मध्य प्रदेश =तोमर की वापसी के संकेत

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.. राघवेंद्र सिंह

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव के नतीजे आपके सामने है अब जिन राज्यों में 2018 में चुनाव होना है उनमें मध्यप्रदेश समेत 8 राज्य छत्तीसगढ़, राजस्थान, त्रिपुरा, कर्नाटक, मेघालय, नागालैैंड और मिजोरम शामिल हैैं। भाजपा शासित 3 राज्यों में गुजरात चुनाव परिणाम के बाद बदलाव की धुकधुकी सत्ता और संगठन में महसूस की जा रही है।

राजस्थान में महारानी वसुंधरा राजे की वापसी की राह मुश्किल है। छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस पहले से ताकतवर दिखती है। जहां तक मध्यप्रदेश के सवाल है यहां का देवदुर्लभ भाजपा संगठन सबसे ज्यादा मुश्किल में है। जननायक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की छवि भी 2013 के चुनाव की तुलना में महाबली की नहीं है उन्हें सत्ता संगठन में भीतर से चुनौती मिलने के साथ कांग्रेस से कड़े मुकाबले का अनुमान है। असल में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की चल रही नर्मदा परिक्रमा उनके लिए मुश्किल का सबब बन सकती है। गुजरात चुनाव के कारण नर्मदा परिक्रमा की गूंज कम सुनाई दे रही थी जिसके अब दिसंबर के अंतिम सप्ताह तक बढ़ने के आसार हैैं। दिग्विजय की यात्रा समाप्ति तक यह तय हो जाएगा कि अगले साल चुनावी राजनीति में परिक्रमा कर रहा यह राजा केंद्र में होगा। उनकी अनदेखी कर कांग्रेस का आगे बढ़ना मुश्किल नजर आएगा। इसके पीछे सूबे से 15 साल के स्वनिर्वासन के बावजूद दिग्विजय की कार्यकर्ताओं में पकड़ को अहम माना जा रहा है। इस मामले में भाजपा नर्मदा परिक्रमा पर नजर रखे हुए है। अगले चुनाव में भाजपा यह मान रही है कि एंटी इनकम्बैंसी फैक्टर उसे चुनावी अखाड़े में पसीना छुड़ाएगा। बस यहीं से शुरू होती भाजपा संगठन की बुरे दिनों की कहानी।

प्रदेश भाजपा संगठन में ऐसा पहली बार हो रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान और संगठन महामंत्री सुहास भगत में संवादहीनता की स्थिति है। इसके चलते संगठन के विस्तार, मोर्चा प्रकोष्ठ और विभागों की जिला स्तरीय कार्यकारिणी के गठन में देरी भी खास वजह मानी जा रही है। हालत यह है कि एक महीने में प्रदेश प्रभारी विनय सहस्रबुद्धे दो बार बैठकों के लिए आए तो अध्यक्ष और संगठन महामंत्री से उन्हें अलग-अलग मुलाकात करनी पड़ी और यदि साथ में भेंट भी हुई तो दोनों नेताओं में बातचीत होते किसी ने नहीं देखा। अब अक्सर संगठन और कोर ग्रुप के नेताओं की बैठक मुख्यमंत्री निवास में ही होती है। इसके चलते संगठन का आभामंडल भी निस्तेज हो गया है। एक तो संगठन महामंत्री सुहास भगत संघ की भक्ति से बाहर निकल भाजपा कार्यकर्ताओं में रम नहीं पा रहे हैैं और दूसरे नंदू भैया यह नहीं समझ पा रहे हैैं कि वे सत्ताधारी दल के प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते मंत्री, विधायकों के साथ-साथ कार्यकर्ताओं के भी हितरक्षक हैैं। यही कमी उन्हें कार्यकर्ताओं से दूर और सरकार का पिछलग्गू बनाती है। पिछले दिनों कांग्रेस के पूर्व विधायक माखन जाटव के हत्या के आरोप में पुलिस से बचते फिर रहे मंत्री लाल सिंह आर्य के बचाव में जिस तरह नंदू भैया मीडिया से मुखातिब हो रहे थे उससे अध्यक्ष की गरिमा घटी भले ही न हो लेकिन बढ़ी भी नहीं है।

