गुजरात में 99 तो मध्य प्रदेश में 200 पार कैसे…

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.राघवेंद्र सिंह
सब टकटकी लगाए थे गुजरात विधानसभा चुनाव पर। खोदा पहाड़ और निकली 99 की चुहिया। भाजपा की बलि और महाबलि नेताओं को जनता ने शीर्षासन कराया तब कही जाकर 182 के सदन में 99 का बहुमत मिला। लंबी लंबी हांकने वाले अमित शाह का 150 सीट पाने का दावा 100 को भी नहीं छू पाया। शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी के गृहराज्य के चुनाव परिणाम पर प्याज की परतों की भांति बहुत कुछ कहा और लिखा जा रहा है। 150 सीट नहीं मिली तो जश्न नहीं मनाएंगे जैसे बड़े मुंह और गज भर की जुबान वाले नेताओं की जनता ने मानो घिग्घी बांध दी है। गुजरात के नतीजों से तो यही लगता है। हम इसी बात को मध्यप्रदेश के संदर्भ में तौलना चाहते हैैं। माइक्रोमैनेजमेंट के बादशाह कहे जाने वाले अमित शाह के उस नारे का जिसमें उन्होंने कहा अबकी बार मध्यप्रदेश में 200 पार….! यह नारा महज नारा है, जुमला है, ख्याली पुलाव है, शेख चिल्ली के ख्वाब, मुंगेरीलाल के सपने हैैं ऐसे ढेर सारे शब्द हैैं जो 2018 के चुनाव के पहले 200 पार के नारे के संबंध में लिखे और कहे जाएंगे। चूंकि गढ़ गुजरात में रथी अमित शाह, महारथी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 150 पार का रथ जब 99 पर आकर फंस गया उस मुकाबले मध्यप्रदेश में भारी भरकम न तो लीडर हैैं और न जिताने के लिए केंद्रीय मंत्रियों की टीम और न मुख्यमंत्रियों का रैला और न ही सांसद, विधायकों की फौज। यहां तो पांव-पांव वाले भैया से मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चौहान पर ही सारा दारोमदार है। भाजपा का तंबू शिवराज के बम्बू पर ही टिका हुआ है। जीतने पर भले ही भाजपा की जय जय हो लेकिन हारने पर तो तय है कि प्रदेश में कप्तान की ही खिल्ली उड़ेगी। थोड़ी सी राहत अलबत्ता गुजरात के 99 सीटों में भाजपा शासित मुख्यमंत्रियों को दी है। वह कह सकते हैैं जिनके रथ जमीन से एक फीट उपर चल रहे थे वहां 99 सीटें तो हमारे यहां जाहिर है थोड़ी कम ज्यादा भी चलेगी।
गुजरात चुनाव के बाद भाजपा को लेकर महाभारत का एक किस्सा आम हो गया है कि भगवान श्रीकृष्ण कर्ण द्वारा तीर चलाने पर अर्जुन का रथ जब कुछ योजन ही पीछे जाता था तो कृष्ण उसकी प्रशंसा करते थे जबकि अर्जुन के तीरों से कर्ण का रथ कई योजन पीछे जाता था तब कृष्ण अर्जुन की तारीफ में कुछ नहीं बोलते थे। युद्ध की समाप्ति पर अपनी इस शंका का समाधान अर्जुन ने कृष्ण से चाहा तो वह जबाव आज के भाजपाइयों के लिये भी बड़ा उपयोगी होगा। कृष्ण ने कहा हे अर्जुन हमारे रथ के ध्वज में पहाड़ लिए महाबली हनुमान हैैं और पहियों में शेषनाग और सारथी के रूप में संपूर्ण ब्रह्मांड के रूप में मैैं स्वयं मौजूद था इसके बाद भी कर्ण के तीरों का प्रहार अगर हमारे रथ को पीछे करता है तो यह उसे तुमसे श्रेष्ठ साबित करने के लिए पर्याप्त है। कर्ण हारा या मृत्यु को इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि वह अधर्म के साथ था। नहीं तो वह नि:संदेह अर्जुन से श्रेष्ठ धर्नुधर था। अब ऐसे में गुजरात में भाजपा की 99 सीटें अगले चुनाव में कमजोर प्रदर्शन करने वाले नेताओं के लिए बड़ा सहारा होंगी। 