किसान योजनाओं का लाभ ग़ैर किसान डकार जाते हैं……

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ज़हीर अंसारी
सरकार कोई भी हो सरकार होती है। सरकार में आत्मा नहीं होती, शायद इसलिए कचोटती नहीं। कचोटन वहाँ होती हैं जहाँ आत्मा, हृदय और संवेदनाएँ होती हैं। संवेदनाएँ हमेशा ही मरने पर कचोट जाती है। किसान मरे, व्यापारी मरे, दवा-इलाज के बिना मरीज़ मरे या सड़क हादसों में बच्चे-जन मरें सरकार निष्ठुर ही रहती है। सरकार का कोई चेहरा भी नहीं होता जो उसके चेहरे पर शिकन ला दे।

पिछले कई दशकों से किसान आत्महत्याएँ कर रहे हैं। अधिकांश मामलों में क़र्ज़ और बीमारी की कहानी सामने आती है। आज़ादी के पहले से किसानों की दुर्दशा पर सियासत होती आ रही है और आज भी हो रही है। किसान की हालत जस की तस बनी है। इसके किसान स्वयं ज़िम्मेदार हैं,सरकारें या फिर राजनैतिक दल यह बहस का मुद्दा हो सकता है लेकिन एक चीज़ अडिग है वो है लूट। किसानों के नाम पर लूट चाहे सिस्टम मचाए या कोई और, लूट का धन जनता का ही होता है।

लूट का ताज़ा उदाहरण है किसान फ़सल बीमा योजना। किसान फ़सल बीमा योजना के तहत इंश्योरेंस कम्पनियों के पास लगभग 16 हज़ार करोड़ रुपए पहुँच गए। यह राशि किसान व सरकारों द्वारा प्रीमियम के तौर पर जमा कराई गई हैं। इसके उलट कुल सात सौ करोड़ रुपए किसानों को फ़सल नुक़सानी पर वितरित किया गया है। यह आँकड़े लोकसभा में सरकार ने पेश किए हैं।

इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि किसानों के नाम पर कैसे कम्पनियों का पेट भरा जा रहा है जबकि किसान भूख, क़र्ज़ और बीमारी से आत्महत्याएँ कर रहा है। कहने का आशय यह कि किसान के नाम पर जितनी भी योजनाएँ बनाई जाती है उस मोटा फ़ायदा ग़ैर-किसान डकार जाते हैं। ये देश के वो किसान हैं जो प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप से आधी से ज़्यादा आबादी का पेट भरते हैं।