विशाल आकाश है अटल जी की शख़्सियत का……

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ज़हीर अंसारी
25 दिसंबर को देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पैदाईश का दिन है। अटल जी पर अब तक बहुत कुछ लिखा-पढ़ा जा चुका है। फिर भी उनके जन्मदिन पर उनकी शख़्सियत की चर्चा तो होनी ही चाहिए। अटल जी की शख़्सियत का आसमान इतना बड़ा है कि चंद अल्फ़ाज़ों की रोशनी फीकी ही रहेगी। हिंदुस्तान की सियासत के वे ऐसे कोहिनूर हैं, जिनके ज़िक्र के बिना हिंदुस्तानी जम्हूरियत का वजूद पूरा नहीं होता।

अटल जी ने सन 1955 से अपना राजनैतिक सफ़र शुरू किया था। सक्रिय राजनीति में रहते उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे। इन उतार-चढ़ाव से विचलित हुए बिना वे अपने पथ पर आगे बढ़ते रहे। बिना किसी उच्च पद की चाहत रखे वो देश भर में घूमते रहे, संगठन को मज़बूत बनाते रहे और जनता बीच भाजपा को लोकप्रिय बनाते रहे। रा.स्व.से. संघ के सेवक के रूप में उन्होंने मिसाल क़ायम की है। जनसंघ और फिर भाजपा के सिरमौर रहे अटल जी कभी भी अपनी अंतरात्मा के विपरीत नहीं गए। हमेशा नीति और नैतिकता की राजनीति की। चाहे 13 दिन की सरकार रही हो, चाहे 13 महीनों की, उसूलों से समझौता नहीं किया। उसूलों पर अडिग रहकर लगभग पाँच साल गठबंधन वाली सरकार चलाई। सहयोगी दलों के बीच समन्वय बनाया, सबको साथ लेकर चले मगर राष्ट्रहित और जनहित की नीतियों से समझौता नहीं किया।पड़ोसी देशों से बेहतर रिश्ते रखने हमेशा तत्पर रहे। बस लेकर रिश्ते बनाने गए तो आक्रमण की दिशा में कारगिल युद्ध के ज़रिए दुश्मन के दाँत खट्टे करने से भी नहीं चुके। विश्व समुदाय की नाराज़गी को दरकिनार रखते हुए पोखरन में परमाणु परीक्षण का फ़ैसला लिया। उन्हें वक़्त की नज़ाकत की अच्छी परख थी। रिश्ते कब किससे और कैसे रखना है यह उन्हें बख़ूबी आता है। तभी तो विदेश मंत्री वाला कार्यकाल अब तक याद रखा जाता है।

बतौर प्रधानमंत्री अटल जी के कार्यकाल को याद किया जाएगा। लगभग पाँच साल के कार्यकाल में उन्होंने गाँव-ग़रीब की सुध ली तो ढाँचागत विकास को गति दी। ओजस्वी और प्रखर नेता अटल जी इतने धीर-गम्भीर हो गए कि सॉफ़्ट हिंदुत्व का मार्ग अपनाते हुए सकल वर्ग की चिंता करने लगे। उनकी इस चिंता के पीछे ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना रहा जहाँ भय, भूख, निरक्षरता का नामोनिशान न हो और लोग अभावमुक्त जीवन जी सके। अटल जी का यह सपना साकार होता उसके पहले एनडीए की सरकार पदच्युत हो गई।

अटल जी की विशेषता रही कि उन्होंने कभी भी अपनी सोच से समझौता नहीं किया। जो उन्हें मुनासिब लगा वो कहा और किया। साफ़गोई इतनी कि संसद में कह दिया कि मैं अविवाहित हूँ, कुँवारा नहीं। बांग्लादेश बनने के बाद विपक्ष में रहते हुए उन्होंने जहाँ स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी को दुर्गा कहा तो वहीं प्रधानमंत्री रहते पूर्व सरकारों के राष्ट्र निर्माण में दिए गए योगदान की सराहना की। जहाँ अपनों को राजधर्म निभाने की ताक़ीद दी तो वहीं स्वयं इसका पालन करते शासन चलाया। अटल जी का भारतीय लोकतंत्र पर अटल विश्वास रहा है। अगर यह कहा जाए कि अटल जी भारत के असली लीडर हैं तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। लीडर वो होता है जो वर्तमान के साथ आने वाली पीढ़ी की फ़िक्र रखता हो।

आज अटल जी स्वस्थ्य कारणों से सक्रिय राजनीति से दूर हैं। आवश्यकता इस बात की है कि देश की एकता-अखंडता को बरक़रार रखने उनके बाद की पीढ़ी को उनका अनुसरण करना चाहिए। ऐसे सच्चे राजनेता के जन्मदिवस पर यही कामना है कि वे शीघ्र स्वस्थ्य हों। उनके जन्मदिन के अवसर पर उनके द्वारा लिखी कविता जो आज भी मौजूं है, पेश की जा रही है।

दूध में दरार पड़ गई।
ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया।
बँट गये शहीद, गीत कट गए;
कलेजे में कटार गड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।
खेतों में बारूदी गंध,
टूट गए नानक के छन्द
सतलुज सहम उठी,
व्यथित सी बितस्ता है;
वसंत से बहार झड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।
अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता,
तुम्हें वतन का वास्ता;
बात बनाएँ, बिगड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।