200 पार का लक्ष्य तय करने वाले अमित शाह को शायद यह पता नहीं है कि बर्फ की चट्टान जैसे कठोर और पारदर्शी नेताओं को सत्ता की आंच ने गला दिया है। ईमानदारी, चाल, चरित्र और चेहरा सब बदला गया है। बर्फ की चट्टानें पिघल कर पानी-पानी हो ड्रम, टब, बाल्टियों और गिलासों में हैैं। पिछले दिनों मैैं जयपुर एक विवाह समारोह में शामिल हुआ था जहां झारखंड के एक युवा पूर्व अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री से मुलाकात हुई। चर्चा में उन्होंने पार्टी से जुड़े टेढ़े मेढ़े सवालों का सीधा सा उत्तर दिया। हम राज में हैं तो राजरोग तो लगेंगे। यह बात उन्होंने भ्रष्टाचारी, बेईमानी और नेता परिवारों की ठेकेदारी और परिवाद को लेकर की थी। इस वाक्य को भाजपा की राजनीति के संदर्भ में पूरी किताब माना जा सकता है।
बहरहाल सियासत में सदगुण और सुराज का बर्फीला गोला बनकर आई भाजपा ने कांग्र्रेस को 14 साल के अपने शासन में तहस-नहस कर दिया है। मगर अब इसके गोले संगठन से सरकार तक पिघल कर पानी पानी हो रहे हैैं। हाईकमान 200 पार का नारा बुलंद कर रहा है और दिक्कत यह है कि आर्थिक तंगी से जूझ रहे मध्यप्रदेश को मोदी सरकार से खैरात तो कुछ मिली नहीं उल्टे उसके हिस्से की रकम के भी लाले पड़ रहे हैैं। विकास कार्यों के लिये भुगतान तो ठीक तनख्वाह बांटने तक के लिये सरकार को अपनी संपत्ति बेचनी पड़ी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मर्यादा है कि वे खामोशी अख्तियार कर केंद्र से मदद नहीं मिलने पर कोई कदम न उठाएं। इस बीच प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नंद कुमार सिंह चौहान और संगठन महामंत्री सुहास भगत को बदलने का सुतंगा भी खूब चल रहा है। नए साल में कुछ नया देखने सुनने को मिल सकता है। भाजपा – कांग्रेस दोनों में बदलाव को लेकर संभावनाएं बराबर हिचकोले ले रही हैैं।
भाजपा में अध्यक्ष बदलने की सुरसुरी दिल्ली से चली है। संघ व प्रदेश संगठन के कुछ नेता बयानों को मुद्दा बनाकर बदलाव पर बल दे रहे हैैं। मुख्यमंत्री किसी किस्म के परिवर्तन चुनावी साल में नहीं चाहते। संगठन की कमान के लिए केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तौमर के नाम भी सबसे आगे है। मगर वे चुनावी साल में संभावित सिरफुट्टौव्ल से बचना चाहेंगे। दिल्ली में उनका कामकाज शानदार चल रहा है। मोदी के निटकस्थ, गंभीर और भरोसेमंद नेताओं की टीम में वह शामिल हैैं। ऐसे में प्रदेश भाजपा के देवदुर्लभ संगठन के नटबोल्ट इस कदर ढीले पड़ चुके हैैं कि नेताओं में मतभेद वैमनस्य की हद तक चले गए हैैं। अपने पराये को लेकर बोलचाल तक बंद है। यह हालात चुनावी साल में 230 सीटों वाले राज्य में 200 पार के आंकड़े को मुश्किल बना रहे हैैं। ढीली पड़ी संगठन की गाड़ी पूरी तरह चूं-चूं, पूं-पूं बोल रही है। टिकट वितरण के दौरान यह खटपट और कर्कश हो सकती है। ऐसे में अच्छे और सुलझे नेता राज्य आने से बचना चाह रहे हैैं।

