जापानी इन्सेफेलाइटिस:…………

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डा. अव्यक्त अग्रवाल
मैं कुछ अज़ीब लेख चिकित्सकों के नाम से देख रहा हूँ जिसमें बताया गया है क़ि ऑक्सीजन इन्सेफेलाइटिस का इलाज नहीं है। और कितनी भी ऑक्सीजन हो मरीज़ बचाया नहीं जा सकेगा।इसे ही pseudoscience या scientific facts का distortion कहते हैं।
मुझे आश्चर्य होगा यदि वाक़ई किसी क्वालिफाइड चिकित्सक ने यह लिखा होगा तो। क्यूँ यह भ्रामक है कि ऑक्सीजन का इलाज से सम्बंध नहीं पोस्ट के अंत में आप समझ जाएंगे।
जापानी इन्सेफेलाइटिस का नाम जापानी इसलिए पड़ा क्योंकि 1870 में पहली बार जापान में यह बीमारी पकड़ी गई । तत्पश्चात यह सम्पूर्ण एशिया एवं विश्व में पाई जाने लगी।
किंतु जापान से शुरू हुई बीमारी ,जापान की अच्छी स्वास्थ्य एवं साफ़ सफाई जैसी सेवाओं और जागरूकता की वजह से अब नहीं पायी ज़ाती।चीन,थाईलैंड,जापान,कोरिया ने भी इससे निजात पा ली है । भारत,पाकिस्तान,नेपाल,ताइवान में यह अब भी होता है।
निज़ात पाने मात्र सूअर, मच्छर से बचना है लेकिन हम यह भी न कर पाए। सुअर से भी नहीं मात्र मच्छर से निज़ात बीमारी से निजात है।अमेरिका में साल भर में एक केस मिल जाता है वह भतब जब कोई एशिया पर्यटन को गया हो ।
भारत में इन्सेफेलाइटिस अर्थात मस्तिष्क में संक्रमण अनेक वायरस से पाया जाता है। जिनमे एंटेरो वायरस एवं जापानी encephalitis सबसे प्रमुख हैं लेकिन जापानी encephalitis , भारत के कुछ ही हिस्सों में पायाजाता है। जिनमे गोरखपुर सबसे प्रमुख है।
एशिया में 30 से 50000 केस प्रति वर्ष इसके होते हैं जिनमे गोरखपुर का हिस्सा सबसे बड़ा होता है।
यह फ्लेवी वायरस केटेगरी का वायरस है डेंगू की ही तरह जो क़ि खुद भी एक फ्लेवी वायरस है।
जापानी बुखार का वायरस सूअर एवं जंगली चिड़ियों,बगुलों के अतिरिक्त मनुष्य में पाया जाता है।
लेकिन सूअर में यह शक्तिशाली और संख्या में बढ़ोतरी करता है,उसे बीमार नहीं करता। फिर क्यूलेक्स मच्छर जब इस सूअर को काटता है तो मच्छर और मच्छर से मनुष्य में प्रवेश करता है।
जुलाई से सितम्बर में मरीज़ इसलिए ज़्यादा होते हैं बहुत क्योंकि क्यूलेक्स मच्छर इस मौसम में बहुत बढ़ जाते हैं।
बच्चों ,बड़ों दोनों को बीमार करता है किंतु बच्चों के गंभीर होने की संभावना अधिक होती है।
ज़ैसा कि कुछ चिकित्सकों के नाम से वायरल होती पोस्ट्स में लिखा है क़ि जापानीज बुखार के सभी बच्चे ख़त्म हो जाते हैं तो इसका यह उत्तर है कि,
250 बच्चे यदि जापानीज इन्सेफेलाइटिस वायरस से ग्रसित होंगे तो 249 आसानी से हल्के बुख़ार के बाद ठीक हो जाएंगे।
एक बच्चा गंभीर होगा।
जनसंख्या घनत्व को देखते हुए हालाँकि 250 में से 1 गंभीर भी बहुत अधिक होगा किसी मेडिकल कॉलेज को भर देने के लिए।
यह वायरस मस्तिष्क में पंहुचकर मस्तिष्क के हिस्सों को ख़राब करने लगता है जिससे सरदर्द,बुखार,उल्टियों के बाद झटके,बेहोशी ,हो जाती है।
वायरस को मारने की दवा नहीं है किंतु ज़ल्दी उपचार शुरू करने पर उन गंभीर इन्सेफेलाइटिस के50 प्रतिशत बच्चों की जान बचाई जा सकती है। किंतु बचे हुए 50 प्रतिशत में से 30 प्रतिशत मस्तिष्क की जीवनभर को ख़राबी के साथ जियेंगे।आसान करके समझाऊं तो 100 बच्चों में से 50 की मृत्यु, 30 मस्तिष्क की ख़राबी, एवं 20 बच जाएंगे।
शुरुआती उपचार में #ऑक्सीजन और #फ्लूइड (ड्रिप ) सबसे प्रमुख हैं। साथ ही झटकों और मस्तिष्क के बढ़े द्रव्य और प्रेशर को कम करने वाली दवाएं प्रमुख हैं।
यह सच है क़ि viral encephalitis या Japanese Encephalitis.. का इलाज ऑक्सीजन नहीं है।लेकिन क्योंकि इन बीमारियों में बेहोशी ,झटके एवं फेंफड़ों में
Aspiration pneumonia एवं शॉक भी होता है जिससे रक्त में ऑक्सीजन कम हो जाता है, इसलिए ऑक्सीजन लगाया जाता है और ज़ीवन को बचाया भी सकता है। मस्तिष्क को hypoxic damage(ऑक्सीजन की कमी) से बचाया जा सकता है। बहुत से बच्चों को वेंटिलेटर की आवश्यकता होती है क्योंकि मस्तिष्क के सांस लेने के सेंटर में संक्रमण एवं प्रेशर के बढ़ने से ये बच्चे अच्छे से सांस नहीं ले पाते।
मुझे किसी घटना पर कुछ नहीं कहना किंतु इस तरह के भ्रामक प्रचार से बचें। जो कि एक बीमारी के उपचार को ही फेसबुक पर तय कर रहे हैं।
किसी भी चिकित्सक को ऑक्सीजन लगाने में आनंद नहीं आता। कहीं ऑक्सीजन लगी थी बच्चों को तो इसकी आवश्यकता रही ही होगी उन्हें।कोई मरीज़ मर ही रहा हो तो भी उसे हर संभव संसाधन और प्रयास मिलने ही चाहिए। मरीज़ मर रहा है और न बचने की उम्मीद हो तो क्या सब इलाज बंद कर दोगे?दुनिया के किसी भी कारण से मृत्यु के पहले ऑक्सीजन दी ही जानी होती है।।
इसलिए मुझे नहीं लगता इस तरह के बचकाने तर्कों वाले लेख किसी चिकित्सक ने लिखे होंगे।
बचाव:
सूअर,मच्छर,गन्दगी से बचाव। क्या यह इतना मुश्किल है भारत में??..शायद हाँ…
और इसका एक प्रभावी टीका भी आता है जो उत्तरप्रदेश सरकार भी देती है इन क्षेत्रों को केंद्र, WHO की मदद से।

डाक्टर अव्यक्त अग्रवाल के फेसबुक वाल से साभार