गिलासों की खनखनाहट न हुई तो रास्ता भटक जाएगा नया साल…..

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ज़हीर अंसारी
सरकार कहती है अहाता-बार में बैठ के पियो। आबकारी विभाग कहता है कि परमिट लेकर पिलाओ और पुलिस कहती है कि मुँह सूँघेंगे, पी के ड्राइव किया तो बैक लाईट लाल कर देंगे। इतनी कंफ्यूजन वाली बातें पढ़-सुनकर नए साल के आगमन पर छक कर पीने वालों के दिमाग़ की चटनी बनी जा रही है। पीना भी है और गंतव्य को पहुँचना भी है। न पिया तो नया साल आने में नाटक करेगा, हो सकता है कि नया साल अपना आगमन टाल दे और पी कर सड़क पर चले तो पुलिस नाक में दम करेगी। तिराहे-चौराहे मुँह सुँघाई का दस्तूर करेगी। शासन-प्रशासन ने विषम परिस्थितियाँ खड़ी कर दी है। ‘स्वेग से करेंगे सबका स्वागत’ गीत पर अब जगह-जगह थिरकन कैसे होगी?
अजीब दस्तूर है यहाँ का। वेलेंटाइन डे पर ‘लव’ नहीं कर सकते तो नववर्ष पर ‘ड्रिंक’। शौक़ीन अंगूर की बेटी का रसस्वादन नहीं करेंगे तो न्यूज़ीलैंड से प्रवेश कर आने वाला नया साल रास्ते से भटक कर कहीं और चला गया तो शौकीनों को पुराने साल में ही अटके रहना पड़ेगा। नहीं…नहीं यह बहुत नाइंसाफ़ी है। पूरी दुनिया के शराब शौक़ीन नशे में धुत्त होकर अगले साल में प्रवेश करेंगे तो यहाँ के मदिरापान करने वालों को भी झूम-झूम बराबर शराबी गाने का हक़ मिलना चाहिए। नये साल में गिरते-पड़ते अगर घर न पहुँचे तो काहे का नया साल।
माना कि शराब धार्मिक और सामाजिक बुराई है। तन ख़राब करती, रुपया ख़र्च कराती है, झगड़ा और बेइज़्ज़ती कराती है फिर भी पीने वालों को लुफ्त दे जाती है। कम से कम सरकारों को ऐसे मामलों में होशियारी नहीं दिखाना चाहिए। उन्हें जब मालूम है कि शराब सेहत के हानिकारक है। शराब की वजह से समाज में उपद्रव और परिवारों में तनाव होता है तो इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा देना चाहिए। एक तरफ़ राजस्व बढ़ाने आबकारी विभाग को कहा जाता कि स्थायी के अलावा अस्थायी परमिट बाँटों। होटलों में, ग्रुप में और रिज़ॉर्ट में पिलवाओ, कमाई बढ़ाओ। दूसरी तरफ़ पुलिस को ताक़ीद कि पी कर ड्राइव करने वालों के मुँह सूँघो, हुड़दंग मचाने की ख़बर लो, चालान बनाओ, कमाई करो।
इससे अच्छा होता कि 31 दिसंबर को शराबबंदी रख दी जाती, जैसे 26 जनवरी, 15 अगस्त, 2 अक्टूबर और दशहरा में रखी जाती। कम से कम पीने वाले ‘अँटा’ खाकर घर में ही दुबके रहते। होटलों को और दीगर जगहों में ज़िला व पुलिस प्रशासन द्वारा नए साल का जश्न मनाने अनुमतियाँ बाँटी गई। चाक-चौकस व्यवस्थाएँ कर रहा है। अब जब ढेरों जगहों प्रोग्राम होंगे तो जाते और आते साल के बीच गिलासों की खनखनाहट तो होगी। कोई लाईम जूस पीने हज़ारों रुपए की एंट्री फ़ीस तो देगा नहीं।
इन सब हालातों के मद्देनज़र दो ही चीज़ें हो सकती हैं या तो 31 दिसंबर को ड्राई डे रखा जाए या पीने वालों को ससम्मान घर तक छुड़वाने की व्यवस्था की जाए।