‘धवल वस्त्रधारी’ देवताओं से रक्षा करो गजानन…!

0
71

-राहुल मिश्र ‘जबलपुरिया’
आज मेरी तबीयत कुछ ठीक नही लग रही थी तो छुट्टी लेकर घर में लेटा था। तभी बाहर से आवाज लगाते हुए धन्नालाल जी मेरे कमरे तक चले आए। वे भी कुछ अनमने लग रहे थे। आते ही कहने लगे, “लो तुम भी बीमार पड़ गए बाबू…! हम तो पहले ही भोग रहे हैं ‘नरक निगम’ की ‘डोर-टू-डोर’ सफाई(गन्दगी) का परिणाम…अब आपके मोहल्ले में भी तो ‘तीस रुपये + तीस रुपये’ हर महीने वाली ये ‘स्कीम’ चालू है। ‘तीस+तीस’ वसूलने वाले दिन तो मोहल्ला ‘झकाझक’…और वसूली के बाद ‘गधे के सिर से सींग गायब’ …बीमारियाँ’ तो हमारी ‘किस्मत’ बना दी गयी है न।“
अब मैं भी फुर्सत में था, तो उनकी बातों के ‘मर्म’ तक पहुंचने की कोशिश करते हुए शांति से बैठा हूँ-हाँ करता रहा।
धन्नालाल जी खंखार कर गला साफ करते हुए बोले, “भगवान बचाए बाबू इन बीमारियों से। इन ‘धवल वस्त्रधारी देवताओं’ से पाला न ही पड़े तो बेहतर…! अब हमें ही ले लो…तीन हफ्ते से लगातार रात को नहाता हूं। बुखार, सर्दी तो होनी ही थी, हो गई। परवाह नही की तो परसों डॉक्टर के यहां जाना पड़ गया। ‘पहचानवाले’ डॉ साहब ने पहले तो कुछ चेक करने की जरूरत ही नही समझी। इससे पहले ही उनकी नर्स ने एक लंबी सी पर्ची में कम से कम ‘एक दर्जन टेस्ट’ लिख कर फ़ाइल डॉ साहब के सामने रख दी। डॉ साहेब ने फ़ाइल पर ‘सीजीएचएस’ की सील देखकर बाकी कुछ देखना मुनासिब ही नही समझा। समझ गए कि ‘मोटा मुर्गा’ है। पैसे भी ‘सरकार’ देगी। सो ‘सफ़लता भरी’ मुस्कुराहट के साथ मुझसे कहा कि ये टेस्ट पहले करा के लाओ। कहाँ होंगे ये तुम्हे ‘नर्स मैडम’ समझा देंगी।“

