अजगर लड़ते नहीं…

0
55

काशीनाथ

अन्य पिछड़ा वर्ग यानि ओबीसी। बकौल डॉ.लोहिया अजगर। मतलब अ से अहीर,ज से जाट, ग से गुर्जर,र से राजपूत (पटैल,लोधी,किरार) या रेस्ट जिसमें तमाम बाकी बची जातियां। हिन्दुस्तान में पिछड़ा वर्ग की जातियों का ढंाचा कुछ ऐसा ही बताया जाता है। हिन्दुस्तान में जात की राजनीति की मुखालफत और अध्ययन जितना समाजवादी चिंतक डॉ.राममनोहर लोहिया ने किया उतना शायद ही किसी दूसरे ने किया हो। अपने पूरे जीवन में लोहिया इसके खिलाफ रहे। वे मुद्दों की राजनीति,विचारों की लड़ाई के लिए समर्पित रहे। वे इस देश में धर्म और जाति को राजनीति से दूर रखने के वकील रहे। यह अलग बात है कि उनके सारे पठ्ठे आज इसी आधार पर अपनी राजनीति को धार दिए हुए हैं। सत्ता की दौड़ में विचार,सिद्धांत और नसीहत पीछे छूट जाती हैं। सो अब भी हुआ। ताजा मामला कांग्रेस का है। पार्टी ने मिशन 2018 और 2019 की तैयारी के लिए देश के ओबीसी नेताओं को बुलाया। गुरूद्वारा रकाबगंज रोड स्थित उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बंगले यानि कांग्रेस वार रूम में बैठक रखी। मध्यप्रदेश के भी ओबीसी नेता बुलाए गए। जब सब जमा हो गए तो बंगले में घुसने और बैठने की एक अदद कर्सी के लिए धक्का मुक्की भी हुई। विदिशा क्षेत्र के एक नेता ओर प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री जगदीश यादव की एन्ट्री में कुछ दिक्कत आई। खैर जैसे तैसे एन्ट्री और जगह मिल गई। तवा गरम हो चुका था। उपाध्यक्ष राहुल गांधी आए। उन्होंने ऐजेण्डा बताया कि पार्टी ओबीसी को जोडऩा चाहती है। इस वर्ग को अपने साथ लेकर अगला मिशन फतह करना चाहती है। इस मन्तव्य का खुलासा होते ही पटैलों के नेता राजकुमार पटैल ने राजनीतिक पंडित और मोटीवेटर की स्टाइल में बोलना शुरू किया। ऊंची कद-काठी,गोरारंग न जवान न बूढ़े,गर्वीली आवाज वाले पटैल साहब ने एक वाक्य ही पूरा किया था। उन्हीं के संसदीय क्षेत्र विदिशा के जगदीश यादव फट पड़े। जैसे उनके गरम तवे पर पानी के छींटे पड़ गए हों। पटैल पर लांछन और सवालों की झड़ी लगा दी। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजकुमार पटैल के चुनाव की तमाम दबी बातें उजागर कर दी। उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता,व्यक्तिगत छवि, क्षेत्र की धारणा और उनकी पकड़ को तार-तार खोल दिया। पटैल भी यादव पर जमकर बरसे। मामला महासचिव दिग्विजय सिंह के कार्यकलाप तक पहुंचा। सवाल इतने खड़े हो गए कि असल मकसद पीछे सरकने लगा। राहुल गांधी ने दखल दिया। जगदीश यादव से सारी बातों का प्रमाण और लिखित शिकायत मांग ली। अलग से मिलने का समय भी दिया। वहीं राजकुमार अपनी सफाई पेश करते रहे। यादव को गलत ठहराते रहे। पटैल सही या यादव। यह तो सभी के लिए जांच और बहस का विषय हो सकता है। आम बात ये है कि राजनीति हो या सामाजिक जीवन विश्वसनीयता और साख एक बार बिखर जाए,फिर संभलती नहीं है। बर्तन तो है नहीं धो-पोंछकर वापस चमका लो। एक बार गई सो गई। कांग्रेस में इतना लोकतंत्र तो है ही कि आप हाईकमान के सामने भी खुलकर बात रख सकते हैं। पार्टी पहल तो ठीक दिशा में कर रही है। प्रदेश अध्यक्ष भी इसी वर्ग से हैं। अपने लम्बे कार्यकाल में वे ओबीसी को आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा भी कह सकते हैं,उनकी नजर में एक वर्ग ही ओबीसी है। उस पर भी उनका प्रभाव कम ही दिखता है। ये कह सकते हैं कि बाकी को आगे लाने में उनकी रूचि कम है। पटैल और यादव के इस झगड़े क बाद कुछ देर तक शांति रही। बैठक फिर शुरु हुई। दूसरे नेता जो डींग हांकने का प्लान बना रहे थे। वे भी सतर्क हो गए। उन्हें लगा कि कहीं ऊंच नीच हो गया तो कोई फजीहत न कर दे। इस झगड़े ने एक बात और जाहिर कर दी कि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के भीतर बहुत कुछ उबल रहा है। पटैल और यादव को अपना झगड़ा खत्म करके पार्टी के लिए जुटना चाहिए। चलते चलते ध्यान रहे अजगर लड़ते नहीं लील जाते हैं।