रामल खान और दुरगा फार………

0
94

जयराम शुक्ल
……… …… …. …….
नाम को लेकर बकवादी दौर के बीच दो दिलचस्प वाकए बरबस याद आ गये। एक अब्दुल गफ्फार का दुरगाफार और फिर दुरगा बन जाना, दूसरा रामलखन का रामल खान। शुरुआत दूसरे वाकए से, यह पूर्व विधायक और हमारे प्रिय धाकड़ नेता रामलखन शर्मा जी से जुड़ा है। शर्मा जी ने सिरमौर से दूसरा चुनाव मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की टिकट पर जीता। वे यमुना शास्त्री के साथ जनता दल छोड़़ कर आए थे। प्रदेश के इकलौते माकपा विधायक होने के नाते देश भर की माकपा में उनका नाम था। पालित ब्यूरो के सभी नेता उन्हें क्रांतिकारी मानते थे। यद्यपि शर्मा जी खुले बदन रुद्राक्ष की मालाएं पहनते हैँ और सिर्फ उपन्ना ओढते हैं। यह वेश उनके कम्युनिस्टी होने के आड़े कभी नहीं आया। बहरहाल कहानी यह कि वे शास्त्रीजी के साथ कलकत्ता से पार्टी मीटिंग में भाग लेकर लौटे। दूसरे दिन मैं हालचाल लेने शास्त्री जी से मिलने.. वसुधैव कुटुम्बकम् ..पहुंचा। शास्त्री जी मनोविनोद के मूड मे थे। उन्होंने अपने अंदाज़ में कहा.. मालुम जयराम.. अपना रामलखन तो बंगाल में रामल खान हो गया। सभी उसे इसी नाम से संबोधित कर रहे थे..। मैने कहा.. शास्त्री जी यह उच्चारण का फेर होगा। वे बोले नहीं भाई.. फिर तो कई लोग इसे मिस्टर खान कहकर संबोधित करने लगे। तो रामलखन की क्या प्रतिक्रिया रही मैंने पूछा.. शास्त्री जी दुर्लभ ठहाका लगाते हुए बोले.. अरे वो तो बिना मेहनत के एक झटके मे ही सेकुलर हो गया..भाई।
अब अब्दुल गफ्फार के बारे में। ये हमारे ग़ांव यानी कि रीवा जिले के बड़ी हर्दी गांव के प्रतिष्ठित मुसलमान थे। बचपन से ही हम लोग इन्हें जयहिन्द करके नमस्कार करते थे। मुसलमान हिन्दुओं से कैसे अलग होते हैं, यह पढ़ीलिखी दुनिया मे आकार जाना। अम्मा (माता जी को हम यही कहते थे) को वे काकी कहते थे। उनकी दर्जीगिरी व बिसातखाने की दूकान थी। अम्मा को जब कोई सामान मगाना होता तो वे यही कहती.. जा दुरगाफार के इहां से ले आवा। हम बहुत दिनों तक दुरगा और दुर्गा में कोई फर्क नहीं कर पाए। गांव के प्रायः लोग उन्हें यही कहते थे। कई बार तो सम्मान मे लोग इन्हें दुरगा भैया भी कह दिया करते थे। अब्दुल गफ्फार को गांव की हमारी साझी संस्कृति ने दुरगाफार बना कर शामिल कर लिया। उनके बड़े बेटे अब्दुल सुभान हम बच्चों के लिए सिउभान बने रहे। अब काफी कुछ बदल गया। मुसलमहटी अलग. बहमनहटी अलग। गांव मे अब ऐसी कई यादों के पुरातत्वीय अवशेष बचे हैं। इस बीच एक मित्र ने पते की बात पूछी ….. सैफ करीना यदि अपने बेटे का नाम रसखान अली पटौदी रख देते तो क्या देश भर में नरियल फूटते..?

फोटो प्रतीकात्मक है