ठाढ़ भैंस बिदुराय…………

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जयराम शुक्ल

उस दिन रांची की सीबीआई अदालत में न्याय की बीन बज रही थी। अदालत के बाहर खड़ी भैंसें पगुराने की बजाय बिदुरा रही थीं। वे वही भैंसें थी जिनकी पीठ पर बैठकर लालूजी हैलीकाप्टर तक पहुंचे थे। यानी ये भैंसे ही ललुआ के लालू यादव बन जाने की मूक साक्षी थीं। वे गर्व से कहा भी करते थे- भइंसी की सवारी करने वाला आज हैलीकाप्टर से उड़ रहा है। कहते हैं पीठ और पेट पर एक साथ प्रहार नहीं करना चाहिए। पर उन्हीं भैंसों के पेट पर लात मारी गई। एक हजार करोड़ की लात। खुद तो मारी ही सूबे के हाकिमों-अफसरों और हुक्मरानों से मरवाईं। तेरह साल से ये मूक मवेशी न्याय की दहलीज पर मिमियाते रहे। न्याय की मूर्ति जीवंत हो गयी। आंख की पट्टी खोलकर इन्साफ के तराजू में भ्रष्टाचार के वजन को तौल दिया। कबीरदास कह गए- कबिरा हाय गरीब की कबहुं ने निष्फल जाय। मरे जीव की खाल से लोह भसम होइ जाय। लालूजी सिर्फ लालू भर नहीं है। वे सत्ता की संड़ान्ध से बिधे भ्रष्ट नेताओं के प्रतीक पुरूष हैं। ये तो शुरुआत है.. आगे लाइन लगने वाली है। आजादी के पहले भी जेलें नेताओं से भरी रहा करती थीं- अब फिर उन्हीं के वंशजों से गुलजार होंगी। आजादी का मकसद और मायने इन्हीं लोगों ने बदले। छिंयासठ साल से देश इनकी गलाबाजी सुन रहा है और कलाबाजी देख रहा है। अब जनता की गलाबाजी-कलाबाजी देखिये। समोसे का आलू सड़ गया- लालू की किस्मत में ताला जड़ गया। उस दिन अदालत में लालूजी का वकील कह रहा था – हजूर इन्होंने देश की रेल को घाटे से उबारा, कम से कम इसलिए तो इन पर रहम कर दीजिए। मुझ जैसे कई लोगों को लगा होगा, वकील सही दलील दे रहा है। मैने रेल के एक बड़े अधिकारी से कहा – रेल की तरक्की में लालूजी के योगदान पर प्रकाश डालिए। अधिकारी ने संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित ढंग से बताया- वस्तुत: लालू जी ने कुछ किया ही नहीं सो तरक्की होती गयी। कुछ किया ही नहीं मतलब, यानी कि उन्होंने अड़ंगे नहीं लगाए, ठेके व सप्लाई में रूचि नहीं ली। हम सबका जो काम था उसे करने दिया तरक्की का यही राज है। लालूजी जैसे आदमी टांग न फंसाएं , उसके पीछे भी चारा की ही महिमा थी। जरा इतिहास पर लौटिए। रेलमंत्री बनने से पहले लालू चाराकाण्ड और बेहिसाब दौलत के मामले में जेल की हवा खा चुके थे। वही सबक था कि रेल तंत्र को छुआ तक नहीं.. वरना चारा चरने वाले को रेल निगलने से क्या परहेज। हां उस घटना की कोख से ही राबड़ीजी का अभ्युदय हुआ था। वे मुख्यमंत्री बनीं और रजिया बेगम की भांति पाटिलपुत्र (पटना) को सम्हाला।