कुछ थके जैसे धन्नालाल जी पानी पीने के लिए रुक गए। फिर उनकी ‘बीबीसी’ चालू हो गयी। बोले—
“बाबू, नर्स मैडम के पास गया तो उसने एक पैथोलॉजी सेंटर का ‘विजिटिंग कार्ड’ हाथ पर रख दिया। बोली-यहां चले जाओ अभी के अभी…डॉ साहब का नाम बताना…’कन्सेशन’ मिल जाएगा। मैं समझ गया पर चुप रहा कि ‘कन्सेशन’ कितना ‘देना’ पड़ेगा मुझे, ये तो फ़ाइल और पर्चे पर डॉ साहब ‘रेफर्ड बाई’ और ‘अपना नाम’ लिख कर पहले ही तय कर चुके थे। ये सोच के मन ही मन हंसा जरूर कि ‘पढ़ाओ मैडम, हम बीमार हैं न…? पढा लो..’! मैडम ने अगला पाठ पढ़ाते हुए एक और कार्ड दिया और इस बार ‘कन्सेशनवाले’ एक्सरे सेंटर का जिक्र कर वहीं जाने को कहा। अंत मे प्यार भरी धमकी भी कि डॉ साहब को और कहीं की ‘जांच’ पर ‘विश्वास’ नही है। रिपोर्ट वापस कर दी तो हमे मत कहना। मरता क्या न करता, सो गया और उन्ही ‘कन्सेशन वाले’ सेंटरो से कम से कम दो हजार रुपये ‘एक्स्ट्रा कन्सेशन’ सहित 5 हजार रुपये देकर रिपोट की एक अदद ‘चार पन्नों’ की फाइल लेकर चला आया। “
धन्नालाल जी अब फिर गुस्सा होने लगे, “ रस्ते भर में पन्द्रह पैथोलॉजी सेंटर में रेट पता कर के आया हूँ हर टेस्ट के। बाबू, पूरे दो हजार रु कमीशन…गलत है। चलो अब डॉ को रिपोर्ट दिखा दूं, सोचकर डॉ साहेब के यहां फिर पहुंचा। ‘मरीज’ को तो डॉ साहब ने आला तक नही लगाया…इतने ‘एक्सपर्ट’ थे वो। खाली रिपोर्ट को ‘चश्मे’ से निकली पड़ रही फ़टी आंखों से पढ़ा कुछ मिनट। फिर सामने से राईटिंग पैड खींच और शुरू हो गए…! ‘एक दर्जन’ से अधिक दवाएं मुझे छुए बिना ही ‘चमत्कारी डॉ साहब’ ने लिख मारीं। ये देख के मेरा दिल ‘उनकी काबिलियत’ पर श्रद्धावनत हो उठा और ‘चरणसेवा’ को मचलने लगा। दवा लिख कर डॉ साहब ने नज़रें उठाई और चलते-चलते दवा की बजाय फिर वही ‘कन्सेशन ज्ञान’ का ‘डोज’ दे दिया। उन्ही के ‘हॉस्पिटल के नीचे की ही’ मेडिकल शॉप में ये दवा मिलनी थी और ‘कन्सेशन’ भी यहीं देना था। दवाओं में ये ‘कन्सेशन’ ज्यादा है, जानकर खुश हो जाओगे बाबू….” धन्नालाल जी का चेहरा व्यंग्यात्मक घृणा से विद्रूप हो उठा।
“ तीन हजार रु की दवाई मिली चार दिन की।इसमे ‘एक हजार रु कन्सेशन’ था। वो तो मैंने मना कर दिया, वरना डॉ साहब के ‘पुण्य विचार’ तो मुझे ‘बीस दिन की दवा’ यानी ‘पांच हजार रुपए’ का ‘कन्सेशन’ दिलाने का था।“
गुस्से की चरम सीमा तक पहुंचते हुए उन्होंने मेज पर ताकत से घूंसा पटका और बोले…”बाबू, कोशिश करना कि आराम, खानपान में संयम और सावधानियां बरत सको। गणेश भगवान तुम्हे जल्द स्वस्थ करें, पर कभी इन ‘धवल वस्त्रधारी’ ‘कलयुगी देवताओं’ के ‘चंगुल’ में न फंसाए। तुमने भी स्कूल में संस्कृत के सुभाषित पढ़े होंगे, जो हम भूल गए। पर मुझे कई सुभाषित उनके भावों की वजह से आज भी याद हैं। वह कुछ ऐसा है—
वैद्यराज नमस्तुभ्यं – यमराज सहोदरा…
यमस्तु हरति प्राणं, वैद्यौ प्राणान धनैन्यच ||

अर्थात…हे वैद्यराज – यमराज के सहोदर – आपको प्रणाम है । यमराज तो केवल प्राण ही हरते हैं – आप तो प्राण के साथ धन भी हर लेते हो..।

राहुल मिश्रा युवा पत्रकार है और सामाजिक विद्रूपों पर लगातार अपनी कलम चलाते रहते है यह आलेख उनकी फेसबुक वाल से साभार लिया गया है
फोटो सांकेतिक है