मासूम बेटियाँ छोड़ गईं सिसकियों का सैलाब….

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ज़हीर अंसारी
इंदौर में कल जब चार मासूम बेटियों का अंतिम संस्कार हो रहा था तो पत्थर दिल भी पसीज गए थे। उफ़, ये क्या हुआ। जिसने भी इस दर्दनाक हादसे को सुना, टीस से भर गया। बच्चों की कोई धर्म-जाति नहीं होती है। होती है तो सिर्फ़ उनमें मासूमियत जो हर किसी को मोहित कर जाती है।

चार मासूम बच्चियों का सड़क हादसे में चला जाना, सिस्टम और शासन-प्रशासन के मुँह पर तमाचा है। काहे का शासन, काहे का प्रशासन, आख़िर इनकी आँखों में सड़कों पर लगातार मरने वालों का बहता गर्म ख़ून नज़र क्यों नहीं आता है। देश की छोड़े सिर्फ़ मध्यप्रदेश की बात करें तो आए दिन सड़कों पर ख़ून बह रहा है। धड़ाधड़ लोग मर रहे हैं, हज़ारों ज़ख़्मी हो रहे हैं। फिर भी शासन-प्रशासन के मुखमंडल पर शिकन का नामोनिशान नहीं दिखता। बड़े हादसे के बाद ज़रूर बड़े-बड़े वायदे और घोषणाएँ कर दी जाती हैं परंतु नतीजा वही ढाक के तीन पात।

पिछले कुछ सालों के हादसों पर दृष्टिपात करें तो पाएँगे प्रदेश का कोई ऐसा कोई कोना नहीं हैं जहाँ पर सड़क हादसों में मौतें न हुई हों। क्या आम, क्या ख़ास, क्या विधायक, क्या अफ़सर सब सड़क दुर्घटनाओं का शिकार बन रहे हैं।

किसी भी मौत पर शोक जताना चलन सा बन गया है। नेता तो नेता अफ़सरान भी एक-दो दिवसीय अभिनय करके अपने वास्तविक कर्तव्यों से इतिश्री कर लेते हैं। इस तरह की घटनाओं में कमी आए इसके लिए अब तक कोई ठोस प्लान नहीं बनाया गया। इतना ज़रूर होता है कि घटना के ज़िम्मेदार पर आनन-फ़ानन कार्रवाई कर मामले को शांत कर दिया जाता है। यही इंदौर घटना पर किया जा रहा है।

ईश्वर, अध्यात्म और मानवता के पैरोकर कब तक सड़कों पर होने वाली मौतें पर गाल बजाते रहेंगे। ज़िम्मेदार अमला कब तक मलाई की लालच में मौतों का गवाह बनेगा।

कोई उस दिल को फटता देखे जिसके अपने कालकलवित होते हैं। शासन-प्रशासन कभी भुक्तभोगियों की आँखों में आँखे डाल कर आँसुओं की धार का अंदाज़ा लगाए। हो सकता है इसके बाद संवेदनाओं के द्वार खुल जाएँ।

इंदौर की कृति, श्रुति, हरमीत और स्वस्तिक ऐसी मंज़िल को कूच कर गई जहाँ से अब तक कोई लौट न सका। चारों बेटियां अपने परिजनों के लिए सिसकियों का सैलाब छोड़ गईं। परमात्मा न करे अब के बाद किसी माँ पर ऐसा व्रजपात हो। वेंटिलेटर के सहारे ज़िंदगी से लड़ रही ख़ुशी, शिवांग, अरीवा सहित गंभीर बच्चे शीघ्र स्वस्थ्य हों, ऐसी प्रार्थना है।