आरबीआई क्यों नहीं बता रही नोट वापसी का टोटल……..

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ज़हीर अंसारी
8 नवम्बर 2016 की वो रात आज भी लोगों को याद है। इसी रात लोगों की नक़दी पर जलजले का प्रकोप हुआ था। लोग आज भी उस रात में कड़की बिजली से सहम जाते हैं। 50 दिनों तक तो लोगों के होशोंहवाश ठिकाने पर नहीं थे, उनके दिमाग़ में तरह-तरह की घंटियों की आवाज़ें घनघनाती रही। जैसे-तैसे लोगों अपने हज़ार-पाँच सौ के बंद हुए नोटों को ठिकाने लगाया। नोट ठिकाने लगने के बाद लोगों ने चैन की सांसे ली। कुछ दिनों बाद जैसे ही उनका ‘रूपैया’ हरे-गुलाबी रंग में बदला वैसे ही उनकी साँसों की चाल 72 पल्स प्रति मिनिट के हिसाब से चलने लगी। लोगों की सांसें तो सामान्य हो गई पर रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया की धड़कने तेज़ हो गईं। आज भी आरबीआई सांसें उस धावक की तरह फूल रही है जो अभी-अभी 25-30 किलोमीटर दौड़ के आया है। आठ महीनों में आरबीआई यह नहीं बता पा रहा है कि आख़िर कितना रुपया उसके स्ट्रांग रूम में लौटकर आया।

नोटबंदी बुखार से पीड़ित लोग अब आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल से सवाल पूछ रहे हैं कि आठवें माह के बाद डाक्टर भी यह बता देता है कि नवजात का जन्म कब होगा लेकिन उर्जित जी आप आठ महीने में वापस आए नोटों की संख्या नहीं बता पा रहे हैं। पर्दे के पीछे का राज क्यों नहीं खोल रहे हैं। आठ महीने बाद भी कहा जा रहा है कि गिनती ‘चालू आहे’।

बैंकों का एक सिस्टम है। कोई भी ब्रांच दिन का काम ख़त्म करने के बाद तब तक बंद नहीं हो सकती जब तक उसकी नक़दी का मिलान न हो जाए। नक़दी मिलान के बाद दो या तीन अफ़सरों की मौजूदगी में नक़दी स्ट्रांग रूम में रखी और निकली जाती है। जब बैंकों ने आरबीआई को पुराने नोट भेजे होंगे और नई करेंसी वापस ली होगी तो क्या बिना गिनती के ही लेन-देन कर लिया गया ? ऐसा कम से कम बैंकिंग में मुमकिन नहीं है। देश भर की बैंकों से जो पुराने नोट आरबीआई के पास पहुँचें होंगे उसके साथ नोटों की तफ़सील के साथ मेमो पर टोटल भी लिखा गया होगा। इन सारे फ़िगर को चंद दिनों में ही जोड़ लिया गया होगा। इस टोटल को अब तक पर्दे की ओढ़ में क्यों छिपा रखा है यह कई तरह के सवाल खड़ा कर रहा है। जनता भी इस सवाल का जवाब चाहती है और विपक्षी भी। विपक्षी तो इस मुद्दे को लेकर सोमवार से शुरू हो रहे सत्र में हल्ला-गुल्ला करने का मन बना लिया है।

आरबी आई की चुप्पी के पीछे कहीं असली-नक़ली नोटों का चक्कर तो नहीं है। नोटबंदी के पहले अनुमान था कि लगभग पंद्रह लाख करोड़ रुपए चलन में हैं, इनमें से चार-पाँच लाख करोड़ रुपए ब्लैक और फ़ेक करेंसी है और यह रक़म वापस नहीं आएगी मगर हुआ इसका उलट। फ़ेक और ब्लैक मनी सबकी सब बैंकों की कृपा से ‘वाइट’ हो गई। अब आरबीआई के पास मुँह छिपाने के अलावा कोई चारा नहीं है।

ऐसा प्रतीत होता है कि नोटबंदी पर आरबीआई की वही स्थिति हो गई है जैसे साँप की मुंडी नेवले के हाथ में जकड़ गई हो। नेवले की आदत होती है कि साँप को मारकर काफ़ी देर तक साँप की मुंडी को ज़मीन में रगड़ता है फिर देखता है, फिर रगड़ता है, फिर देखता है। इसी तरह के हालात नोटों की गिनती को लेकर बन गए हैं। अरे भाई नोटों की गिनती जब पूरी होगी तब पूरी होगी, बैंकों से प्राप्त टोटल का ‘टोटल’ तो देश के सामने रख कर दो।