नंदूभैया और भगत के झगड़े में बागड़ बनी भाजपा……

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.राघवेंद्र सिंह
मध्यप्रदेश समेत आठ राज्यों में 2018 में चुनाव होना है। इनमें जो पार्टी जहां सत्ता में है वे अपनी हैसियत बरकरार रखने की जोड़ जुगाड़ में परेशान हैैं। जैसे जैसे चुनाव निकट आएगा यह परेशानी पार्टियों के पसीना – पसीना होने की वजह बनेंगी। म.प्र. के संदर्भ में देखें तो संभवत: पहली बार भाजपा संगठन सांसत में है। वजह है चौदह साल की भाजपा सरकार और संगठन में लगा इवेंट, दलाली, ठेकेदारी और मिस्डकाल से आए कार्यकर्ताओं की ऐसी फौज जिसे पार्टी के सिद्धांतों से नहीं बल्कि पावर और पैसे से ज्यादा मतलब है। सत्ता तो ठीक संगठन में बैठे जिम्मेदारों में जब आपस में झगड़े होने लगे तब एक कहावत याद आती है कि – दो सांडों की लड़ाई में बागड़ का नुकसान होता है। हालत यह है कि विवादों के चलते अब संगठन की महत्वपूर्ण बैठकों का केंद्र पार्टी कार्यालय नहीं बल्कि सीएम हाउस है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दोनों के बीच अक्सर मध्यस्थ की भूमिका में रहते हैैं।
कांग्र्रेस में इस तरह की कहावत आम होती थी मगर भाजपा 2018 के चुनाव में इसका नुकसान उठाती हुई नजर आएगी। नतीजे भाजपा के खिलाफ आते हैैं तो प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री के साथ प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे भी बराबर के गुनाहगारों में शामिल रहेंगेे। कमोबेश कांग्र्रेस में भी ऐसे ही हालात हैैं। चूंकि कांग्र्रेस अध्यक्ष प्रधान संगठन है इसलिए प्रदेश इकाई में अध्यक्ष की हैसियत से पार्टी की ताकत का अंदाजा लगता है। अगर अध्यक्ष कमजोर कतो पार्टी कमजोर। फिलहाल कांग्र्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव अगले चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर देने की स्थिति कम नजर आते हैैं। दिग्विजय सिंह के बाद कांग्र्रेस को कोई ताकतवर और कार्यकर्ता व जनता से जीवंत संपर्क करने वाला अध्यक्ष नहीं मिल पाया है।
मध्यप्रदेश भाजपा संगठन के लिहाज से आदर्श इकाई में शामिल रही है। जनसंघ से लेकर जनता पार्टी और फिर अब तक का सफर काफी प्रतिष्ठापूर्ण रहा है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान का दूसरा कार्यकाल और नए संगठन महामंत्री सुहास भगत के बीच विवाद को पार्टी में दो सांडों की लड़ाई भी कहा जा रहा है। इसमें भले ही कोई जीते लेकिन पार्टी कचरा हो रही है। सबको पता है पिछले कुछ महीनों से नंदू भैया और भगत के बीच बातचीत बंद है। ऐसे में अगला चुनाव कैसे जीता जाएगा यह पहेली बना हुआ है। भाजपा से लेकर संघ के नेता तक इसका उत्तर ढूंढने के लिए शीर्षासन कर रहे हैैं। मगर कोई सर्वमान्य जवाब नहीं मिल पा रहा है। चर्चा यह भी है कि अध्यक्ष को बदल दिया जाए। लेकिन यह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के गले नहीं उतर रहा है। दूसरा यह कि भगत जी को हटा दिया जाए तो यह संघ को मंजूर नहीं है। तीसरा विकल्प यह है कि चुनावी साल में प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे से लेकर नंदू भैया और भगत जी तीनों हो हटा दिया जाए। इस माथापच्ची के बीच में कुछ लोग यह भी कहते हैैं कि क्यों न अध्यक्ष और मुख्यमंत्री को ही बदल दिया जाए। यह सब ख्याल दो बड़े नेताओं के झगड़े के कारण आ रहे हैैं जबकि इनका काम था पार्टी के नेताओं को एकजुट रखना और झगड़े और मुनमुटावों को दूर करना जो दवा थे वे खुद ही बीमारी बन गए हैैं। भाजपा में ऐसे हालात पहली बार बने हैैं। इस वजह से सत्ता में कार्यकर्ताओं की भागीदारी का काम ठंडे बस्ते में चला गया है। मिसाल के तौर पर सहकारी क्षेत्र राजनीति में महत्वपूर्ण माना जाता है। संगठन में झगड़े के कारण अपेक्स बैैंक जैसे महत्वपूर्ण संस्थान का अध्यक्ष पद लंबे समय से खाली है। इतना ही नहीं जिला सहकारी बैैंकों में भी भाजपा नेता नहीं हैं। सहकारिता के क्षेत्र में इसके चलते भाजपा गैर हाजिर हो गई है जबकि भाजपा की सरकार में इस क्षेत्र में उसके नेता प्रदेश से लेकर जिलों में पदारूढ़ होते तो किसान असंतोष को बहुत हद तक कम किया जा सकता था। सहकारी बैैंक और संस्थाएं अफसरों के हवाले हैैं। सरकार भाजपा की और सहकारिता में सत्ता का उपभोग अफसर कर रहे हैैं। नंदू भैया और सुहास भगत में झगड़े की वजह से भाजपा को सहकारिता के क्षेत्र में बड़ा घाटा उठाना पड़ रहा है। दरअसल नियुक्ति की जब बात आती है तो मुख्यमंत्री कहते हैैं संगठन जिसे तय करेगा उसे हम नियुक्त कर देंगे। विवादों के चलते संगठन किसी नतीजे पर नहीं पहुंचता है तो अनिर्णय की स्थिति में जिन पदों पर नेताओं को होना चाहिये था वे अफसरों के हवाले हो जाते हैैं। अभी तक राजनीति में कार्यकर्ताओं को साधने और भीड़ जुटाने के मामले में महिला बाल विकास, आंगनबाडिय़ां महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैैं लेकिन जानकार यह समझते हैैं कि यदि सहकारिता के क्षेत्र में चौदह वर्षो में भाजपा की पकड़ मजबूत होती तो किसान असंतोष नहीं होता, ग्र्रामीण स्तर पर भाजपा नेता और कार्यकर्ता सहकारी समितियों एडजस्ट हो जाते, साथ ही शक्ति प्रदर्शन के मामले में सहकारिता में सक्रिय भाजपाई सड़क पर बड़ी ताकत दिखा सकते थे जो घाघ लीडर हैैं उन्होंने कांग्र्रेस के दिवगंत नेता सुभाष यादव को ऐसा करते देखा और सुना भी है। तीन बार की भाजपा सरकार ने सब कुछ किया हो लेकिन सहकारिता के क्षेत्र में सुभाष यादव जैसा कोई सहकारिता सम्राट पैदा नहीं कर पाई जबकि इस सूची में अपेक्स बैैंक के अध्यक्ष रहे भंवर सिंह शेखावत का नाम काफी आगे था।
मध्यप्रदेश आरएसएस, जनसंघ से लेकर भाजपा तक एक तरह से गढ़ रहा है। जब देश में भाजपा कमजोर थी तब सिकंदर बख्त से लेकर केरलर की ओ. राजगोपाल यहा ंसे राज्यसभा के लिए चुने जाते थे। लालकृष्ण आडवाणी जी रामरथ यात्रा को भी सबसे ज्यादा समर्थन देने वाले राज्य में यह सूबा शामिल था। लोकसभा चुनाव में भी यह राज्य सबसे ज्यादा सीटें भाजपा को देने वाली सूची में शुमार था। अब हालत यह है कि अध्यक्ष और संगठन महामंत्री में ही संवादहीनता है। इसके लिए वे सब भी जिम्मेदार हैैं जिन्हें इनके ऊपर नजर रखने के साथ सरकार और मंडल तक की निगरानी करनी थी। चित्रकूट उप चुनाव में भाजपा की हार इसका बड़ा उदाहरण है। सुहास भगत और उनकी टीम ने अपनी मर्जी से उम्मीदवार तय किया। संगठन और सरकार ने उनके निर्देश पर पूरी मेहनत की लेकिन समन्वय के अभाव में भाजपा वहां हार गई। इस हार से भी कोई सबक नहीं लिया गया है। अब यही टीम अध्यक्ष और मुख्यमंत्री बदलने की बात कर रही है। अपनी असफलता को दूसरे सिर डालने से कोई काम बनने वाला नहीं है। ऐसे ही हाल रहे तो आने वाले दो उप चुनाव कोलारस और मुगावली में भी चित्रकूट दोहराया जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।

