क्या शिवराज सरकार नरोत्तम मिश्रा के बिना नहीं चल सकेगी ?

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ज़हीर अंसारी
सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान के कबीना मंत्री नरोत्तम मिश्रा इतनी हाय तौबा क्यों कर रहे हैं, यह बात पार्टीजनों की समझ में नहीं आ रही है। क्या प्रदेश सरकार उनके बिना पंगु हो जाएगी या फिर उनके वोट के बिना राष्ट्रपति नहीं चुना जाएगा। ऐसी क्या आफ़त आ गई कि वे फटाफट एक के बाद एक पिटिशन दायर कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने पहली बार प्रदेश के किसी जनप्रतिनिधि के ख़िलाफ़ सटीक और स्पष्ट फ़ैसला दिया है। इसके पहले तक तो चुनाव आयोग को बिना दाँत का सर्प समझा जाता रहा है। अब जब आयोग ने अपने दाँत होने की प्रामाणिकता सिद्ध की तो इतनी हड़बड़ाहट नरोत्तम जी क्यों मचा रहे हैं। श्री मिश्रा की न्यायिक लड़ाई पहले एमपी हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ पहुँचीं। वहाँ से जबलपुर मुख्यपीठ आई। यहाँ से सर्वोच्च न्यायालय पहुँची फिर वहाँ से दिल्ली हाईकोर्ट इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट की डबल बैंच, फिर उनकी अयोग्यता योग्यता में नहीं बदली। इतवार के दिन दिल्ली हाईकोर्ट की डबल बैंच ने उनकी पिटिशन पर सुनवाई की। उभय पक्षों को सुनने के बाद पिटिशन ख़ारिज कर दी। स्वाभाविक है कि श्री मिश्रा पुनः सुप्रीम कोर्ट जाएँगे।

आख़िरकार श्री मिश्रा को इतना उतावलापन क्यों? यह सवाल जनता नहीं बल्कि उनके पार्टी के लोग ही कर रहे हैं। ईमानदारी का तगमा चिपकाए श्री मिश्रा के पास इतनी दौलत कहाँ से आ गई कि देश के महँगे से महँगा वक़ील केस की पैरवी के लिए नियुक्त कर रहे हैं। उनकी ही पार्टी के लोग तीन सवाल उठा रहे हैं कि क्या उनके वोट के बिना राष्ट्रपति नहीं चुना जाएगा या उनकी ग़ैरमौजूदगी में शिवराज सिंह चौहान सरकार नहीं चला पाएँगे। क्या श्री मिश्रा को फाँसी की सज़ा मिली है जो रविवार अवकाश के दिन हाईकोर्ट में बहस करवाई?

शिवराज सरकार के बेशक वो संकट मोचक रहे हों पर इसका मतलब यह तो नहीं वो पूरी पार्टी और राज्य की इज़्ज़त का मखौल बना दें। चुनाव आयोग ने वही किया जो उसे क़ानून सम्मत लगा। फिर आयोग के फ़ैसले पर दनादन पिटिशंस क्यों? बड़े-बड़े वक़ीलों की फ़ीस देने मोटी रक़म कहाँ से आ रही है? आम आदमी के प्रकरण तो वर्षों से न्यायालयों में लम्बित है फिर नरोत्तम मिश्रा की पिटिशंस पर फटाफट सुनवाई क्यों हो रही है? जैसे सवाल अब आम आदमी की ज़ुबान से निकल रहे हैं।

एक और सवाल उठाया जा रहा है कि नरोत्तम मिश्रा स्वयं को क्या सरकार समझ रहे हैं? शायद यह उनकी ग़लतफ़हमी है। राघव जी, कैलाश विजयवर्गीय, प्रभात झा, कमल पटेल, बाबूलाल ग़ौर, सरताज सिंह, अजय विश्नोई, लक्ष्मीकान्त शर्मा और अरविंद मेनन जैसे जाबांज़ नहीं रहे तो क्या सरकार अपंग हो गई? नहीं, सरकार अब भी चल रही है। शिवराज सिंह चौहान ऐसे मंझे हुए राजनैतिक खिलाड़ी हैं कि कुछ करते नहीं मगर सब कुछ उनके हिसाब से ‘सेट’ हो जाता है। सीएम शिप या सिनियारिटि के दावेदार ख़ुद ब ख़ुद ठिकाने लग जाते हैं। पहले निपटे नेताओं की तरह वो नरोत्तम मिश्रा पर भी वो ख़ामोश हैं। शिवराज की यही ख़ामोश कई नज़रिए से ख़ास मानी जा रही है।

बहरहाल अब शिवराज सिंह को अपना मौन तोड़ना चाहिए। जनता को विश्वास दिलाने के लिए फ़ौरन नरोत्तम मिश्रा से इस्तीफ़ा माँग लेना चाहिए। इस्तीफ़ा न देने की दशा में राज्यपाल से श्री मिश्रा को बर्खास्त करने की सिफ़ारिश करना चाहिए। शिवराज सिंह का यह क़दम उन करोड़ों प्रदेशवासियों को नैतिकता का संदेश देगी जो शिवराज सिंह पर अब भी विश्वास करते हैं।