सौतन’ बन गया ‘घरफोड़ू मोबाइल’

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-राहुल मिश्र ‘जबलपुरिया
धन्नालाल जी बोले,
“कलमकारों का जीवन भी अजीब होता है। दुनिया को तो ‘पढ़ाते’ रहते हो, पर अपने घर के लोगों को नही पढ़ा पाते। बाबू, आपकी ही हालत देखता रहता हूं मैं..!”
न जाने क्या उथल-पुथल चल रही थी उनके मन मे..? मसला सीधे ‘मेरे’ और ‘मेरी कौम’ से जुड़ा था, इसलिए मुझसे भी नही रहा गया।
“क्या हुआ आदरणीय..? कुछ ‘खोल’ के बताइए तो…?” मैने पूछा।
मुस्कुरा कर वे कहने लगे…” आपके जैसे ही एक और पत्रकार बन्धु मेरे मित्रों की फेहरिस्त में हैं। अब हुआ यूं कि उनकी जो ‘बीट’ थी…उसमे समाचार तो डेली निकलते थे.. पर ज्यादा से ज्यादा तीन या चार…! इतनी ‘बड़ी बीट’ से कम खबरों की एक और ‘गुप्त’ वजह थी, जो सिर्फ शहर के ‘उन’ पत्रकारों को ही मालूम थी, जो ‘उनकी बीट’ के थे। सो रूटीन की खबरें तो टनाटन बना देते थे वो कलमकार बन्धु, पर तीन-चार खबरों में टाइम कितना लगता है बनाने के लिए…? सो ज्यादा से ज्यादा एक-डेढ़ घण्टे में उनका ‘काम फिनिश’ हो जाता है। कोई भी काम खत्म होने पर जिस ‘बेफिक्री’ से वे बैठते, वो उनके ‘बॉस’ को खलने लगा।“
बताते हुए मन्द-मन्द मुस्कुराने लगे वे, बोले…” बॉस ने जतन लगाया और एक दिन अपने कलमकार भाई को ‘केबिन’ में बुला भेजा। उन्हें बॉस ने कहा कि ‘क्राइम रिपोर्टर’ इस वक़्त बिजी रहते हैं, और आप फ्री हो जाते हो। तो ऐसा कीजिए कि आप ‘शुभांक’ ले लीजिए और पेज पर लिखवा दिया कीजिए। “कलमकार भाई’ ने पूरे “प्रोफेशनल एटीट्यूड’ के साथ जोरदार हामी भर दी। हालांकि उनके दिमाग तक मे नही चढ़ी थी कि ये ‘शुभांक’ आखिर होता क्या है…?”
कहते कहते धन्नालाल जी हंसने लगे…” वहां से तय वे चले आये पर काफी मशक्कत के बाद ‘कलमकार भाई’ को पता चला कि ‘शुभांक’ पर ‘क्राइम रिपोर्टर’ साहब ने ‘रिसर्च’ कर रखी है। वे ही ‘सम्पूर्ण ज्ञान’ देंगे। सो वे उनकी शरण मे जा पहुंचे। तब जाकर ‘क्राइम रिपोर्टर’ साहब की रिसर्च का कुछ काम का हिस्सा वे समझ पाए। पता लगा कि दरअसल ये ‘शुभांक’ अखबारी कल्चर में ‘सट्टे’ का नाम था। दोपहर और रात को इनके नम्बर खुलते थे। पहले ‘ओपन’ फिर ‘क्लोज’। इनके कई शानदार नाम थे। ‘कल्याण’, ‘राजधानी”, ‘ मैन बजार या बम्बई मेन’ इत्यादि…!”
हंसी बातों का क्रम तोड़ने लगी तो धन्नालाल जी रुक कर हंसे थोड़ी देर जम के..फिर शुरू हो गए हंसते हंसते…” ‘शुभांक’ ‘खाने’ और ‘ खिलाने’ के ‘विशेष ठिकाने भी पता चले कलमकार भाई को। इन सबमे एक ‘ठिकाना’ भाई के दफ्तर से लगी हुई गली में ही था। इस ‘गली’ का ‘नाम’ ही ऐसी जाति के नाम पर था, जो ‘दारू बेचने, जुआ-सट्टा खेलने-खिलवाने, वेश्यावृत्ति और अपराध’ के लिए समाज मे ‘रजिस्टर्ड’ थी। ‘क्राइम’ रिपोर्टर साहब ने भाई को वहां के 5-6 ऐसे ‘ठीहे’ भी दिखा दिए और एक ‘स्थूलकाय’, ‘काली’ और “भयानक’ महिला से भी मिला दिया जो उनकी ‘इनफॉर्मर’ थी। वहीं से भाई को ‘डेली’ दोपहर औऱ रात को नम्बर पता कर के और ‘शुभांक बाजार’ की ‘हलचल’ की खोजखबर ले के आना होता था।“
“अब सुनो हिट…” कह कर जोर से हंसे धन्नालाल जी और कुछ देर रुक गए। सामने रखा पानी पिया और मुंह मे ‘घण्टा भृरे’ से दबा ‘गुटखा’ कचर के थूक दिया।
बोले, “ उस ‘इन्फॉर्मर मोटी’ के पास ‘कलमकार भाई’ ने अपना मोबाइल नम्बर दे दिया और वक़्त बेवक़्त जानकारी देते रहने को कह दिया। बदले में ‘मोटी’ ने भी एक ‘अजीब’ डिमांड रखी। वो ये कि लोकल थाने के एसआई ‘पण्डित जी’ से उसके ‘मिलने’ का ‘जुगाड़’ कर दो एक बार, ताकि उसके लड़के का ‘लेन’ के ‘धंधे’ पर कोई ‘चोट’ न हो। ‘कलमकार’ ने हामी भर दी ये सोच के कि कभी मौका देख के ‘पण्डित जी’ से बोल दूंगा।बस इसी ‘वादे’ को याद दिलाने और ‘दुश्मनों’ से बचने के लिए ‘दूसरे रास्ते’ से जाने को बोलने उसने एक दिन भाई को फोन कर दिया। अब मोबाइल में ऑटोमैटिक कॉल रिकॉर्डर एप्प था तो बातचीत रिकॉर्ड और सेव हो गई। एक छुट्टी के दिन भाई घर में अपना मोबाइल भूल आने का गुनाह कर बैठा। बस फिर क्या था..?”
