स्कूपवाली पत्रकारिता’ का ‘मर्डर’, ‘स्कोपवाली ‘ जिंदा

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-राहुल मिश्र ‘जबलपुरिया’
करीब-करीब सिसक रहे थे धन्नालाल जी, आज जब आए। मेरे पूछने से पहले ही वो सवाल कर बैठे…”बाबू, आप तो ‘लॉ” भी पढ़े हो न..?”
मैनें हां में सिर हिलाया तो उन्होंने तपाक से अपना ‘ऑफर’ मुझ पर दे मारा।
बोले..”तो आप फौरन पत्रकारिता छोड़ दो। और वकालत चालू कर दो।“
अचानक हुए इस ‘हमले’ से मैं चौंक गया…”धन्नालाल जी…? आप ऐसा कह रहे हो..?”
“आपको अच्छे से मालूम है कि मेरे साथ मेरी ‘एक’ माँ, एक ‘अदद’ बीबी और एक बिटिया भी है। पत्रकारिता की ‘नौकरी’ छोड़ दी तो हर महीने ‘तनख्वाह(जिससे सिर्फ सिर्फ तन की ख्वाहिशें, भूख, प्यास, कपड़े की डिमांड पूरी हो सकें ) कौन देगा..? ‘वकालत’ जमाने मे ‘जूते’ तो क्या ‘पैर’ और ‘जिंदगी’ तक घिस जाती है। तब तक कैसे बीबी-बच्चे और माँ को पालूंगा…? आखिर क्या सोच के ये ‘लुभावना आफर’ दिया आपने मुझे…?”
कुछ खिन्न सा होकर मैने उत्तर दिया तो धन्नालाल जी की आंखें डबडबा गईं..कहने लगे- “बाबू, आज ‘पत्रकारिता का मर्डर’ हो गया….!!”
“खूब ‘सच’ लिखने का ‘दम्भ’ भरते हो न…? भून दिए जाओगे गोलियों से ।”
” देश के लोकतंत्र की ‘शानदार इमारत’ जिसका नाम ‘भारत’ है, चार ‘खम्बों/पिलर्स/स्तम्भो’ की बुनियाद पर ‘इतराती’ खड़ी है। इस ‘मजबूत’ इमारत का ‘सबसे मजबूत पिल्लर/स्तम्भ’ आज कुछ ‘नाशुकरों’ ने ‘गोलीयों’ से ‘गिरा’ दिया। आज इस ‘पिलर/स्तम्भ’ के साथ अपने आप बना मेरे ‘भारत’ के ‘लोकतंत्र की इमारत’ का ‘वाच टावर’ भी ध्वस्त हो गया।“
धन्नालाल जी का आवेग चरम पर था…बोले, “ लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं ये सबको मालूम है। पहला ‘विधायिका’ यानी संसद/विधानसभा, दूसरा ‘कार्यपालिका’ यानी अफसरशाही/ब्यूरोक्रेट्स/सरकारी अमला और तीसरा इन दोनों का ‘बैलेंस’ बनाए रखने वाला अहम पिल्लर ‘न्यायपालिका’..! इन तीनों स्तम्भों/पिलर्स/खम्बों की ‘कार्यप्रणाली, कार्य और कारगुजारियों’ पर नज़र रखना, इन की ‘खबर’ इस ‘जनतंत्र की इमारत’ में रहनेवाले लोगो तक पहुंचाना, अन्य ‘तीनो पिलर्स’ में लगी ‘ईंट,सीमेंट, गारा’ की जानकारी प्रसारित करना और ‘लोकतंत्र की सबसे बड़ी इमारत’ के लोगों को इन ‘पिलर्स’ की कमजोरियों/खामियों/गुणों से समय-समय पर आगाह कराते रहने की सबसे अहम जिम्मेदारी इस ‘चौथे स्तम्भ/पिलर/खम्बे’ पर है। जिसे आप लोग ‘पत्रकारिता’ कहते हो।“