इस तरह की बातें और संगठन महामंत्री से मतभेद प्रदेश भाजपा नेतृत्व में बदलाव की बातों को हवा देते हैैं। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर भाजपा को दो बार विधानसभा चुनाव में बहुमत दिलाने वाले नरेंद्र सिंह तोमर की याद पार्टी हाईकमान से लेकर भोपाल तक कई शीर्षस्थ नेताओं का आ रही है। इसमें संघ के वरिष्ठ नेता भी शामिल हैैं। हालांकि तोमर जितने उपयोगी राज्य के लिए हैैं फिलहाल मोदी मंत्रिमंडल में केंद्रीय मंत्री के नाते इनकी महत्ता कम नहीं है। लेकिन अगले साल चुनाव है और सीएम शिवराज का गिरता ग्राफ और संगठन में कलह हाईकमान को चिंता में डाले हुए हंै। शिवराज सिंह की किसानों में जबरदस्त स्वीकार्यता रही है। लेकिन खेती को लाभ का धंधा बनाने का उनका नारा बुरी तरह पिट गया। प्रदेश में किसान आत्महत्या जैसे भयावह कदम बड़ी संख्या में उठा रहे हैैं। ऐसे में दुखी और नाराज किसानों पर मंदसौर में गोलीबारी, छतरपुर में पिटाई और गिरफ्तारी, भावांतर योजना का मैदान में पिट जाना और सूखा पीडि़त किसानों को मुआवजे में पांच-पांच तक के चेक मिलने से सीएम की साख को बट्टा लगा है। 2013 के चुनाव में इस किस्म के हालात नहीं थे। अब 2017 के जाते-जाते भाजपा का ग्राफ कार्यकर्ताओं में गिरा है। यही वजह है कि चित्रकूट विधानसभा उपचुनाव में जीत का दावा करने वाली भाजपा कांग्रेस से उसकी सीट नहीं छीन पाई। अभी दो और विधानसभा चुनाव मंुगावली और कोलारस होना है। इसमें भी कांग्रेस का पलड़ा भारी है क्योंकि ये दोनों सीटें कांग्रेस के खाते की हैैं। हारने की स्थिति में भाजपा चित्रकूट की तरह बचाव में कह सकती है कि यह सीटें उनकी थी ही नहीं तो हारने से कुछ नुकसान नहीं हुआ। ऐसे में राष्ट्रीय अमित शाह के उस बयान को याद करना पड़ेगा जिसमें उन्होंने कहा था कि कांग्रेस की सीटों को जीतना हमारा लक्ष्य होना चाहिए और वे 230 विधानसभा वाले मध्यप्रदेश में अगले चुनाव के लिए 200 पार का जादुई आंकड़ा भी दे गए हैैं। ऐसे में भाजपा को कांग्रेस की सीटें जीतना और अपनी सीट बचाना दोनों ऐसे ही काम हैैं जैसे आग का दरिया है और डूब कर जाना है। एक तो नौकरशाही की नाफरमानियों से जनता, भाजपा और विधायक, मंत्री परेशान हैैं। ऊपर से भाजपा कार्यकर्ताओं की शिथिलता पार्टी को चिंता में डाले हुए है। ऐसे हालात में संकट के वक्त काम करने वाले नरेंद्र सिंह तोमर की भूमिका फिर एक बार महत्वपूर्ण होने वाली है। हालांकि अध्यक्ष की दौड़ में सांसद प्रहलाद पटेल, कैलाश विजयवर्गीय, थावरचंद गेहलोत जैसे नाम शामिल हैैं। कुछ नए नवेले नेताओं में सुहास भगत के निकटस्थ विष्णुदत्त शर्मा का नाम भी लिया जा रहा है। शर्मा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से सीधे भाजपा में महामंत्री के रूप में काम कर रहे हैैं। चित्रकूट चुनाव में प्रत्याशी चयन में शर्मा और सुहास भगत की भूमिका भी खास रही थी लेकिन वहां उनका चयन गलत साबित हुआ और भाजपा आम चुनाव की तुलना में 4000 से ज्यादा वोटों से हारी।

