर चल रही है। यहां वह अपने लूप्स और होल पर विचार करने के बजाय इसे एक व्यक्ति द्वारा किया गया अपराधिक कृत्य करार दे रही है।

ट्रिब्यून केस अभी उसका पीछा छोड़ने वाला नहीं है। मैं ये उम्मीद कर रहा हूँ कि मसला सुप्रीमकोर्ट तक पहुँचेगा और इसपर निश्चित ही कोई ऐसी व्यवस्था और व्याख्या सामने आएगी जिससे प्रेस की आजादी के दायरे का सीमांकन होगा।

प्रेस से जुड़ी ही दूसरी घटना है एक मानहानि के मामले को लेकर जिसे सुप्रीम कोर्ट की मुख्यन्यायाधीश दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली बेंच ने हाल ही में निपटाया है।

राजदीप सरदेसाई और राघव बहल के खिलाफ बिहार के एक मामले में मानहानि का मामला था। सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी कि भ्रष्टाचार के मामले में व्यापक जनहित में किसी के बारे में यदि कुछ गलत भी लिख दिया गया है उसे इस गंभीरता से नहीं लिया जा सकता।

ऐसे मामलों को व्यापक परिप्रेक्ष में देखा जाना चाहिए। लोकतंत्र में कुछ तो सहनीय बनना पड़ेगा। सर्वोच्च न्यायालय की यह व्यवस्था उम्मीद की लौ को बचाए रखने वाली है।

भारतीय प्रेस को भले ही अमेरिका की भाँति संवैधानिक कवच न मिला हो पर हमारे न्यायतंत्र के विचार प्रेस की भूमिका को लेकर स्पष्ट हैं, यह संतोष की बात है।

आज हर एनड्रायड फोन धारक मीडियाकर की भूमिका में है। अभिव्यक्ति की आजादी का वह भी उतना ही उपभोग कर रहा है जितना कि कोई मीडिया संस्थान और उसके कर्मी। ऐसे में इस स्पष्टता की जरूरत तो है ही कि आम आदमी और मीडिया के बीच फर्क क्या है? प्रेस की आजादी को लेकर भविष्य का यही विमर्श है जिसे ये दो घटनाएं प्राथमिकी के तौरपर रेखांकित करेंगी।