सरकार…. कड़वे फैसले की दरकार

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राघवेंद्र सिंह
नये साल का नमस्कार….. मीन, मेख और नुक्ताचीनी के लिये पूरा साल है। सब कुछ सुधरे और शुभ-शुभ होता हुआ लगे इसके लिये स्वयं से लेकर देश-दुनिया में कड़वे फैसले की दरकार है। इस मामले में पिछले साल 8/11 के मोदी सरकार के नोटबंदी निर्णय को मिसाल के तौर पर ले सकते हैैं। फैसला सही था या गलत ये तो वक्त तय करेगा मगर देशहित में दिखाकर लिये गये मोदी निर्णय को लाख आशंका, विरोध और तकलीफ के बाद भी देश ने स्वीकार किया। कल्पना करिये पूरे देश ने दीवाली पर जिन 1000-500 के नोटों की पूजा की हो, जिन्हें कमाने के लिये रिश्वत में जमीर बेचा हो, मानव से दानव बने हों, लोगों की आह ली हो, कमीशन खाने में बेवजह जांचें कराई हों, महंगी दवायें लिखी हों,लाश भी बिना बिल के न दी हो, नर्मदा माई के सीने से रेत उलीच कर पैसा कमाया हो। वे रुपया पैसा नोटबंदी से माटी हो गया था। कलेजे पर पत्थर रख लोगों ने चूं तक नहीं की बल्कि भारी मन से ही ऐसी तालियां बजाईं कि लोगों को अभी तक गूंज सुनाई दे रही है। कुल जमा मतलब यह है कि जनता ने देश की बिगड़ैल व्यवस्था यह कहते हुये सौैंपी है जैसे पहले मां-बाप अपने नालायक बेटे को गुरूजी को यह कहते सौैंपते थे कि हड्डियां हमारी और गोश्त आपका। महाराज ये काबिल भले ही न बन पाये पर इसे इंसान जरूर बना दीजिये।
मध्यप्रदेश में तेरह बरस से भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। भय, भूख न भ्रष्टाचार, हम देंगे ऐसी सरकार… स्वराज मिलने के बाद सुराज (गुड गवर्नेंस) लाने के वादे पर जनता ने वोट दिये। भाजपा पर जनता का भरोसा है। तीन तीन बार सरकार। यह प्रमाण है मतदाता के विश्वास का। इससे गरीब, फटेहाल, जनता क्या दे सकती है? क्योंकि अमीर, भद्रजन और हाकम लोग वोट ही कितने डालते हैैं। वे तो सूखा-बाढ़ जैसी आफत पर्यटन उत्सव के रूप में मानते हैैं वैसे ही मतदान के दिन आउटिंग पर जाते हैैं। सो थोकबंद वोट मेंगो पीपल मीडिल क्लास, किसान और युवा ही देता है। सरकार में आने के बाद वादों भाषणों के पुरुषार्थी पराक्रमी नेतागण सिरे से पदौड़े साबित होते दिखाई पड़ते हैैं। उनसे न तो उनके साथ सवाल करते हैैं और न चुनाव लडऩे वाला संगठन पूछता है कि क्या हुआ तेरा वादा…? सब शेर बन सरकार में आते हैैं और फिर बनने लगते हैैं….बिल्ली।
2017 शुरू हो गया है ये सब के लिये संकल्प वादों और बातों को पूरा करने का वक्त है। न खाऊंगा न खाने देगूं। जैसे नारों जुमलों को जमीन पर उतारने की परीक्षा का समय है। मोदी सरकार के मंत्री अफसर अब तक इससे बचे हुये दिख रहे हैैं। मध्यप्रदेश में यह नारा सोच समझकर बुलंद किया गया है। मगर यहां मंत्री अफसर उनके भाई भतीजे खा रहे हैैं और उन्हें खाने भी दिया जा रहा है। इसे मोदी जी भी देख रहे हैैं। कड़ी कार्रवाई नहीं हुई तो इसे क्या समझा जायेगा?
