मौत साम्प्रदायिक क्यों नहीं होती….?

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ज़हीर अंसारी
बीती रात यूँ ही मैं भोपाल गैस त्रासदी पर चिंतन कर रहा था। 2 दिसम्बर 1984 की रात लगभग 11.30 बजे मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में इंसान निर्मित भूचाल आ गया था। यूनियन कार्बाइड की फ़ैक्टरी से ज़हरीली गैस ऐसी रिसी की राजधानी की आबादी बाहुल्य क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया। कोहरे के दबाव में ज़हरीली गैस नीचे-नीचे फैलती गई और हज़ारों लोगों को अपना शिकार बनती गई।

गैस क्यों रिसी, कैसे रिसी, शासन-प्रशासन ने क्या किया। फ़ैक्टरी का मालिक कैसे भगाया गया। कितनी कोर्ट-कचहरी हुई। पीड़ित पक्ष को क्या मिला, क्या नहीं। आज पीड़ितों की क्या दुर्दशा है। पूर्ववर्ती और वर्तमान सरकार ने क्या किया, क्यों नहीं किया इसके पचड़े में नहीं पड़ना चाहता।

मैं तो इस विषय पर चिंतन कर रहा हूँ कि अंग्रेज़ों के दौर में बोए गए साम्प्रदायिक वैमनस्यता के बीज अब तक वटवृक्ष बन चुके हैं। ज़िन्दा लोग आज भी इस वटवृक्ष के छांव तले इंसानी ज़िंदगी को बाँट रहे हैं लेकिन मौत इस साम्प्रदायिक हवा से दूर ही रही है। मौत ने इंसानों की तरह चीन्ह-चीन्ह कर किसी को नहीं मारा। भोपाल गैस त्रासदी में तक़रीबन तीस हज़ार लोग मारे गए। इतनी जानों को एकसाथ ले जाने वाले देव या फ़रिश्तों ने यह भेद नहीं किया कि कौन हिन्दू है, कौन मुस्लिम है, कौन ऊँची जात का है और कौन दलित जाति का। मौत ने तो सबको समान माना और सभी धर्म-जाति के लोगों को अपने साथ ले गई। लाशों ढेर में सिर्फ़ लाशें ही थी, न कोई हिन्दू था कोई मुस्लिम।

भोपाल गैस त्रासदी जैसी बहुत सारी त्रासदियों हर साल मुल्क के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग वजहों से होती हैं। इंसानी हुकूमत भले ही इंसानों को बाँटकर जीने को मजबूर करती हों लेकिन त्रासदी इनके मंसूबों को चकनाचूर कर देती है और जब मौत का तांडव होता है तो वह बिना किसी भेद के लोगों को समेट लेती है।

बेशक ज़िन्दा रहते सब संप्रदायिकता के वटवृक्ष की शीतल छाया में जीवन का संदेह भरा जीवन जी लें परंतु जब कोई प्राकृतिक आपदा या विपदा आएगी तो मौत संप्रदायिकता का, जातिवाद का तराज़ू लेकर नहीं आएगी, वो तो सब को समेट कर ले जाएगी। मौत के आगे इंसानों को बाँटने वालों की एक न चलेगी। भोपाल गैस त्रासदी इसका जीवंत प्रमाण है।

भोपाल गैस त्रासदी पर कविता के माध्यम से अंशुल कुकरेले ने श्रद्धांजलि प्रकट की है, जिसे मैं शेयर कर रहा हूँ:-

3 दिसम्बर 1984,,,,

ना वो रात होती ना उसकी याद होती,
ना वो मनज़र होता ना उसकी बात होती,

वो रात भी क्या रात थी ,
हलाहल विष की बरसात थी.
कहीं भग्दड़ थी कहीं लाशे थी,भयानक गुम्नामी कि अंधयारी रात थी,

वो रात भी क्या रात थी ,
हलाहल विष की बरसात थी.

क्या भागी सी सुबह थी,लाशों का जमघट था ,
ना धर्म कि ना जात की ज़िंदा मौत की शुरुआत थी।

हर मंज़र मे तूफ़ान था
हर शख़्स के मुख पर सवाल था
सवालों से घिरा था “भोपाल का मंज़र ”
और
सवालों के मुख़ातिब थे यूनीयन कार्बाईड और मौत का मंज़र

काश ,,,
ना 2 दिसम्बर की रात होती ना 3 की सुबह होती
ना ख़ून के आँसू होते ना चीख़ पुकार होती ,ना लाखों ज़िंदगीया तबाह होती

ना वो रात होती ना उसकी याद होती,
ना वो मनज़र होता ना उसकी बात होती

श्रृद्धांजली।।।।।