आज राबड़ीजी फिर प्रासंगिक हो गई हैं। लेकिन इस बार एक नई बात यह होगी कि हर सूबे में राबड़ियों की नई जमात तैयार होगी। संसद और विधानसभा में 30 से 35 फीसदी दागी हैं। दागियों को चुनाव से दूर रखने के कानून का चाबुक चल पड़ा है। जाहिर है जब वे चुनाव नहीं लड़ेंगे तो उनके पीछे खड़ी उनकी राबड़ियां लालू की राबड़ीजी की तरह उन्हें स्थानापन्न करेंगी। सो जाने-अनजाने एक बड़ा काम और हो गया। वो महिला आरक्षण का। दशकों से बहस चल रही है कि सदनों में महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिले। जो सरकारें नहीं दिलवा पाईं वो अब कानून के चाबुक के चलते संभव हो जाएगा।
एक हफ्ते के भीतर ही यूपीए सरकार के पलटीमार फैंसले और राजनीति की अदालतीय पैंतरेबाजी के चलते अपने भैय्याजी की मति चकरघिन्नी की भांति घूमने लगीं। सोते-सोते वे चिल्ला पड़े कि ये सब क्या हो रहा है। उनकी आंखों के सामने मिड-डे मील जहरकाण्ड तैर गया। सीबीआई के अफसर यमदूत की भांति आते दिखाई देने लगे। टिकट के लिए पर्यवेक्षक से पंगा लेकर भैय्याजी आलाकमान की मुलाकात यात्रा पर दिल्ली में थे। भैय्याजी यद्यपि किसी सदन के सदस्य नहीं फिर भी उनकी नींद हराम थी। वे अब दार्शनिक मूड में आ चुके थे। सोचने लगे… हे परभू इस देश का क्या होगा ? क्या पॉलटिक्स ऐसे ही चलेगी। सुख का वजूद इसलिए है क्योंकि दुख है। ईमानदारी भी तभी तक पूजी जाएगी जब तक बेईमानी है। आज उन पर सुकरात जैसे किसी की आत्मा सवार हो गई थी। वे प्रत्ययों की सत्ता पर गूढ़ विचार -मंथन करने लगे। राजनीति में जब सब ईमानदार हो जाएंगे तो ये राजनीति, राजनीति नहीं रह जाएगी। जब राजनीति नहीं होगी तो लोकतंत्र का क्या होगा। लोकतंत्र नहीं रहा तो हम नेता -मथानियों का क्या होगा। और जब हम नेता नहीं रहेंगे तो क्या करेंगे? क्या घांस छीलेंगे? तो क्या नेताओं की प्रजाति वैसे ही लुप्त हो जाएगी जैसे दुनिया से डायनासोर गायब हो गए? बेईमानी, भ्रष्टाचार, झूठ फरेब ये सब तो नेतागिरी के लिए खाद-पानी और प्राणवायु की भांति है। भैय्याजी निष्कर्ष तक पहुंच गए- हम ऐसा हरगिज नहीं होने दूंगा। उनकी नजर में वे तीस-पैंतिस फीसदीं दागियों की प्रभावी संख्या थी, यदि इसमें आसाराम, नित्यानंद, इच्छाधारी, निर्मलबाबा जैसे सुविख्यात कुकर्मकाण्डी संतों की मण्डली जोड़ ली जाए तो हम बड़ी ताकत बन जाएंगे। हमारे पास दौलत होगी, मायाजाल होगा, मक्कारी होगी, हरामीपना होगा, शातिर दिमाग वालों का कोरग्रुप होगा। इसे हर हाल में जिन्दा रखना होगा। दुनिया निगेटीविटी की ही मुरीद होती है। हर युग में नकारात्मक चरित्र ज्यादा आकर्षक व ताकतवर रहे हैं। ये प्रवृति तब तक जिन्दा रहेगी जब तक इस दुनिया काअस्तित्व रहेगा। भैय्याजी की छठी इन्द्रिय ने सुझाया कि क्यों न एक नई पार्टी का गठन कर सबको जोड़ा जाए। भले ही लोग उसे भ्रष्ट कुकर्मवादी पार्टी का नाम दें..। इतिहास में रावण भी दर्ज है और कंस भी, गब्बर सिंह और मोगैम्बो भी। कोई चाहे कुछ कर ले.. अंधेरा कायम रहेगा..।