ग़रीबों की आफ़त अमीरों को राहत…….वाह रे वित्त मंत्री ……….

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ज़हीर अंसारी
केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली कुछ दुविधा में हैं या परेशानी में चल रहे हैं। रक्षा मंत्रालय के अतिरिक्त भार के कारण शायद उनकी मनोदशा दिग्भ्रमित हो गई है। वो यह कहते नहीं थकते कि देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर है। जबकि उनके अपने ही उनके दावों को नकार रहे हैं। जिस नोटबंदी और जीएसटी को ऐतिहासिक क़रार देते थकते नहीं हैं उसकी ज़मीनी हक़ीक़त की कलई केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन ने खोल कर रख दी। सांसद में सुब्रमणियन ने जो अर्धवार्षिक समीक्षा रिपोर्ट पेश की है उसके मुताबिक़ अपेक्षित ग्रोथ रेट 7.5 परसेंट पाना मुश्किल है। उन्होंने इसके लिए किसान क़र्ज़ माफ़ी, नोटबंदी और जीएसटी की दिक्कतों को दोषी ठहराया है। इसी के साथ उन्होंने सलाह दी कि जीएसटी के दायरे में शिक्षा, स्वस्थ्य, बिजली, रियल इस्टेट और शराब को भी लाया जाए। ज्वैलरी पर लगने वाले 3 फ़ीसदी जीएसटी को बढ़ाया जाए। यानी जनता के कल्याण का दावा करने वाली सरकार कभी भी शिक्षा व स्वस्थ्य जैसी मूलभूत सुविधा को महँगा करवा देगी।

आम आदमियों को राहत का कोई रास्ता मिलता नहीं दिख रहा है। अलबत्ता अमीरों के लिए सरकार नतमस्तक हुई जा रही है। इसी हफ़्ते वित्त मंत्रालय ने संसद में बताया कि पिछले पाँच वर्षों में 2 लाख 49 हज़ार 927 करोड़ रुपए का क़र्ज़ राइट ऑफ़ कर दिया गया। एनडीए सरकार के कार्यकाल में ही 1 लाख 88 हज़ार 287 करोड़ रुपए बट्टे-खाते में डाल दिए गए। इतनी बड़ी रक़म बट्टे-खाते में डाल दी गई बावजूद वित्त मंत्री अरुण जेटली दावा करते हैं कि मौजूदा एनडीए सरकार में किसी भी कंपनी का एक रुपया का क़र्ज राइट ऑफ़ नहीं किया गया है।

मोटी रक़म का क़र्ज लेकर डकारना आम आदमी के कुवत की बात तो नहीं है। उसके छोटे से लोन की अदायगी न होने पर उसकी बंधक रखी सम्पत्ति फ़ौरन नीलाम कर दी जाती है। सरकार और बैंक़ें ऐसी दरियादिली सिर्फ़ अमीरों के साथ ही दिखा सकती है।

जनता के पैसों की सुनियोजित लूट कब तक चलेगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं हैं। कम से कम ज़िम्मेदार नेताओं को सही जवाब देना चाहिए। अर्थ-व्यवस्था को मज़बूत बनाने जिस तरह से जनता पर बोझ डाला जा रहा है, वह जनता के बौखलाहट का कारण बन रहा है। अगर शिक्षा और स्वस्थ्य सेवाएँ भी जीएसटी की परिधि में ला दी गई तो समझो जनता का बँटाढार ही हो जाएगा। वैसे भी नोटबंदी और जीएसटी के बाद कारोबार, रोज़गार और लोगों की इंकम ग्रोथ पर ग्रहण लग गया है।