प्रदेश में अनदेखी और अनसुनी की नई परंपरा…..

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ज़हीर अंसारी
कल शाम के अख़बार में एक ख़बर पढ़ी। ख़बर यह थी कि इंदौर की महापौर सुश्री मालिनी गौड़ इंदौर की सांसद एवं लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन यानी ताई की नहीं सुन रही हैं। ताई ने कई चिट्ठियाँ लिखीं मगर महापौर महोदया ने उन्हें जवाब नहीं दिया। जवाब देना न देना महापौर का विवेकाधिकर है, पर ताई को जवाब न देना, यह आश्चर्यजनक सा लगा। इंदौर की राजनीति में ताई भीष्म पितामह जैसी हैं। आठ बार से सांसद हैं, राजनीति के अच्छे-बुरे दिन देखे हैं। इंदौर को मेट्रोपॉलिटन शहर में तब्दील करने में उनका अविस्मरणीय योगदान रहा है, ऐसी शख़्सियत के ख़तों का जवाब महापौर सुश्री गौड़ द्वारा न दिया जाना यह दर्शाता है कि भाजपा में अब छोटे-बड़े का लिहाज़ ख़त्म हो गया है। जिसके पास जितना राजनीतिक अधिकार है वह स्वयं-भू बनकर उसका उपयोग-उपभोग करना चाहता है, किसी का हस्तक्षेप उसे बर्दाश्त नहीं।
‘ताई’ ने सिर्फ़ इतना सुझाव दिया दिया था कि आवारा पशुओं को रेडियो कॉलर पहनाने की व्यवस्था की जाए।

बात सिर्फ़ ‘ताई’ की नहीं है, कमोबेश सत्ता पक्ष के सभी नेताओं की यही स्थिति है, कोई किसी को ‘भज’ नहीं रहा, सब अपनी मनमानी कर रहे हैं। मंत्री विधायकों को नज़रंदाज कर रहे हैं तो अफ़सर इनको ठेंगा दिखा रहे हैं। बड़े नेता तो सपने और उम्मीदें बाँटकर निकल जाते हैं, मुसीबत स्थानीय विधायकों की होती। घोषणाओं का क्रियान्वयन नहीं होने से विधायकों को पब्लिक से मुँह छिपाना पड़ता है।

अनदेखी और अनसुनी की नई परंपरा की चक्की में जनता की पिसाई तो हो ही रही है निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है। फिर भी बेचारे विधायक अनुशासन रूपी डंडे की डर से चुप्पी साधे सब कुछ सह रहे हैं।