तीन बार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर सबसे पहले आम जनता के बीच सरकार के भरोसे बहाली करने की चुनौती है साथ ही भ्रष्टाचार को लेकर कठोर बातों के बजाए कड़े कदम उठाने की जरूरत है। एक पुराना जुमला है अगर आप ईमानदार हैैं तो आपको ईमानदार दिखना भी पड़ेगा। सरकार चलाने वालों पर इस पर खरे उतरना ज्यादा कठिन है। यह वैसा ही है जैसा आग दरिया है और डूब कर जाना है। भाजपा के लिए अच्छा यह है कि 14 वर्ष के बाद भी कांग्रेस में शिवराज के मुकाबले कोई नेता स्थापित नहीं हो पाया है। दूसरा यह कि लोकप्रियता में गिरावट के बावजूद अभी भी शिवराज राज्य के नेताओं में आगे बने हुए हैैं। जहां तक उनकी विनम्रता और बातचीत के सवाल है वे किसी को जीतने का माद्दा रखते हैैं। रामायण काल के हिसाब से वरदान प्राप्त बाली एक ऐसे अजेय यौद्धा थे जिनके सामने कोई भी शत्रु आए उसका आधा बल उनमें आ जाता था इसलिए रावण जैसे महाबली को भी अपनी बगल में दबाकर शक्ति का लौहा मनवा लिया था। चौदह साल की भाजपा सरकार में बारह साल से मुख्यमंत्री का जिम्मा निभा रहे शिवराज अभी तो बाली बने हुए हैैं।
कांग्रेस को अभी जनता के सामने भाजपा के विकल्प के तौर पर प्रस्तुत करने की चुनौती है। बातचीत में कई बार लोग कहते भी हैैं कि परिवर्तन होना चाहिए। साथ ही वे यह भी कहते हैैं कि विकल्प के तौर पर कांग्रेस अभी नजर नहीं आती। कोलारस मुंगावली विधानसभा के उप चुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए महत्वपूर्ण होंगे। हालांकि यह दोनों सीटें कांग्रेस की हैैं और यहां जीत का जिम्मा ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौैंपा गया है। यह दोनों क्षेत्र सिंधिया रियासत में आते हैैं। जीत सिंधिया को चुनाव में कांग्रेस का नेतृत्व करने का मार्ग प्रशस्त करेगी और हारने की स्थिति में भाजपा में नई ऊर्जा का संचार करेगी। इसके पहले चित्रकूट उप चुनाव को नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल की अगुवाई में निलांशु चतुर्वेदी यहां से विधायक बने हैैं। ऐसे में अजय सिंह अभी आगे हैैं। लेकिन दो चुनाव जीतते ही सिंधिया का दावा फिर सशक्त हो जाएगा। वैसे भी कांग्रेस हाई कमान का झुकाव सिंधिया की तरफ है लेकिन दिविग्जय सिंह की नर्मदा परिक्रमा और उसके असर को सियासी सीन में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। परिक्रमा के समापन की बाद दिग्विजय सिंह नई भूमिका प्रदेश कांग्रेस का भविष्य तय करने वाली होगी। अभी तक कांग्रेस और भाजपा राज्य के चुनाव से दिग्विजय सिंह अलग करके नहीं देख पा रही हैैं।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह वैसे तो सदा ही चुनावी मोड पर रहते हैैं लेकिन पिछले दिनों उनकी बुधनी क्षेत्र में यात्रा के दौरान ग्र्राम कौसमी में एक महिला ने इंदिरा आवास योजना के तहत मकान की मांग की, संतोषजनक जबाव नहीं मिलने पर उसने कहा घर नहीं मिला तो मैैं नर्मदा परकम्मा पर निकल जाऊंगी। इतना सुनते ही शिवराज थोड़ा-सा हंसकर स्नेह के साथ उसके सिर पर हाथ रखते हुए अधिकारियों की तरफ मुखातिब होकर कहते हैैं। ये मेरे गांव जैत की लड़की है। इसके घर का इंतजाम करें और दूसरे ही क्षण वे उसकी तरफ पलट कर हंसते हुए कहते हैैं – मैैं तुझे परकम्मा पर नहीं जाने दूंगा। गांव की मोड़ी है भाई। वहां मौजूद लोगों में ठहाके भी लग जाते हैैं। इसके साथ ही उनका काफिला अगले गांव की तरफ रवाना हो जाता है। —