‘अरबी घोड़ों’ ने अपने राजा बाघ को चमगादड़ बनाया………

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ज़हीर अंसारी
पंचतंत्र की बहुतेरी कहानियाँ प्रकाशित हुई हैं। ख़ूब पढ़ी गईं और सराही भी गईं। सारगर्भित कहानियों का ज़िक्र हमेशा समय-समय पर होता रहता है। ऐसी ही एक अप्रकाशित कहानी की चर्चा आजकल बहुत हो रही है।

एक घना जंगल था। उस जंगल का राजा सफ़ेद हाथी था जिसको सभी प्यार से मिस्टर ‘बँटाढार’ पुकारते थे। कुछ सालों में जंगल की अवाम इसके कुशासन से त्रस्त हो गई। मौक़ा देख एक शेरनी सफ़ेद हाथी को हड़काने आई। शेरनी की दहाड़ से सफ़ेद हाथी सटक लिया। शेरनी पर सब मोहित हो गए और उसे अपनी महारानी चुन लिया, शेरनी ने कोई एक साल तक शासन किया। शेरनी में अहंकार बहुत था सो उसकी बिरादरी ने उसे चने के झाड़ पर चढ़ाकर दूर का बड़ा लड्डू दिखाया। जैसे ही शेरनी राजपाठ छोड़कर बड़े लड्डू की तरफ़ बढ़ी, पीछे से बिरादरी वालों ने काम तमाम कर दिया। इस बाद बानरों के गुरु जामवन्त को जंगल की राज गद्दी सौंपी गई। कुछ महीने बाद जामवन्त को भी जंगल के बाहरी विराट जीवों ने सत्ताच्युत करवा दिया। इसके बाद विराट जीवों के झुण्ड ने दबाव का दाँव खेला और एक मासूम बाघ को ढूँढ निकाला। तिगडम भिड़ाकर उस मासूम बाघ को राजा चुनवा दिया। बाघ बड़ा सीधा और सज्जन प्रवृति का था। बाघ ने समग्रता भाव के साथ अपना कामकाज शुरू किया। जंगल के सभी प्राणी उससे ख़ुश थे। जंगल में ख़ुशहाली का माहौल बनने लगा। इसी बीच बाघ राजा की ब्याहता बाघिन ने पेट पालने के लिए एकदम से दस-बारह मालवाहक ख़रीद डाले। मालवाहक इसलिए ख़रीदे गए कि राज्य की उपज को इधर से उधर ट्रान्स्पोर्ट किया जा सके। बिरादरी के ही एक सियाने बाघ ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर दी। कहा कि ग़रीब बाघ के पास इतनी दौलत कहाँ से आ गई कि बाघिन ने एकसाथ इतने सारे मालवाहक ख़रीद लिए। मामला मचा तो सफ़ेद हाथी परिवार के एक सदस्य ने बाघ-बाघिन दोनों को बचा लिया। बाघ-बाघिन इस आरोप से तो बच निकले। अब चूँकि इन्हें अपना और अपनी बिरादरी के ‘सुपर बॉस’ का पेट भरना था तो इन्होंने नए-नए तरीक़े निकालकर राज्य की उपज बटोरना शुरू कर दी। उनके इस काम में ‘अरबी घोड़ों’ ने काफ़ी मदद की। ‘अरबी घोड़ों’ के ज़िम्मे ही राज्य की प्रशासनिक बागडोर थी।

‘अरबी घोड़े’ इतने चतुर होते हैं कि अपने ऊपर बैठने वाले सवार के चढ़ने के तरीक़े से ही समझ लेते हैं कि सवार हमें दौड़ाएगा या हमें सवार को दौड़ाना पड़ेगा। ये बात समझ आते ही ‘अरबी घोड़ों’ ने राजा रूपी सवार को दौड़ाना शुरू कर दिया। राज्य के इतने चक्कर लगवा दिए जिसकी कोई गिनती नहीं की जा सकती है। होशियार ‘अरबी घोड़ों’ ने राजा की कई तरह की यात्राएँ भी निकलवा दीं। राजा भी गदगद हो हर छोटी-बड़ी जगहों पर सच्ची-झूठी घोषणाएँ करके ख़ूब वाहवाही लूटी। राजा की जिह्वा हमेशा शहद से सनी रहती थी सो अवाम को मिठास का लुफ्त मुफ़्त मिलता रहा। राजा को इसमें मज़ा आने लगा। अपनी बिरादरी के छोटे बाघों और राज्य की प्रजा पर ध्यान देना बंद कर दिया। इसी दौरान ‘बर्बर शेर’ से मुक़ाबला करने की सनक भी राजा को सवार हो गई। ‘बर्बर शेर’ की नक़ल में राजा ने अपने राज्य में भी कई योजनाएँ शुरू करवा दी, जिसका कोई औचित्य नहीं था।

राजा का रसूख़ बढ़ता गया, उनके नाम का डंका भी बजने लगा जिससे बाघ राजा को गुमान हो गया। छत्रप बनने की चाह में राजा ने एक के बाद अपनी बिरादरी के छोटे-बड़े बाघों को ठिकाने लगा दिया ताकि कोई उनके लिए चुनौती न बने। उम्र ढलने के साथ राजा की पकड़ शिथिल पड़ने लगी। राज्य की अवाम राजा के कुशासन के विरोध में खड़ी होने लगी। अवाम का छोटा मोटा काम ‘नक़द नारायण’ के बिना होना सम्भव नहीं रहा। इस पर राजा को ग़ुस्सा आने लगा।

एक दिन राजा ने अपनी बिरादरी के लोगों के बीच अपनी नाकामी का ढींगरा ‘अरबी घोड़ों’ पर फोड़ते हुए एलान कर दिया कि अवाम का काम नियत समय पर न हुआ तो ‘चमगादड़’ बना दूँगा। राजा की यह धमकी ‘अरबी घोड़ों’ को बहुत बुरी लगी। इन सबने अपनी बात राजा के पास पहुँचाई कि यदि ‘अरबी घोड़ों’ ने उचकना शुरू कर दिया या ‘लीद’ करना शुरू कर दिया तो उसकी बदबू से पूरा राज्य गंधा जाएगा। ‘अरबी घोड़ों’ की तैनाती के लिए कौन कितना चढ़ावा ले रहा है अगर यह ओपन कर दिया गया तो समझो बादशाहत गई। अरबी घोड़ों की इस चेतावनी से राजा ‘सकते’ में आ गया और फ़ौरन अपनी दहाड़ वापस ले ली। इस तरह ‘अरबी घोड़ों’ ने जंगल के राजा बाघ को चमगादड़ बना दिया।