धन्नालाल जी पेट पकड़ के हंसने लगे तो मैं भी मुस्कुरा उठा। अपनी जगह पर पहलू बदलते हुए पूछ ही लिया, “फिर क्या हुआ ..?”
धन्नालाल जी दोहरे हुए जा रहे थे हंसी से, बोले, “बाबू आगे की ‘कहानी’ में ‘इमोशन’ है, ‘ड्रामा’ है…’ट्रेजिडी’ है और ‘कॉमेडी’ भी…! अपने “कलमकार भाई’ की ‘जीवनसंगिनी’ भी ‘ज्यादा पढ़ी-लिखी’ थीं। ‘भाई’ के फोन के ‘पासवर्ड’ और ,’लॉक कोड’ तो रटे थे उन्हें। इधर भाई को घर से कुछ दूर चलते ही एह्साह हो गया कि वो अपना मोबाइल भूल आए हैं। लेकिन भाई यहीं ‘गच्चा’ खा गया। उसने सोचा कि घर मे है मोबाइल, ‘सेफ’ है। ऐसा कुछ उसकी याददाश्त में उस मोबाइल की मेमोरी में था भी नहीं, जो घर मे किसी को भी ‘आपत्तिजनक’ लगता। पर यहीं बहुत बड़ी गलती कर गए भाई। मोबाइल हाथ मे आते ही ‘ज्यादा पढ़ी लिखी अर्धांगिनी’ ने “कॉल हिस्ट्री’ ’ चेक कर डाली। ‘कुछ’ नही मिला, तो मोबाइल में इंस्टॉल ‘ऑटोमैटिक कॉल रिकॉर्डर’ एप्प खोल कर एक एक रेकॉर्डिंग सुनने लगी। बस इसी चक्कर में ‘श्रीमती भाई’ को ‘वो’ कॉल रेकॉर्डिंग मिल गयी, जिसमे ‘मोटी इन्फॉर्मर’ कलमकार भाई को ‘अपने अंदाज’ में कुछ “इंस्ट्रक्शन और टिप्स’ दे रही थीं।फिर क्या था..? मच गया ‘बवाल’…आ गया ‘भूचाल’।रात को ‘भाई’ घर लौटे तो उनका ‘स्वागत’ लाजवाब ‘तानों’ से शुरू हुआ।“
एक जोरदार ठहाका लगाते हुए उन्होंने अपनी ‘दास्तान’ जारी रखी। “ ‘जीवनसंगिनी’ ने ‘भाई’ को वो ‘भजनमाला’ सुनाई कि उनकी ‘हवा खिसक’ गई। ‘नारी क्रंदन’ से घर का कोना कोना ‘सहम’ उठा। ‘श्रीमती भाई’ ने उन्हें ‘वार्निंग’ दे डाली कि अब वो उनसे ‘बात’ नही करेंगी । उन्होंने धोखा दिया है। भाई लाख समझाते रह गए, पर ‘ज्यादा पढ़ी लिखी जीवनसाथी’ सब ‘समझ’ चुकी थीं और आगे कुछ भी ‘समझने को तैयार नही’ थीं। उस दिन से दोनों के बीच जो ‘जंग’ छिड़ी, उसके चलते उनकी इकलौती ‘बच्ची’ को 5 दिन तक ‘भूखे औऱ बिना टिफ़िन’ के स्कूल जाना पड़ा। आखिरकार भाई ने ‘कसमे’ खाईं, ‘श्रीमती’ के पैर पकड़े। तीन दिन ‘दोपहर का खाना’ नसीब नही हुआ। दोनों की ‘मम्मियां’ बीच मे आईं, तब कहीं जाकर ‘मामला शांत’ हुआ। अभी भी स्थिति ‘तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण’ में है।“
अब हंसी गायब हो चुकी थी धन्नालाल जी के चेहरे से। बड़े संजीदा होकर बोले, बाबू, “आप लोग इतने खतरनाक काम करते और समाज के निचले तबके के उद्धार के लिए जिंदगी भर लड़ते रहते हो। कहीं कोई ‘लोचा’ नही होता। पर इस ‘तकनीक’ के ‘इस’ जबरदस्त और ‘दोधारी तलवार’ जैसे विकास ने अब कलमकारों के ही नही पूरे देश मे परिवारों को तोड़ने का काम भी शुरू कर दिया है और इसने ‘स्पीड’ पकड़ ली है। बाबू, ये समस्या उस कलमकार की ही नही, घर-घर की कहानियों में तब्दील हो चुकी है। मोबाइल ‘जीवनसाथी’ के लिए ‘सौत’ बनने लगा है।अरे भैया, ये ‘घर फोड़ने वाला’ मोबाइल है या मुसीबत…?