जहां तक थावरचंद गेहलोत का मामला है उनका चयन अध्यक्ष के रूप में होता है तो वे सीधे अमित शाह के निकटस्थ हैैं और गुजरात के प्रभारी भी हैैं। ऐसे में प्रदेश के नेताओं को वे चुनाव साल में ज्यादा स्वीकार्य नहीं हो पाएंगे। हालांकि उनका दलित वर्ग से आना स्थिति को मजबूत करता है। प्रहलाद पटेल लोधी वर्ग से हैैं और प्रदेश में एक बड़े हिस्से में यह वर्ग निर्णायक भूमिका अदा करता है लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ उनके द्वारा बहुचर्चित डंपर कांड का आरोप उनकी राह में रोड़ा बना हुआ है। पटेल की तरह कैलाश विजयवर्गीय शिवराज सिंह के युवा मोर्चा काल के संगी-साथी हैैं। कार्यकर्ताओं में कैलाश की पकड़ भी अच्छी खासी मानी जाती है।

चुनावी साल में मुख्यमंत्री के साथ टिकट वितरण से लेकर अन्य किस्म के तालमेल में गड़बड़ी पार्टी को फायदे के बजाए नुकसान पहुंचा सकती है। ऐसे में पार्टी फिर नरेंद्र सिंह तोमर की तरफ रुख कर सकती है। दरअसल तोमर अध्यक्ष होने के साथ सभी नेताओं, वर्ग और क्षेत्र के हिसाब से तालमेल बैठाते आए हैैं। मिसाल के तौर पर इंदौर को ही लें तो वहां वे ताई (सुमित्रा महाजन) और भाई (कैलाश विजयवर्गीय) के बीच संतुलन बनाने में पारंगत हैैं। मंत्रिमंडल विस्तार के मामले में ताई-भाई की तनातनी इस कदर हावी हुई कि शिवराज सरकार में इंदौर से कोई विधायक मंत्री पद की शपथ ही नहीं ले पाया। एक तरह से यह मुख्यमंत्री की कमजोरी को दर्शाने वाला मामला भी है लेकिन यह सीएम को इसलिए स्वीकार्य होगा क्योंकि इससे उन्हें लाभ ज्यादा नुकसान कम है। सत्ताधारी दल में जब टिकटों की बंदरबांट मचेगी तब सबकी सुनने के साथ पार्टी लाइन पर काम करने का माद्दा कम लोगों में ही है। थोड़ी सी कमी भी पार्टी में बगावत और कार्यकर्ताओं में असंतोष की वजह बन सकती है। असल में इस बार बड़ी संख्या में विधायकों और मंत्रियों के टिकट काटे जाने की खबरें आ रही हैैं। ऐसे में असंतोष को थामने वाला एक ऐसा लीडर चाहिए जो खुद को पीछे रखे और पार्टी हित को आगे रखकर फैसले करे। 2013 में हालत यह थी कि नरेंद्र सिंह तोमर अध्यक्ष के साथ साथ कई बार असंतुष्ट नेता, कार्यकताओं की बात सुनने के मामले में संगठन महामंत्री की भूमिका भी निभाते थे। अंदरखाने की बात यह है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तालमेल के मामले में तोमर के साथ अधिक सुविधाजनक स्थिति में रहेंगे। हालांकि उनकी पसंद के हिसाब से गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह भी अध्यक्ष के लिए एक नाम हो सकते हैैं। मगर पार्टी ऐसे नेता की तलाश में है जो मुख्यमंत्री के साथ तालमेल बैठाए और दूसरे नेताओं का विश्वास हासिल करे।

लेखक मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार है