कन्हा गया वो गुलजार गुरन्दी बाजार

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सुनील श्रीवास्तव
आज रविवार है, अचानक मैंने सोचा क्यों ना आज जबलपुर के 80 के दशक के प्रसिद्ध गुरंदी बाजार से सब्जी खरीदी जाये । में बचपन में हर रविवार को अपने पिता के साथ इस बाजार में सामान खरीदने जाता था । पर जब आज में यहां पहुंचा तो मैंने देखा की 80 के दशक में मेले जैसे लगने बाला यह बाजार अब उजाड़ बियाबान जैसा लगने लगा है ।
मेरे मानस पटल पर इस बाजार की कुछ धुंदली यादें अभी बाँकी है । इस बाजार में प्रवेश के कई रस्ते थे जैसे एक लक्षमी टाकीज के सामने, दूसरा गलगाल पुलिस चोकी के बाजु से, तीसरा बेलबाग़ चौक से, चौथा लक्कड़ खाने से पांचवा भरतीपुर मैदान से छटवां पेशकारी स्कूल की गली से शायद एक दो जगह से और रास्ता हो पर मुझे याद नहीं है । इन सभी प्रवेश द्वार पर साईकिल स्टैंड हुआ करते थे । मेरी याददास्त के अनुसार इन स्टैंडों को श्री लालजी सोनकर संचालित करते थे क्योकि इन स्टैंडों को उस समय लालजी के स्टैंड कहते थे ।
हम लक्षमी टाकीज के सामने से बाजार में प्रवेश करते थे प्रवेश द्वार पर 8 नलो के सरकरी नल थे जिनसे बाजार के व्यापारी पानी भरते थे । यंही पर 2 सिंधी भाई के चाट के ठेले लगते थे शायद उनके नाम रमेश और शंकर थे । आगे बढ़ने पर एक पागलो का दवाखाना था कोई डॉ बंसोड़ पागलो का इलाज़ आर्युवेदिक तरीके से करते थे । यही पर लालूमल की दुकान थी जिसमे सुबह हलुवा, मालपुआ, दाल पकवान, दाल पूरी और शाम को आलू प्याज़ मिर्च के भजिया के साथ आलुबंडा मिलता था । इसी दुकान के सामने 2 दुकान और लगती थी जिनमे पुड़ी सब्जी गुड़ की जलेबी और लाल पीले रंग के मोटे मोटे गुड़ में पके हुए सेव मिलते थे । इन्ही दुकानों के पीछे खुले पान का बाजार था जहाँ बंगला कलकत्ता नागपुरी कपूरी मघई वानरसी पान मिलते थे। अब यहीं से मार्किट शरू हो जाता था बाजार सड़क पर और चबूतरों पर लगता था । बाजार कई भागो में बिभक्त था जैसे सब्जी मार्केट, मसाला मार्केट, बांगड़ी बाजार, पक्षी बाजार, ढोर(पशु) बाजार, मक्षलि मार्किट आदि आदि । सब्जी मार्किट के कुछ खास व्यपारी थे भूरा सोनकर, अब्बास भाई, मोहन सेठ । हम हमेशा मोहन सेठ से आलू और भूरा से बाँकी सब्जी लेते थे । भूरा की सब्जी 1 नंबर होती थी पर थोड़ी महंगी होती थी पर वज़न में पूरी होती थी । कुछ व्यापारी डंडी मारने में माहिर थे जो 1 किलो में 700 ग्राम माल तोलते थे । उनका मॉल सस्ता होता था उनके शिकार अक्सर आस पास के ग्रामीण क्षेत्र के लोग होते थे। हाँ इस बाजार में किन्नरो की टोली भी आती थी और सभी व्यपरियो से थोड़ी थोड़ी सब्जी भाजी फ्री में लेती थी ।
यही पर नाई लोगो की भी दुकाने होती थी जिन्हें पटा सेलून कहा जाता था यहाँ पटा पर बैठकर बाल और ढाढी बनाई जाती थी। बांगड़ी बाजार में पुराने कपडे रफू कर बेचे जाते थे।
हाँ लक्षमी टाकीज में नज़ीर पहलवान मेनेजर हुआ करते थे जो जितना पैसा देता था उसे उतनी फ़िल्म दिखा देते थे।
लेकिन आज इस बाजार की हालात देखकर बहुत पीड़ा हुई । कभी जबलपुर की शान यह बाजार आज बेबसी के आँसू रो रहा है।

श्री सुनील श्रीवास्तव रेलवे में वरिष्ठ अधिकारी है यह आलेख उनकी फेसबुक वाल से साभार लिया आया है