चमचा और चाटुकार में अंतर………………

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राहुल मिश्र ‘जबलपुरिया’

चाटुकारिता और चमचागिरी को लोग पर्यायवाची शब्द मानते हैं। शब्दकोश भी कुछ ऐसा ही कहते हैं, हालांकि स्पष्ट व्याख्या दोनों शब्दों की कहीं नही है।
सो बैठे बैठे मन मे ख्याल आया कि चलो दोनों में भेद बताया जाए…जो अपनी समझ मे आया। और अपनी समझ मे आया धन्नालाल के प्रवचन रूपी नशे में दिए सम्भाषण से।इन धन्नालाल के बारे में फिर कभी …पर अभी उनके प्रवचन पर आधारित विश्लेषण की बात हो जाये।
हां तो पहले बात चाटुकारिता की। यह शब्द चाटने से बना है। जरूरत पर आका/नेता के तलवे, पैर, थूक और भी न जाने क्या-क्या चाटने की विलक्षण कलाओं में निष्णात होते हैं ये चाटुकार। ये सब चाट पोंछकर आका,/नेता का काला-पीला साफ करके सुपर रिन की चमकार दे देते हैं। इनके स्वामी/मुखिया अगर कहीं खखार कर थूक भी दें तो इनकी हर सम्भव कोशिश उसे हाथ मे लेने की होती हैं । वो सम्भव नही हुआ तो कहेंगे-नेताजी को दही की उल्टी हुई है। इस अनन्य भक्ति का सुपरिणाम भी उन्हें मिलता रहता है वक़्त वक़्त पर। कभी बच्चे और उसके साथियों के एडमिशन, नौकरी, कभी कोई लायसेंस, लीज , पत्ता या फिर अन्य कोई काम हो तो नेताजी का फोन तत्काल डायल होने लगता है। तभी तो चाटुकारों के बेटे,-बेटियां, साले, सलियाँ, मांमा-फूफा के भाई-भतीजे सब बेहतरीन जॉब्स में हैं चाटुकार महोदय भी घर बैठे रुपये छापने की मशीने लगा कर बैठे हैं और नॉट छाप रहे हैं। और क्या चाहिए भला आम जनता के एक चाटुकार माहिल को..?
तो चाटुकार मतलब जी-हुजूरी करके अपना उल्लू सीधा करने वाला नेता/मुखिया का पालतू कुत्ता…!
अब जरा चमचागिरी शब्द को देखें। चम्मच या इसके बड़े भाई चमचा शब्द से इसकी व्युत्पत्ति है। चम्मच या चमचा का काम होता है खानेवाले के हाथ मे खाना/जूठन लगने से बचाकर खाने वाले के मुह तक पहुंचाना। चम्मच रखे जाते हैं, चाटुकार होते हैं। चम्मच को अपने नेता/आका का हाथ और मुंह गन्दा/काला होने से बचाने की कमीशन मिलती है। हर बार खिलाने के बाद उसे कायदे औए खुशबूदार साबुन से नहलाया जाता है । फिर आका/नेता के पसंदीदा डाइनिंग टेबल या आलीशान किचन में जगह दी जाती है। और हां , मजाल है नेता/आका के आदेश या इशारे के बिना कोई चम्मच को छेड़ भी जाये..?
तो अब समझ गए होंगे आप धन्नालाल की थ्योरी..जो काम कराने के लिए तलवे और ‘सब कुछ’ चाट सके, वो सफल चाटुकार ….और जो कमीशन खिलाने और खानें के चक्कर मे आका/नेता का मुंह-हांथ गन्दा होने से बचाकर उसका कुम्भकर्णी पेट भर सके वो पक्का चम्मच या चमचा…!
तो अब आप ही सोचिए..? नेताओं/आकाओं/ मुखियों को तो दोनों प्यारे हैं न…? सो दोनों ही पालने का उन्हें शौक है। और हमे पलने, चमचागिरी और चाटुकारिता के आला शौक़ हैं।
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