आज की हकीकत को ग़ालिब ने सैकड़ो बरस पहले जान लिया था

0
176

राघवेंद्र सिंह
2017 आरंभ जनवरी के पहले हफ्ते में मैंने अपने कॉलम ” न काहू से बैर ” में मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब साहब
का जिक्र किया था । इसे गुलजार साहब ने गालिब सा की ग़ज़ल के मुखड़े का इस्तेमाल करते हुए बड़ी खूबसूरती से संवारा है। उस ग़ज़ल को ग़ालिब सा के 220 वें जन्मदिन पर फिर साझा कर रहा हूं। ग़ालिब सैकड़ों बरस पहले ही लिख गए हैं आज की कड़वी हकीकत…

ये साल अच्छा है……
एक बिरहमन ने कहा है के ये साल अच्छा है
जुल्म की रात बहुत जल्द ढलेगी अबतो
आग चूलों में हर एक रोज़ जलेगी अबतो
भूख के मारे कोई बच्चा नहीं रोयेगा
चैन की नींद हर एक श स यहाँ सोयेगा
आंधी नफरत की चलेगी ना कहीं अबके बरस
प्यार की फसल उगायेगी ज़मीं अबके बरस
है यक़ीन अब ना कोई शोरशराबा होगा
ओस और धूप के सदमे ना सहेगा कोई
अब मेरे देश में बेघर ना रहेगा कोई
नए वादों का जो डाला है वो जाल अच्छा है
रहनुमाओं ने कहा है के ये साल अच्छा है
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है…