म.प्र. के संदर्भ में कड़वे फैसलों की दरकार सबसे ज्यादा है। स्मार्ट सिटी की बातों के बीच मिसाल के तौर पर भोपाल को ही लें। यह गुमठियों की सिटी बनने जा रहा है। मंत्री, विधायक, पार्षद बीच सड़क पर गुमठियां लगवा रहे हैैं। किसी को शर्म ओ हया नहीं है। सीएम, मंत्री, महापौर, पार्षदों को काबू में नहीं कर पा रहे हैैं तो उधर भाजपा संगठन, अपने पदाधिकारियों की लगाम नहीं कस पा रहा है। नौकरशाही बेलगाम है ये तो हम पहले से ही बता रहे हैैं। सत्ता के गलियारों से जो खबरें छन कर आती हैं उसमें कहा जाता है स्मार्ट सिटी की महज बातें, इसमें दिलचस्पी किसी की नहीं है। भोपाल का दस साल से मास्टर प्लान नहीं बनना इसके प्रमाण है। तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय अर्जुन सिंह गरीब गुरबों के मसीहा थे। उन्होंने गरीबों के सिर पर छत के लिये झुग्गी दी और उसमें रोशनी के लिये एक बत्ती मुफ्त बिजली का कनेक्शन। नतीजा सामने था प्रदेश झुग्गी प्रदेश बन गया और मुनाफे में चलने वाला म.प्र. बिजली बोर्ड दिवालिया हो गया। ताजा स्थिति में भी सूबे के हालात अच्छे नहीं है। बजट के बराबर कर्ज का आंकड़ों होने जा रहा है। वेतन बांटने के लिये सरकार को इक्विटी बेचनी पड़ रही है।
स्कूल कालेज में पढ़ाई नहीं हो रही है। अस्पतालों में न डाक्टर समय पर न दवाई, मर्ज इस कदर लाइलाज हो रहा है कि मुख्यमंत्री के हमीदिया अस्पताल का दौरा करने के बाद भी हालात और बिगड़ जाते हैैं। इसलिये सरकार तंज को बीमारी से उबारने के लिये नीम और कुनेन जैसी कड़वे डोज की दरकार है। सुधार के एंटीबायटिक की खुराक शुरू करने के बाद पूरा मात्रा नहीं दी जाती है तो रोग जाता नहीं है और कई गुना ताकतवर होकर पलटता है। मुख्यमंत्री डोज तो दे रहे हैैं कि भ्रष्ट बेमान मक्कारों को छोड़ूंगा नहीं डंडा लेकर निकला हूं…न खाऊंगा न खाने दूंगा (मोदी की तरह) लेकिन बुखार के पूरी तौर पर उतरने तक दवा को डोज जारी नहीं रखना मलेरिया को दिमागी बुखार में बदल देता है अब डेगूं… किचनगुनिया और स्वाइन फ्लू जैसे वाइरस घटिया सड़क, रेत माफिया, गुमठी माफिया जुआ साïट्ट माफिया के रूप में आ रहे हैैं। जनता सरकार को भारी बहुमत से तीन तीन बार कमान सौैंप चुकी है…गुनहगार सरकार ही होगी।

सूबे के सफल सियासत दां में शुमार स्व. मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा कई मामलों में आदर्श राजनेता रहे हैैं मसलन उन्होंने प्रदेश को झुग्गी मुक्त करने का अभियान शुरू किया। इसे तत्कालीन नगरीय प्रशासन मंत्री बाबूलाल गौर की अगुवाई में झुग्गी मुक्त, आवास युक्त के मिशन के तौर पर चलाया गया। शहरों को व्यवस्थित करने के लिये ऐतिहासिक अतिक्रमाण हटाओ अभियान सफलतापूर्वक चला? राजनीति में शूचिता के लिये उन्होंने अपने परिजनों को राजनीति करने के लिये भोपाल और सीएम हाउस आने से कठोरतापूर्वक रोका। कई सारे किस्सों में एक यह भी है कि उन्हें सूचना मिली की उनके परिजन भोपाल में सक्रिय रह राजनीति व प्रशासन में दखल दे रहे हैैं। बात आगे बढ़ती उसके पूर्व उन्होंने परिजनों को बुलाया और कहा कि मैैं कुकड़ेश्वर जाऊं क्या….? आप लोग तय करें क्योंकि राजनीति आप और मुझ में कोई एक ही करेगा। अगर आप चाहते हैैं मैैं राजनीति करूं तो फिर आप लोगों में कोई भोपाल में नजर नहीं आयेगा। इसके बाद फिर कोई उनके दोबारा ऐसा कहने सुनने का मौका नहीं आया। श्री पटवा के भतीजे सुरेंद्र पटवा को तब विधानसभा का टिकट मिला जब उन्होंने खुद को सक्रिय राजनीति से अलग किया। अब भी मुख्यमंत्रियों मंत्रियों से स्व. पटवा के आचरण से सबक लेने की अपेक्षा है। नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ…
लेखक आईएनडी 24 न्यूज चैनल समूह के प्रबंध संपादक हैैं।