विरोधाभास के वायुमंडल में भविष्य का विमर्श

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..जयराम शुक्ल

बुंदेलखंड अजीब विरोधाभासों के बीच सांस लेता है। एक ओर तलवार का शौर्य, तो दूसरी ओर छेनी-हथौड़ी से रचा गया नाजुक शिल्पलोक। एक ओर अकाल की काली छाया में सिसकता बचपन, तो दूसरी ओर मर्करी के झरनों से नहाया यौवन। आकाश से गरजते हुए हवाई जहाज जब विदेशी पर्यटकों को यहाँ उतारते हैं ठीक उसी वक्त एयरपोर्ट से दो किलोमीटर दूर बने खजुराहो रेल्वे स्टेशन से रेलगाड़ी यहां के मजदूरों को लादकर दिल्ली रवाना होती है। वहीं 35 मील दूर पन्ना की वादियों में चार्टेड बसें पर्यटकों को टाईगर रिजर्व में बाघ के रोमांच से साक्षात्कार के लिए तफरी कर रही होती ह़ैं तभी यहां के गांवों-कस्बों में सीमांत किसान और मजदूर उन बसों का इंतजार कर रहे होते ह़ैं जो उन्हें ढोकर दिल्ली-रोहतक-गुड़गांव रोजीरोटी के लिए ले जाती हैं। चंदेलों के बसाए खजुराहो के मंदिर दसवीं सदी से ही इस विरोधाभास के सदा साक्षी बने हुए हैं।

यहां 2 व 3 दिसम्बर को राष्ट्रीय जल सम्मेलन मेंं जल,जंगल,जमीन और जन की चिंता करने वाले पूरे देश से लोग जुटे। सूत्रधार थे जलपुरुष राजेन्द्र सिंह राणा और सबको यहां लाकर जोड़ने का काम किया झांसी के नौजवान सामाजिक कार्यकर्ता संजय सिंह ने। संजय अपनी युवा टीम के साथ जन-जल जोड़ो अभियान चलाते हैं। खजुराहो में इस समागम के पीछे का उद्देश्य था बुंदेलखंड का सूखा। विमर्श का विषय रहा इस क्षेत्र को दुष्काल और सूखे से मुक्त करने के लिए हम सब क्या कर सकते हैं। राजस्थान की मरुभूमि को पानीदार बनाने राजेन्द्र सिंह का आकर्षण तो था ही, अन्नाहजारे भी पूरे दो दिन यहां रहे। आँध्र, तामिलनाडु, कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश समेत देशभर से ऐसे लोग थे जो अपने गांव के स्तर से लेकर बड़े दायरे तक जल के बचाने और उस पर जन के अधिकार की लड़ाई लड़ रहे थे। एकता परिषद के रन सिंह परमार भी थे तो विन्ध्य क्षेत्र में के गांवों में चुपचाप काम करने वाले अरुण त्यागी जैसे वीतरागी सामाजिक कार्यकर्ता भी। पर्यावरण पर गहरी समझ रखने वाले लेखक व ख्यात स्तंभकार भारत डोंगरा भी पहुंचे। सम्मेलन में राजेन्द्र सिंह की चिंता और हस्तक्षेप हर क्षण रहा। जनलोकपाल आंदोलन के बाद परिदृश्य से लगभग ओझल रहे अन्ना हजारे यहां नए अवतार में प्रकट हुए। उन्होंने इसबार जनलोकपाल का नाम भूले से भी नहीं लिया। उनके फोकस में गाँव रहे।यहां नया नारा उभरा ..गांव बचाओ, देश बचाओ.. अब वे इसी अभियान को लेकर 23 मार्च यानी भगत सिंह के फाँसी दिए जाने के दिन दिल्ली में हुंकार भरेंगे। सम्मेलन स्थल पर ही कार्यकरताओं ने बीस हजार लोगों को दिल्ली ले जाने का संकल्प पत्र भर कर जलपुरुष राजेंद्र सिंह को दिया। यानी कि दो दिन में जल बचाने की गणित से ज्यादा ये समझ में आया कि अन्ना हजारे की रिलांचिंग होने को है और राजेंद्र सिंह राणा इसबार केंद्रीय भूमिका में रहेंगे।

अन्ना इस बार सतर्क दिखे। जैसे दूधका जला छाछ फूँक फूँककर पीता है वैसे ही अन्ना ने नाप तौलकर शब्द निकाले। पिछली टीस कहीं न कहीं थी। वे बोले- जहाँ कहीं जाते हैं नारा लगता है-अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं फिर जब वक्त आता है और पीछे मुड़कर देखते हैं तो सभी के सभी गायब। मेरे बगल में बैठे एक जलयोद्धा वाक्य पूरा करते हैं- सब कहीं न कहीं सेट हो जाते हैं.. केजरीवाल, वीके सिंह,किरण बेदी..फिर बुदबुदाते हैं (अन्ना फिर तुम्हारे साथ यही होगा)। अन्ना रौ में आते हैं और लोकतंत्र के दर्शन पर बोलने लगते हैं- देश में लोकतंत्र नहीं पार्टीतंत्र है। जनता मालिक जनप्रतिनिधि सेवक, यही बताया गया था न। अब वही सेवक तिजोरी में कुंडली मारके बैठ जाएंं और मालिक को आँख दिखाने लगें तो क्या करना चाहिए.? उस नौकर को निकाल बाहर करना चाहिए। अन्ना ने निष्कर्ष दिया – सरकारें सत्ता छिनने के भय से डरती हैं. हमे यह भय बनाना होगा। अन्ना का साफ-साफ संकेत नहीं था कि वे मोदीजी को लक्ष्य करके ऐसा कह रहे है या यूं ही दर्शन की बातें कह रहे थे। कुलमिलाकर प्रथमदृष्टया ये समझ मेंं आया कि खजुराहो सम्मेलन अन्ना का लाँचपैड है और देश भर के जलयोद्धाओं को मुदित आयोजक यह समाझाने की कोशिश कर रहे थे कि 23 मार्च को देश एक बार फिर हिलेगा।