सुहास भगत की टीम में उत्साह और ऊर्जा से लबरेज नेता विष्णुदत्त शर्मा, अतुल राय के साथ संघ के पदाधिकारियों का एक समूह शामिल है। संगठन शास्त्र के यह नए ज्ञाता सत्ता की राजनीति में थोड़े कच्चे और जल्दबाजी में लगते हैैं जिन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को संचालित करने का तजुर्बा रहा है वे संघ से मिले फ्री हैैंड के चलते भाजपा के घुटे और पकेपकाए नेताओं को निर्देशित करने की कोशिश में हैैं। वे सफल होंगे या नहीं यह समय बताएगा लेकिन चित्रकूट की पराजय ने सत्ता, संगठन और संघ परिवार को चौैंका दिया है। भाजपा के नए नवेले नेता कोशिशें तो कर रहे हैैं मगर अनुभव की कमी और अधीरता उन्हें आग से खिलवा रही है। ऐसी हालत में जो कार्यकर्ता चौदह साल से सत्ता में भागीदारी के लिए टकटकी लगाए बैठा है उसके लिए ताजे हालात किसी अपशकुन से कम नहीं हैैं। सुहास भगत में सियासी समझ नहीं आ पाना भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए बिल्ली के रास्ता काटने जैसी हुई है। इसलिए तो हम कहते हैैं दो सांडों की लड़ाई में भाजपा कार्यकर्ता रूपी बागड़ की बारह बज रही है जो लड़ रहे हैैं उन्हें शायद बदले में अनुभव मिल जाए लेकिन कार्यकर्ताओं के हाथ से तो सत्ता सुख पहले भी निकल रहा था और आज भी निकलता दिखाई दे रहा है। अहंकार और गुटबाजी में डूबे लोगों के लिए यह शेर सटीक है – ये दबदबा, ये हुकूमत, ये नशा, ये दौलत सब किरायेदार हैैं घर बदलते रहते हैैं….।

(लेखक आईएनडी-24 न्यूज चैनल समूह के प्रबंध संपादक हैं)