क्या मुल्क का मीडिया हाईजैक हो गया ?

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ज़हीर अंसारी
देश की पत्रकारिता को ग्रहण लग चुका है। मीडिया के सभी माध्यम अपनी-अपनी ढपली में अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। कोई इनका तो कोई उनका स्तुतिगान कर रहा है। गान भी ऐसा जो देश की एकता-अखंडता के लिए लाभकारी नहीं कही जा सकती। मीडिया हाउज़ेज़ और मीडिया पर्सन किसी विशेष खूँटे से बंध चुके हैं। पत्रकार की जगह मीडिया पर्सन का शब्द इसलिए इस्तेमाल किया जा रहा है कि पत्रकार समग्रता पर चिंतन करता है और समाज को अपने चिंतन तथा व्यवस्था की हक़ीक़त से अवगत कराता है।जबकि मीडिया पर्सन बंधुआ मज़दूर की तरह काम करता है। ये वही सामग्री परोसते हैं जो उनके खूँटे को मज़बूत करता है। ऐसा करते समय मीडिया पर्सन देशहित, नागरिक हित, और आपसी सौहाद्र पर पड़ने वाले दूरगामी परिणामों को भूल जाते हैं। तात्कालिक लाभ के लिए कुछ भी करने वाले मीडिया पत्रकारिता के अविस्मरणीय हस्ताक्षर स्व. श्री गणेशशंकर विद्यार्थी के बलिदान को भी याद नहीं रखते। भले ही पत्रकारिता का पाखंड करते हुए उनका नाम बार-बार लें लेकिन उनके किरदार को अमल में बिलकुल नहीं लाते। गणेशशंकर जी ने साम्प्रदायिक सौहाद्र के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी।जान क़ुर्बान होने तक वे देश की एकता-अखंडता के लिए लिखते-पढ़ते रहे। यही नहीं हर स्तर पर प्रयास करते रहे कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सब एकजुट होकर अंग्रेज़ी हुकूमत से मुक़ाबला करें।
आज की पत्रकारिता ने उनके सिद्धांतों को उलट कर रख दिया। पत्रकारिता की परिभाषा भी बदल दी। ठीक है उस दौर के पत्रकार आज़ादी के धुनी थे, अब के व्यवसायिक लाभ-हानि के धुनी। व्यवसाय में लाभ कमाना या अधिक लाभ की प्रत्याशा रखना कोई ग़लत नहीं है। हर कोई लाभ की कोशिश करता है। लेकिन नैतिकता और कम बेईमानी का लिहाज़ रखना चाहिए। रही बात विचारधारा की तो हर पत्रकार किसी न किसी पार्टी की विचारधारा से प्रभावित होता है। दलों को अपनी पसंद-नापसंद के अनुसार वोट करता है। इसमें किसी को कोई एतराज़ नहीं करना चाहिए।
पत्रकार हों या मीडिया पर्सन इन्हें अपने नैतिक कर्तव्यों पर ग़ौर करना चाहिए। विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में संतुलन का परिचय देना चाहिए। वैमनस्यता फैलाने वाली एक ख़बर मात्र से देश का सारा वातावरण भयग्रस्त हो जाता है। आपसी सम्बन्ध और समन्वय को आघात लगता है।
मीडिया घराने को यह तय करना होगा कि क्या पत्रकारिता बाज़ार है हिस्सा है या बाज़ार को नियंत्रित रखने वाला तंत्र है। जिस दिन यह तय हो जाएगा उस दिन से पत्रकारिता पर विश्वास जम जाएगा।
मीडिया के एकतरफ़ा रवैये की वजह से साधारण नागरिक भी कहने लगा कि लगता है मुल्क का मीडिया हाईजैक हो गया है। यही नहीं मीडिया और पत्रकारों पर जोक भी बनाए जाने लगे है। ऐसा ही एक जोक पेशे-ख़िदमत है।
लड़कीवाले – लड़का क्या करता है ?
लड़केवाले – पत्रकार है |
लड़कीवाले – कौन सी पार्टी का ?😂😂