संवेदना…तू मर क्यों नहीं जाती…

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राघवेंद्र सिंह –
दो दिन पहले की बात है, हमारे इंदौर में कलेजा फाड़ने वाला हादसा हुआ। बच्चों से भरी स्कूल बस ट्रक से टकराई। घर लौटते बच्चे स्वर्ग चले गए और मां-बाप इंतजार करते ही रह गए। जिन आंखों के तारों को सुबह कड़कड़ाती सर्दी में स्वेटर मोजे और मफलर में भेजा था, किसे पता था कि कफन में लिपटे मिलेंगे। जिनके शरीर में आलपिन चुभना भी मंजूर नहीं था उनकी देह कटर से काटकर निकाली गई। देखकर आंखें गंगा-जमुना बन गईं और सिसकियां चीत्कार में बदल गईं। ऐसे में शोक जताने पहुंचे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साहस को सलाम…लेकिन एक विलाप करती मां ने उन्हें जो कुछ कहा वह बताता है कि सियासत में संवेदनाएं शून्यता को प्राप्त हो गई हैं और सब फिल्मी अदाकारी सा लगता है। लीडर को कहां कितना रोना है, गुमसुम रहना है, कब मुस्कराना और हंसना है। इंदौर डीपीएस बस हादसे में बेसमय मौत के मुंह में पहुंचे नौनिहालों को देख शायद यमराज भी रो दिए हों, क्योंकि उनकी मां की चीखें उनसे भी सही नहीं गई होंगी। मगर हमारी सरकार, उसका तंत्र सब इसे महज एक घटना मान औपचारिक बयान…कड़ी कार्रवाई करेंगे। हमें बहुत दुख…जैसी बातें कर अगले हादसे की प्रतीक्षा में दूसरे काम में जुट गया। इसलिए हम कहते हैं, हुकूमत में बैठे ज्यादातर लोग परमहंस हो गए हैं। इसलिए “ए-संवेदना तू मर क्यों नहीं जाती” ताकि ये सब रोने धोने और लिखने-बोलने का किस्सा ही खत्म हो जाए। भौतिक युग है। हर बात की कीमत अदा की जाती है। या यूं कहें हर चीज कीमत अदा कर खरीदी जाती है। किसान मरे एक-एक करोड़ रुपए मुआवजा लो। वोट का सवाल है। सरकार और लीडर की इमेज का मामला है। यही सब निकट भविष्य में होने वाले दो विधानसभा उपचुनाव मुंगावली, कोलारस में होता तो क्या होता। सरकार के साथ चुनाव लड़ने वाली तमाम पार्टियां उनके समर्थक अकेले खुद नहीं रोते बल्कि रुदालियां साथ ले जाते। रुदालियां राजस्थान में होती हैं। उन्हें रोने के ही रुपए-पैसे मिलते हैं। दरअसल बड़े लोग रो नहीं पाते, शोक नहीं जता पाते तो यह सब करने रुदालियां बुलवाई जाती हैं।
इंदौर में चुनाव नहीं हैं सो बिना रुदालियों के कोरी संवेदना और ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार के अंदाज में नेताओं ने शोक प्रदर्शन कर दिया। कुछ दिन और ऐसा करते रहेंगे जब तक कोई दूसरी घटना न हो जाए या लोग भूल न जाएं। पुराने जमाने के लोग और सिने जगत में दिलचस्पी रखने वाले दिलीप साहब को जानते होंगे। उनकी डायलाग डिलेवरी को फुसफुसा के बोलने के दिल छू लेने वाले अंदाज को। राजनीति में सफल नेताओं ने दिलीप कुमार और महानायक अमिताभ बच्चन को नौटंकी में पीछे छोड़ दिया है। ऐसा इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि हादसों और मौतों पर पहले दिल की बात करते थे मानो उनके घर ही ये हादसे हो गए हों। मगर अब वे प्रशासनिक भाषा में प्रतिक्रिया देते हैं। मसलन…इंदौर हादसे की मजिस्टि्रयल जांच 15 दिन में पूरी कर ली जाएगी। आरटीओ को हटा दिया गया है। कोई यह नहीं कहता कि जांच कर कार्रवाई कितने दिन में होगी। दोषियों पर कार्रवाई से पहले जिम्मेदार आरोपियों को बचाने के लिए उनके नाम तक लेने से बचते रहे, जैसे भारतीय महिलाएं 18वीं सदी में अपने पति का नाम लेने से कतराती थीं। इंदौर डीपीएस में बच्चों की जान गई है। जो देश का भविष्य बनते। कह सकते हैं भविष्य को मारा है हमने। उसमें दोषियों को क्लीन चिट देने की तैयारी हो चुकी है। सारा गुनाह ड्राईवर के माथे मढ़ दिया गया है कि वह बहुत तेज 70-80 की स्पीड से बस चला रहा था। हादसे में बेचारे ड्राईवर की मौत हो गई है जिंदा होता तो वह सच्चाई बताता। माफी के साथ गुनहगार उसके मर जाने की खुशियां मना रहे हों तो हैरत नहीं। फिर देखिए स्कूल के साथ परिवहन अधिकारी और स्पीड गर्वनर लगाने वाली कंपनी के अधिकारी-कर्मचारी पर एफआईआर दर्ज की गई है। दो दिन बाद माननीय आरटीओ एमपी सिंह को हटाने की सजा दी गई है जबकि ये काम घटना के कुछ घंटे में हो जाना चाहिए था। अब कहा जा रहा है कि 15 साल से ज्यादा पुरानी बसें स्कूल में नहीं चलाई जाएंगी। जबकि खास बात ये है कि दुर्घटनाग्रस्त बस का 2009 से बीमा ही नहीं था तो फिटनेस कैसी. .