“बाबू, सुन लो…” कह कर उत्तेजित होने लगे धन्नालाल जी..बोले, “ ‘घर मे रहने वालों’ को ‘घर’ की उन कमजोरियों को बताने का ‘ठेका’ भी इसी पिलर/स्तम्भ का है, जिनके कारण कभी भी ये ‘घर’ और यहां रहनेवाला हर ‘आम-ओ-खास’ नेस्तोनाबूद हो सकता है। घरवालों को हर दिन ‘तैयार होने’ के लिए ‘आईना’ दिखाने और ‘जानकारियों’ के ‘मेकअप’ का जिम्मा भी इसी स्तम्भ का ही है। ऐसे में इस स्तम्भ में लगी हर ‘ईंट/सरिया/रेत/सीमेंट” का फर्ज है कि वो ‘सच’ कहें। लेकिन अफ़सोस कि बाकी ‘तीनो स्तम्भों’ की ‘कमजोर और घटिया’ ईंटें/ सीमेंट की बोरियां/सरिए इकट्ठे होकर ‘चौथे स्तम्भ’ की हर ईंट/सीमेंट की बोरी/सरिए पर ‘जबरन’ लोड डालते रहते हैं। इससे ये स्तम्भ पहले ही कुछ ‘कमजोर’ हो चला था। पर आज तो गज़ब कर दिया ‘विरोधी ईंटों/सरियों’ ने..’चौथे पिलर/स्तम्भ’ को ही ‘ध्वस्त’ कर दिया। बाबू…” एक लंबी सांस लेते हुए धन्नालाल जी उठ कर खड़े हो गए।
बोले, “ आजकल ये चौथा स्तम्भ कुछ ‘सोने-चांदी’ की ‘पोलिश’ के ‘बोझ’ से लदकर ‘टेढ़ा’ जरूर हुआ है कुछ, लेकिन ‘मजबूत’ आज भी बहुत है। लेकिन जब बाकी तीनो पिलर मिल कर कभी धर्म के नाम पर, कभी सच बोलने की वजह से, कभी झूठ खोल देने से और कभी महज इस डर से कि हमारी ‘खुल’ जाएगी….इस ‘मजबूत चौथे स्तम्भ’ को पहले ही कई तरीकों (पैसे/जमीन/बिजनेस) के ‘घुन’ कमजोर जरूर कर चुके हैं, लेकिन चारों स्तम्भों/पिलर्स में अभी भी यही ‘खली’ है।“
मुस्कराते हुए उन्होंने कहा, पर फिर अचानक भाव-भंगिमा बदल गई। गुस्से से बोले, “ घर के पहरेदार की हत्या के साथ, वाच टावर गिरा कर घर का एक मुख्य पिल्लर ही ध्वस्त कर दिया जाए। और ये काम बाकी ‘तीन में से एक’ या ‘तीनों की मिलीभगत’ से हुआ हो तो ‘घर’ कब तक खड़ा रहेगा। जहां ‘पत्रकारों’ को ‘सच’ लिखने पर घर मे घुस कर गोली मार दी जाती हो, समझ लो वहां जल्द ही ‘लोकतंत्र’ विलुप्त होने वाला है या हो चुका है। इसलिए मैंने तुम्हें ‘पत्रकारिता’ छोड़ने की सलाह दी थी। मुझे माफ़ कर देना बाबू….।“
फिर धीरे से मेरा दांया हांथ अपने दोनों हाथो मे लेकर हौले से दबाते हुए बोले, “ राज की बात सुनो…’पत्रकारिता’ करनी है तो ‘स्कोपवाली’ करो…’स्कूपवाली’ नही…किसी को जबरन ‘उंगली’ मत करो..जो हो रहा, होने दो…जहां ‘मिलने’ की ‘गुंजाइश’ हो, ‘ईमानदारी और कर्तव्य’ थोड़ी देर के लिए भूल जाओ। और जहां न हो वहां अच्छा-अच्छा लिख दो। ‘गुंजाइश’ बन जाएगी। ‘कुछ भी’ लिखो पर किस्म-किस्म के ‘ठेकेदारों’ के खिलाफ मत लिखो…वरना यही हश्र होगा। और हां, ‘ठेकेदारों’ की किस्में जल्द ही बताऊंगा तुम्हें। बाबू, बस इतना समझ लो कि ये ‘ठेकेदार’ ही हमारे ‘लोकतंत्र’ के ‘ विनाशक’ बनेंगे।“