नहीं चाहिए तुम्हारा शेर हमारा बाघ ही काफ़ी….

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ज़हीर अंसारी
कितनी अफ़सोसनाक बात है कि सालों घिघ्याने के बाद हमारे सूबे को एक अदद शेर न मिल सका। शेर पर जैसा गुजरात सरकार का पेटेंट हो। कोई बात नहीं मध्यप्रदेश वैसे भी संतोषी प्रदेश है। हम अपने बाघों को ही शेर मान लेंगे और ख़ुश हो लेंगे।

मध्यप्रदेश ने कूनो पालमपुर सेंचुरी इस उम्मीद पर बनाई गई थी कि यहाँ बब्बर शेर गुजरात के गिर सेंचुरी से लाए जाएँगे। शेर की नस्ल को तैयार किया जाएगा। लेकिन मध्यप्रदेश सरकार की यह उम्मीद भी काफ़ूर हो गई। यह तब हुआ जब दोनों जगह भाजपा के सरकारें हैं। शेर को लेकर गुजरात सरकार का अड़ियल रवैया तो देखिए कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी ठेंगा दिखा दिया और शेर नहीं दिया।

माना कि कल तलक पीएम नरेंद्र मोदी गुजरात के मुखिया थे, गुजराती अस्मिता के ब्राण्ड अम्बेसडर थे, इसलिए मध्यप्रदेश उनकी वरीयता में नहीं था, पर आज तो वो देश के प्रधानमंत्री हैं, सभी राज्य समान हैं। इस लिहाज़ से मध्यप्रदेश की सालों पुरानी रिक्वेस्ट पर ग़ौर करना चाहिए था। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लगातार शेर लाने का प्रयास करते रहे लेकिन उनके अपने नेता ने ही शेर देने की बजाय हामी तक नहीं भरी।

ठीक है बब्बर शेर गिर सेंचुरी की मिल्कियत है जोकि गुजरात में है, गुजरात सरकार शेर दे न दे यह उसकी मर्ज़ी पर केंद्र सरकार को इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए था। प्रदेश की साढ़े सात करोड़ की जनता के लिए चंद शेर अगर दे भी दिए जाते तो उनका कुछ न बिगड़ता। प्रदेश में 22 सालों से बब्बर शेर के लिए बना कूनो पालमपुर सैलानियों से भर जाता और विलुप्त हो रहे शेरों की नस्ल में भी बढ़ोत्तरी हो जाती। प्रदेश सरकार की यह इच्छा अपनों की वजह से धरी की धरी रह गई।

शिवराज सिंह चौहान ने भी अब शेर की चाहत त्याग दी। उन्होंने निराश मन से वन अधिकारियों से साफ़ कह दिया कि कूनो पालमपुर में बाघों को ही शिफ़्ट कर दो। शेर की बजाय बाघों की सेंचुरी ही सही। प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता को शेर न सही बाघों से सब्र करना चाहिए और मुख्यमंत्री को तसल्ली देना चाहिए कि अपनों के छले का मातम मनाना मुनासिब नहीं।