तो फिर महिलाओं को मुफ़्त दो सेनेटरी नैप्किन………..

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ज़हीर अंसारी
इतने साल उतने साल सुनकर देश थक गया है। जिसे देखो अतीत के किससे कहानियां सुना जाता है। ये नहीं हुआ, वो नहीं हुआ। ऐसा होना चाहिए वैसा होना चाहिए। उन्होंने ये नहीं किया, उन्होनें वो नहीं किया। इसी में सब वक्त बर्बाद कर रहे हैं| किसी को भी मातृशक्ति की तरफ देखने-सोचने की फुर्सत नहीं है| सभी राजनैतिक दल सत्ता के हवन में जनता की भावनाओं का ‘होम’ लगा रहे हैं| हवन का सुफल सत्ता के रुप में जब मिल जाता है तो ‘होम’ के रुप में इस्तेमाल की गई जनता की अपेक्षाओं और भावनाओं को हवन की राख समझकर फेंक दिया जाता है| यह कितने अफसोस का विषय है कि आजादी के 70 साल बाद भी देश की मातृशक्ति को सैनेटरी नैप्किन उपलब्ध नहीं है| यह कितने शर्मसार करने वाली बात है कि लगभग 43 करोड़ महिलाएं सैनेटरी नैप्किन खरीदने के काबिल नहीं है| 23 फीसदी बेटियां माहवारी शुरु होने पर स्कूल जाना छोड़ देती हैं|

मां दुर्गा, मां काली, मां पार्वती और सीता मैया की धरती पर जननी की इतनी खराब हालत क्यों है| इस पर किसी ने आज तक गौर नहीं किया| न ही धर्म गुरुओं ने, न ही सामाजिक संगठनों ने और न ही राजनैतिक दलों ने| अलबत्ता कुछ एनजीओ ने इस विषय पर अध्ययन किया है| रिपोर्टस तैयार कर केन्द्र और राज्य सरकारों को जमा की हैं| कुर्सी के मद में चूर अफसरों को जनसरोकार से जुड़ी रिपोर्टस देखने और उस पर निर्णय कराने का वक्त नहीं मिलता उन्हें तो नेताओं और खुद के फायदे वाली योजनाएं और रणनीतियों को अमलीजामा पहनाने में मजा आता है|

विकास की जब भी बात होती है तो सब विकसित या विकासशील देशों के आईने में अपनी शक्ल देखकर तुलना करते हैं| शक्ल तो बड़े गर्व से देखते हैं लेकिन उनकी सीरत से अपनी सीरत का मिलान नहीं करते| उनके सिस्टम, कार्यप्रणाली और नैतिक ईमारदारी का अनुसरण नहीं करते हैं| इन्हीं मक्कारियों की वजह से देश की 80 फीसदी महिलाएं सैनेटरी नैप्किन का इस्तेमाल नहीं कर पा रही हैं| बाजार में मिलने वाली सैनेटरी नैप्किन की कीमत इतनी होती है कि गरीब, निम्न मध्यम वर्गीय और मजदूर वर्ग की महिलाएं इसे खरीद ही नहीं पातीं| बहुतेरी महिलाएं अभी भी शर्म-हया की जकड़न में जकड़ी हुई हैं| संकोचवश अपनों को बोल नहीं पातीं और न बाजार से खरीद पाती हैं| बाजार में इनकी कीमत कोई कम नहीं है| सैनेटरी नैप्किन का एक पैकेट 25 से 35 रुपये में आता है| जिसमें 6 से 8 पैड होते हैं|

यह सर्वविदित है कि बच्चियों में 10 से 14 वर्ष की आयु में माहवारी शुरु हो जाती है और अमूमन 45-47 साल की उम्र तक रहती है जोकि प्राकृतिक प्रक्रिया है| सैनेटरी नैप्किन की जगह कुछ भी इस्तेमाल कर लेने की प्रवृत्ति महिलाओं के लिए द्यातक बन जाती है| अधिकांश महिलाएं एंडोमीट्रिओसिस, पेल्विक इंफेक्शन और रिप्रोडक्टिव ट्रेक्ट इंफेक्शन जैसी बीमारी से ग्रसित हो जाती हैं| उपयुक्त समय पर ध्यान न देने पर यही कैंसर जैसे द्यातक रोगों का कारण बन जाते हैं|

अफसोस इस बात है कि हम उन माताओं के लिए अपनी जान कुर्बान करने तैयार रहते हैं जो हमारी आस्था का प्रतीत है पर उन जननी माताओं के स्वास्थ्य पर कभी गौर नहीं करते जो साक्षात हमारे बीच विद्यमान हैं| यही साक्षात माता-बहनें अपने परिवार में ऐसे बच्चों को जन्म देती हैं और उनका पालन-पोषण करती हैं जो बढ़े होकर देश के भागीदार बनते हैं|

सरकारें वोट की ख़ातिर तरह-तरह की मुफ़्तख़ोरी वाली योजनाएँ चलाती हैं। कर्मठ को अकर्मणय बनाने में जी-तोड़ मेहनत करते हैं तो मातृशक्ति के लिए मुफ़्त सेनेटरी नैप्किन क्यों नहीं बाँट सकते?मातृशक्ति के स्वास्थ्य की चिंता की ही जाना चाहिए भले इसके लिए नया ‘सेस’ वसूल ले सरकार।