सीमा ही नहीं, इकॉनमी से लेकर बेडरूम तक है चीन की घुसपैठ!

0
42

मुंबई = सिक्किम में भारत और चीन के विवाद के बीच पूरे देश में चीन के खिलाफ काफी नाराजगी है। ऐसे में कुछ संगठन चीनी सामान का बहिष्कार कर अपना विरोध जता रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि चीनी सामान का बहिष्कार कहां तक संभव है, जब वह न सिर्फ आपके देश, अर्थव्यवस्था, व्यापार, बाजार और यहां तक कि आपके बेडरूम में भी घुस आया हो।
इकोनॉमिक टाइम्स में उनकी संवाददाता मालिनी गोयल की खबर के मुताबिक जिस समय सोलर एनर्जी फैशन में नहीं थी, बल्कि कुछ लोगों के लिए सपने जैसा था, उस समय कोलकाता के ज्ञानेश चौधरी ने इस बारे में सोचा था। 2006 में विक्रम सोलर की शुरुआत हुई, आज विक्रम सोलर देश के टॉप-10 सोलर मॉड्यूल्स मैन्युफैक्चरर्स में से एक है। पश्चिम बंगाल के स्पेशल इकनॉमिक जोन में स्थित विक्रम सोलर भारत में रिन्यूएबल एनर्जी की शुरुआत करने वालों में से एक है। आज इस संस्था के पास सोलर मॉड्यूल कैपेसिटी 1 गीगावॉट और 2000 कर्मचारियों का समूह है।
लेकिन, यहां एक विरोधाभास भी है। जहां भारत सोलर एनर्जी के लिए माहौल बना रहा है (भारत का टारगेट 2022 तक 100 GW सोलर एनर्जी का है), वहीं विक्रम सोलर काफी परेशानी में है। पिछली तिमाही में कुल प्रॉडक्शन का चौथा हिस्सा निर्यात करने के बावजूद विक्रम सोलर के टारगेट में आधे की कमी आई है। ज्ञानेश बताते हैं कि हमारा मुकाबला पेइचिंग फैक्टर से है। भारत में सौर ऊर्जा के लिए इस्तेमाल होने वाले पुर्जों की 80 प्रतिशत सप्लाई पर चीन का कब्जा है। विक्रम सोलर के प्रॉडक्ट चीनी प्रॉडक्ट के मुकाबले 8-10 प्रतिशत महंगे हैं।
चौधरी ने कहा, ‘चीन इस व्यापार के ज्यादातर हिस्से पर कब्जा करना चाहता है।’ चीन के इस कदम के खिलाफ यूरोप और यूएस पर्याप्त कदम उठा रहे हैं। वहीं हमने भारतीय बाजार में आने की खुली छूट दे दी है। सरकार को भारतीय फर्मों को ध्यान रखते हुए इस तरह के फैसले लेने चाहिए।’
ऐसा ही एक और उदाहरण है। कोलकाता से लगभग 1400 किमी दूर देश की राजधानी दिल्ली में रहने वाले रामकुमार यादव भारत के बाजार पर चीन के कब्जे का एक और उदाहरण दे रहे हैं। राम कुमार यादव दिल्ली की फेडरेशन ऑफ सदर बाजार ट्रेडर्स असोसिएशन के प्रेजिडेंट हैं। यह संगठन दिल्ली की अन्य 83 असोसिएशनों का प्रमुख है। इस संगठन से जुड़े होल सेल ट्रेडर्स की संख्या लगभग 35 हजार है। कुल 3 हजार करोड़ सालाना के टर्नओवर वाले ट्रेडर्स के कर्मचारियों की संख्या 1 लाख (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष) के आसपास है।
करीब एक दशक पहले तक ये लोग खिलौने, बाल्टी और मूर्ति जैसी दूसरी चीजों के लिए लोकल मैन्युफैक्चरर्स पर निर्भर थे। यादव ऐसे कई टॉय मैन्युफैक्चरर्स को जानते हैं जिनके 500 से ज्यादा कर्मचारी और सप्लायर्स हैं। यादव ने बताया, ‘उन सभी ने अपना काम बंद कर दिया है और चीन से माल मंगाना शुरू कर दिया है। चीन के सस्ते और अच्छे सामान ने स्थानीय इंडस्ट्री को बंद होने पर मजबूर कर दिया।’
