जिस बात का खतरा है समझो कि वो कल होगी……..

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जयराम शुक्ल

नए साल की शुरुआत उम्मीद के हिसाब से नहीं हुई। महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगाँव की घटना से उपजी हिंसक घृणा ने सूरज की किरणों को ज्वलनशील बनाकर लपटों में बदल दिया। आधे भारत में बर्फवारी और शीतलहर के बीच उसकी आँच यहाँ तक महसूस हो रही है। स्लेट पर
लिखी इबारत की तरह कोई भी साफ-साफ पढ़ सकता है कि इस घटना की पीछे क्या है, और आगे क्या होने वाला है। जिस तरह इतिहास के गड़े मुर्दे उखड़ने शुरू हो गए हैं, उससे तो अब ऐसा ही लगता है कि 2019 की चुनावी जंग इसी संडाध के बीच लड़ी जानी है।

भीमा-कोरेगाँव की घटना से जो संदेश देना था वह सहजता से ही मीडिया ने प्रसारित कर दिया, बिना किसी पैकेज के लिए-दिए।
देश के जन-जन को नए सिरे से दलित आँदोलन के एक इस कथित इतिहास से भी बवास्ता करा दिया। मैं खुद भी इतनी तफ्सील से दो सौ वर्ष पूर्व हुए उस युद्ध के बारे में नहीं जानता था जिसकी बरसी का जश्न मनाने के अवसर पर ये सब हुआ। फौरीतौर पर मेरी तरह सोचने वाले हर भारतीय को इस पर दुखमिश्रित आश्चर्य होगा कि पेशवा साम्राज्य पर अँग्रेजों की विजय का जश्न हम भारतीय भी मनाते हैं। महाराष्ट्र से बाहर यह इतिहास का छिपा पहलू है। जबकि वहाँ के दलितों के लिए यह उनके मुक्ति का पर्व है, जो अँग्रेजों की मदद से पेशवाओं से मिली। मालूम हो कि इस इतिहास से परिचित कराने वाले वही इतिहासकार हैं जो अकबर को महान बताते हैं और शिवाजी को डाकू, छापामार, लुटेरा। आज के समय में इसका इसलिये और भी महत्व बढ़ जाता है क्योंकि पेशवा जाति से ब्राह्मण थे और अँग्रेजों की ओर से लड़ने वाले महार लोगराजनीतिक लफ्जों में दलित, भले ही यह दो सौ वर्ष पहले अँग्रेजों के बाँटो और राज करो की नीति का उत्कृष्ट नमूना रहा हो। यह जानने के बाद इस बात को भी ध्यान में रखना होगा कि अँग्रेजोंने कुलीनों, राजाओं,सामंतों,पंडों और मौलवियों की भी इज्जत बख्श कर उनका इस्तेमाल जनता के दमन के लिए व स्वतंत्रता संग्रामियों और क्राँतिकारियों के खिलाफ किया था।

राजनीति में शब्द की कितनी महत्ता होती है गुजरात चुनाव में देखने को मिली। इस ‘नीच’ शब्द ने ही ऐन वक्त पर सब उलटा-पलट किया है ऐसा चुनाव विश्लेषक मानते हैं। गुजरात जो वास्तव में आर्थिक विकास का प्रादर्श रहा है जब वहां का चुनाव ‘नीच’ और ‘जनेऊ’ बीच सिमट गया तभी से यह लगने लगा कि इसका विस्तार होगा। गुजरात का चुनाव और उसकी बानगी संविधान की आत्मा जिसमें कास्ट, क्रीड, रेस, रिलीजन से ऊपर उठकर राज की नीति के लिए संकल्प है, को धूलिधूसरित करने वाली रही। जाति, संप्रदाय और धर्म से परे रखने की जो चुनाव आयोग की संहिता है उसका भी आदर्श कच्छ के नमक की खंतियों में गल गया। अधिकार के लिए संघर्ष की लफ्फाजी को लेकर अराजक घृणित व जातीय एजेंडा लेकर जो तीन युवा उभरे उन्हें वोट के सौदागरों ने युवा ह्रदय सम्राट बनाकर अपनी गोद पर बैठा लिया। दूसरी तरफ चट्टानी दृढता की कसम खाने वालों का ‘सबका साथ-सबका विकास’ का मडवा चरमरा गया वे भी ‘नीच’ गली तक उतर आए। अरब सागर से उठी पछुआ हवाएं इन बातों को ले उड़ीं हैं। महाराष्ट्र में यह उनका पहला फलितार्थ है। जिसका अभी आगे और विस्तार होगा। बात जल्दी सँभलेगी, फिलहाल इसकी कोई सूरत नजर नहीं आ रही है।

यह सही है कि देश में जाति के आधार पर शोषण और अत्याचार हुए हैं। इस सिलसिले ने ही अँबेडकर साहब की प्राणप्रतिष्ठा की और राजनीति में कांशीराम जैसे महानायक को गढ़ा। आजादी के बाद से यह वर्ग सिर्फ वोटबैंक रहा। इसीलिए जब कांशीराम ने नारा दिया कि वोट हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगा तो समूचे दलित समाज ने अँगड़ाई ली और राज में अपना हिस्सा लेना शुरू किया। दलितों की इस चेतना को अपने-अपने हक में हड़पने की ऐसी होड़ मच गई कि एक के बाद एक नए खिलाड़ी कूदते गए। कुछ दलितों के नाम पर तो कुछ पिछड़ों के नामपर। सामाजिक-राजनीतिक वर्गीकरण इतना सिकुड़ता गया कि दलित, अतिदलित, महादलित,में परिभाषित हो गए। इसी तरह पिछड़े भी और अब उससे आगे सिर्फ़ जाति मसलन-पाटीदार,गूजर,जाट,मीणा। पर गौर करने की बात ये कि जहाँ जिनको इस वर्ग ने अपना भरोसा सौंपा भी वे हजार करोड़िया मायावती, लाख करोड़िया लालूजी और न जाने कितने अरबिया मुलायमजी के रूप में उभरकर लोकतंत्र के मंदिरों में प्रतिष्ठित हो गए। जिन गरीब-गुरबों ने इन्हें अपना मुक्तिदाता चुना वे वहीं के वहीं रह गए। सोशल जस्टिस इनके लिए चोंचल जस्टिस ही बना रहा। इसलिये अब इनके जो नए खेवनहार हैं उन्हें कांशीराम और इन सोकाल्ड चोंचलिस्टों से कुछ अलग, कुछ हटकर करके दिखाना होगा। इसके लिए नई भाषा, नए करतब दिखाने होंगे। कब्रिस्तान से इतिहास की कुछ सड़ी गली हड्डियां निकालनी होंगी ताकि कुछ सनसनीखेज तिलस्म रचा जा सके। भीमा-कोरेगाँव को महज एक शुरुआत समझें।

राजनीति जब रीढविहीन हो जाती है तब वह हवा के झोंके की दिशा में ही झुकती है। हर दलों की लगभग एक सी मार्फालाँजी है। सभी एक से स्केलटन-चेचिस पर टिके हैं। सिर्फ लुभाने के लिए रूप अलग-अलग हैं ऐसा आप कह सकते हैं। और जब यह दशा है तो किसको कहें मसीहा किस पर यकीं करें..? रुग्ण शरीर पर वायरस तेजी से फैलते हैं। देश के लोकतंत्र की तंदुरूस्ती व तबियत की फिकर किसे ?

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