स्मरण कीजिए झाबुआ के पेटलावद के बस स्टैंड पर हुए डायनामाईट विस्फोट की। धमाका ऐसा कि 89 लोगों की मौत हो गई। पूरे देश में अपने ढंग का यह पहला मामला था जो आतंकी घटना के अलावा हुआ।लोग अपने घर जाने के लिए बसों की प्रतीक्षा में थे और विस्फोट में उनके चीथड़े उड़ गए। मांस के लोथरे दीवारों पर चिपक गए और तारों पर लटक गए। रतनगढ़ देवी मंदिर में हुई भगदड़ में 115 से ज्यादा लोग मरते हैं। पन्ना में बस में लगी आग से 40 से अधिक यात्री बुरी तरह जलकर मर जाते हैं। उनकी पहचान भी मुश्किल हो गई थी। अस्पतालों में बच्चों को आक्सीजन लगाई जाती है और सिलेन्डर खाली होने से वे मर जाते हैं। यह हादसा भी इंदौर में हुआ था। उजाले को चक्कर में लोग मोतियाबिन्द का आपरेशन कराते हैं बदले में उनकी आंखें ही फूट जाती हैं। 31 अक्टूबर की रात भोपाल में कोचिंग से घर जा रही पुलिस कर्मी की बिटिया सामूहिक बलात्कार की शिकार होती है और दो दिन तक रिपोर्ट लिखाने के लिए थाने-थाने भटकती है। ऐसे मामलों की फेहरिश्त तो बहुत लंबी है लेकिन कोर्ट को साधुवाद की उसने दो माह के भीतर चारों आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।इससे गई इज्जत तो नहीं लौटेगी मगर जख्मों पर मरहम जरूर लगा। मगर ऊपर लिखी घटनाओं में किसी को याद है पेटलावद,रतनगढ़ औऱ पन्ना के आरोपियों को क्या सजा मिली। कितने अफसरों पर मुकदमे चले और कितने बर्खास्त हुए।
ऐसे ही दिल्ली पब्लिक स्कूल की बस टक्कर में दुनिया छोड़ गए चार मासूम तो नहीं लौटेंगे, मां-बाप उनकी दिल जीतने वाली मस्ती नहीं देख पाएंगे। मगर हादसे के बड़े से बड़े जिम्मेदारों के खिलाफ कठोर कार्रवाई में देरी होनेसे लोगों के दिल जरूर दुखे हैं। सरकार और प्रशासन को बददुआएं भी मिली हैं। हादसे तो होते रहेंगे। गुस्सा तब आता है जब त्वरित और प्रभावी कार्रवाई नहीं होती। परिजन डाक्टर से तब लड़ते हैं जब इलाज में लापरवाही होती है। वरना कहते तो सब यही है कि कोशिश तो बहुत की बचाने की लेकिन भाग्य में नहीं था। बस का 26 साल के राहुल यादव की कहानी भी दुखद है उसके मरने के बाद परिवार अनाथ हो गया। उसके पिताजी पहले से ही नहीं है। मां के साथ अब पत्नी भी अब खाली हाथ हो गई है। उसके दो बेटियों में एक तो 14 दिन की है जिसका उसने अभी मुंह भी नहीं देखा है। ताऊ मानसिक रूप से बीमार है जो उसी के साथ रहते हैं। आखिर में बस इतना ही कि…अक्सर मां बच्चों को कई बार इसलिए डांटती है कि वे स्कूल से शर्ट में स्याही लगाकर आते हैं। इंदौर डीपीएस हादसे में तो बच्चों के कपड़े भी रक्त से सने हुए थे फिर वे घर कैसे लौटते…जिंदगी भर के लिए बिलखता हुआ छोड़ गए मां-बाप को । उन्हें भी रुला गए जिन्होंने देखा और सुना। इसलिए हम फिर कहेंगे, संवेदना तू मर क्यों नहीं जाती।
सियासी बदलाव की प्रसव पीड़ा
मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा का नेत=त्व परिवर्तन की प्रसव पीड़ा के दौर से गुजर रहा है। भाजपा में अध्यक्ष और संगठन महामंत्री किसान इनकी टीम में मतभेद के चलते हाईकमान चिंतित है। चुनावी साल होने की वजह से दोनों नेताओं की अनबन टिकट वितरण के दौरान विवाद गहरे कर सकती है। एेसे में पिछले दिनों बदलाव की खबरें पंख लगाये उड़ रही हैं। संघ परिवार भी इसे लेकर चिंतित है। संघ प्रमुख मोहन भागवत और राष्ट्रीय अमित शाह की प्रदेश यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह व राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय की बड़े नेताओं से मुलाकात को परिवर्तन की संभावना से जोड़कर देखा जा रहा है। प्रदेश प्रभारी कौन होंगे इसको लेकर भी अटकलों का बाजार गर्म है। इसी तरह यही हाल प्रदेश कांग्रेस का है। यहां भी लंबे समय से प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव को बदलने की चर्चाएं चल रही हैं लेकिन अभी ताजा अनुमान यह है कि यादव को हटाने के बजाय उन्हें दो सहयोगी दिये जा सकते हैं। मगर पार्टी नेता कितना स्वीकार करेंगे यह भी देखा जाना है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल को दो कार्यकारी अध्यक्ष चुनाव मंे सहयोग करने को दिये हैं। यह फार्मूला मध्यप्रदेश में लागू हुआ तो अरुण यादव पद पर बने रह सकते हैं। अभी तक दोनों पार्टियों में बदलाव का मामला एेसा लगता है लेबर रूम में है और बाहर खड़े लोग प्रसव की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
(लेखक आईएनडी 24 के समूह प्रबंध संपादक हैं)