बॉर्डर पर भले ही भारत और चीन के बीच तनातनी की खबरें आती हों, लेकिन लोकल मार्केट में अब चीन का सामान अपनी बड़ी जगह बना चुका है। हालांकि कुछ संगठन चीनी सामान के बहिष्कार की बात कहते हैं। आरएसएस और इसके अनुषांगिक संगठन स्वदेशी जागरण मंच चीनी सामन का पुरजोर तरीके से बॉयकॉट करते रहे हैं। लेकिन स्थिति उतनी आसान नहीं है, जितनी दिखती है। चीन का सामान न सिर्फ आपके देश, अर्थव्यवस्था, व्यापार बाजार और यहां तक किलोगो के बेडरूम में घुस आया है। क्रिसिल के प्रमुख अर्थशास्त्री डीके जोशी ने बताया कि भले ही दोनों देशों में राजनीतिक मतभेद हों, लेकिन इससे द्विपक्षीय व्यापार पर कभी कोई खास असर नहीं पड़ा है।
चीन भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है। दोनों की 71.5 बिलियन डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार है, लेकिन इसका ज्यादातर हिस्सा चीन के समर्थन में है। भारत चीन से 61.3 बिलियन डॉलर का इम्पोर्ट करता है, जबकि एक्सपोर्ट महज 10.2 बिलियन डॉलर है। भारत को अपने व्यापार में गुणात्मक संतुलन बनाने की जरूरत है। चीनी सामान का भारत में प्रभुत्व मोबाइल फोन, प्लास्टिक, इलेक्ट्रिकल आइटम, मशीनरी और उससे जुड़े पुर्जों में है। इसके विपरीत भारत चीन को अयस्क, कपास और खनिज ईंधन एक्सपोर्ट करता है।
चीन से इंपोर्ट
1962 के युद्ध के बाद खुद को सशक्त बनाने के लिए न सिर्फ सैन्य तौर पर मजबूत किया, बल्कि आर्थिक, राजनीतिक और राजनयिक स्तर पर भी काफी मजबूत किया है। पिछले कई साल में चीन ने ऐसा करने के लिए कई बड़े कदम उठाए। ज्यादातर सेक्टर में इसने कई बड़ी एमएनसी शुरू की, जैसे अलीबाबा (ऐमजॉन को चीन का जवाब), बायदू (चीन का गूगल), वी चैट (चीन का फेसबुक) और शाओमी (चीन का ऐपल)। चीन ने दुनिया के बड़े प्रॉडक्ट की लगभग कॉपी कर ये प्रॉडक्ट बनाए और उन्हें बेहद सस्ते दामों में मार्केट में उतारा और दुनिया भर की कंपनियों को चुनौती दे दी।
चीनी कंपनियां भारत के टेलिकॉम सेक्टर में बेहद अंदर तक पकड़ रखती हैं। मोबाइल हेंडसेट में, भारत के 8 बिलियन डॉलर के स्मार्टफोन बाजार में 51 प्रतिशत हिस्सा शाओमी, ओप्पो, वीवो और वन प्लस जैसी चीनी कंपनियों का है। कुछ ऐसा ही मामला टेलिकॉम सेक्टर के इक्विपमेंट मार्केट का भी है। टेलिकॉम इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन एन के गोयल ने बताया, ‘भारत ने बगैर किसी टेस्ट, ड्यूटी या स्थानीय मार्केट के प्रॉटेक्शन के टेलिकॉम इक्विपमेंट इम्पोर्ट को इजाजत दे दी।’ साल 2010 में 3G नीलामी के समय भारत सरकार नींद से उठी और ऐंटी डंपिंग ड्यूटी लगाई। 2012 में एक और नियम बनाया और सरकारी विभागों के ऑर्डर का 30 प्रतिशत हिस्सा स्थानीय मार्केट के लिए रिजर्व कर दिया गया।
इसी तरह पावर सेक्टर में भी अकेले 12 वीं योजना में, उत्पादन क्षमता का लगभग 30% चीन से आयात किया गया था। इसी तरह अप्रैल 2016 से जनवरी 2017 तक चीन से हुए 87 पर्सेंट सोलर इक्विपमेंट इंपोर्ट हुए, जिसकी बाजार कीमत 1.9 बिलियन डॉलर है।