बहरहाल देश जब हिलेगा तब। पर मैं बुंदेलखंड के गहरे विरोधाभास की थरथराहट से ही नहीं उबर पाया। मैं भी सम्मेलन का हिस्सा था। आयोजकों ने पूरे सम्मान के साथ बुलाया था। कोई परिचय नहीं था फिर भी। विश्वविख्यात अन्ना हजारे और राजेन्द्र सिंह राणा को देखने-सुनने की ललक थी। आयोजकों ने फोन पर बताया कि सम्मेलन में मुझे भी कुछ बोलना होगा। यह अवसर भी मुझ जैसे अदने आदमी को हिलाने वाला ही रहा। फिर आनंदानुभूति के साथ संतोष हुआ कि जल-जंगल-जमीन-जन पर जो कुछ लिख रहा हूँ कहीं न कहीं कोई नोटिश ले रहा है। महायोद्धाओं की उपस्थित में होने वाले इस राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए न्योतने के पीछे यही हो सकता है। फोकट में लिखने के भी दाम अंततः कभी न कभी किसी रूप में मिल ही जाते हैं। दो दिसंबर को सुबह ही पता चला कि इस सम्मेलन का उद्घाटन करने मुख्यमंत्री आ रहे हैं। अन्ना-राजेंद्र सिंह और मुख्यमंत्री.. इस विरोधाभास ने भी हिला दिया। ये हिलना तब बंद हुआ जब शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट किया कि वे मुख्यमंत्री की हैसियत से नहीं, कार्यकर्ता के रूप में भाग लेने आए हैं। उनके भाषण में किसान, जल, जंगल, जमीन की जो चिंता झलकी और फिर कार्यकर्ता से मुख्यमंत्री में परिवर्तित होते हुए कमिश्नर, कलेक्टर को निर्देश दिए तो लगा अब इससे आगे तो किसी को कुछ कहने, करने के लिए बचा ही नहीं। सबकुछ हल तो यूँही हो गया। अन्ना को मंच में आना था, इन्हें जाना था। इस टाइमिंग में भी विरोधाभास झलक गया। राजेन्द्र सिंह जी ने घोषणा की अन्ना का हवाई जहाज लैंड होने वाला है। यही वक्त श्री चौहान को गुजरात उड़ने के लिए मुकर्रर था। बाद में मंच से सूचना दी गई कि एयरपोर्ट में अन्ना जी और शिवराज जी के बीच हलो-हाय हो गई है। अन्ना ने अपने मन की बात बता दी है, उन्होंने मान ली है।

इन विरोधाभासों से उबरने के लिए दूसरे दिन सुबह खजुराहो के शिल्पलोक में आए इजरायल के कुछ पर्यटकों से उनके गाइड के मार्फत बतियाने कि 500 मिमी बारिश म़ें आप लोग कैसे जी लेते हैं और दुनिया ऊपर खेती भी कर लेते हैं के बाद सम्मेलन में शामिल हुआ। बोलने वालों की लंबी फेहरिस्त के बीच अन्ना के उद्बोधन के पहले साढे तीन मिनट बोलने के लिए पुकारा गया। मुद्दों पर कोई एक घंटे तक बोलने की मानसिक तैयारी के बीच साढे तीन मिनट में इतना ही बोल पाया- मैं अक्टूबर 2010 में यहीं इनवेस्टर्स मीट में आया था, तब डेढ दर्जन सीमेंट कारखानों और इतने ही थर्मल प्लांट के बीच एमओयू हुए थे, जो विंध्य क्षेत्र में बनने थे। पत्रकारवार्ता मैंने एक सवाल पूछा था- क्या कोई एमओयू इंद्रदेव के साथ भी हुआ है? क्योंकि यहाँ की नदियों में आठ महीने में डूब मरने के लिए चुल्लू भर पानी भी नहीं रहता। आज यहां जल के बचाने के जतन पर बातेंं हो रही हैं। पन्ना से गुड़गांव बसें जाती हैं, खजुराहो वाली रेलगाड़ी में मजदूर लद के जाते हैं। रिपोर्टर पन्ना में हीरे की कथा लिखने आते है, लौटकर घास की रोटी खाकर मजदूरी करने वाली गुजरतिया पर स्पेशल स्टोरी करके जाता हैं। चिंता-विमर्श तब से चल रहा है। आज भी यही तासीर और तस्वीर है बुंदेलखंड की। जो बात वहां नहीं कह सका वो ये कि..कि यहीं पानी के लुटेरों की इनवेस्टर्स मीट होती है और यहीं पानी के पहरेदारों का राष्ट्रीय सम्मेलन.. । प्रभुजी दोनों में उपस्थित रहते ह़ैं..विरोधाभासों के वायुमंडल में सांस ले रहे बुंदेलखंड तेरी पीड़ा, तेरी उत्सवधर्मिता, तेरी जीवटता, तेरी जिजीविषा को प्रणाम्। आज इतना ही कल गाँवों की चिंता पर कुछ और बुद्धिविलास करेंगे।

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