लाल बत्ती क्या उत्तरी.. जैसे सब कुछ लुट गया…….

0
94

जहीर अंसारी

नेता जी को रात में बड़ी बेचैनी हो रही थी। मख़मली गद्दे पर भी उन्हें नींद नहीं आ रही थी। कभी इस करवट तो कभी उस करवट। कभी ऊपर लगे झूमर को निहारते तो कभी दोनों ओर लगे एसी को। नींद थी कि आने का नाम नहीं ले रही थी। सागौन लकड़ी से बनी ख़ूबसूरत आलमरी के ऊपर ‘लाल बत्ती’ रखी थी, बार-बार उस ओर नेता जी का ध्यान जा रहा था। असल में नेता जी को पीएम की सभा में जाना था। भीड़ भी ले जानी थी। भीड़ का इंतज़ाम तो उन्होंने बसों और मिनी बसों में मय खान-पान के करवा दिया, अब कुछ चमचों के साथ उन्हें भी जाना है। अभी तक तो ‘लाल बत्ती’ की आड़ में बेधड़क कहीं भी एंट्री मिल जाती थी। अब क्या करें ‘लाल बत्ती’ तो छीन ली गई।
आलमारी के ऊपर धरी धूल धूसरित ‘लाल बत्ती’ नेता जी की बेबसी पर मुस्कुरा रही थी। बोली नेता जी मैं आपकी पीड़ा को समझ सकती हूँ। आप यही सोच रहे न कि पीएम की सभा में जाना है। लाखों की भीड़ होगी, हज़ारों की तादाद में वाहन होंगे, ऐसे में मेरे बिना आपको ‘वज़न’ कौन देगा। कौन आपको ‘वीआईपी’ समझेगा। सभा स्थल तक आपका वाहन न जा पाएगा। सभा पीएम की है तो सुरक्षा कर्मी भी आपको पहचानने से इंकार कर देंगे। मेरी ग़ैरमौजूदगी में आप अपनी तीखी ज़ुबान से रौब भी न झाड़ पाएँगे। वैसे भी सभा आपके क्षेत्र से बहुत दूर हो रही तो अफ़सर भी आपको नज़रंदाज कर देंगे। सुरक्षा बल तो ‘सब धान एक पसेरी’ तौल देंगे। ज़्यादा चीं-चपट की तो मामला गड़बड़ा भी सकता है। चमचों के सामने ‘उतारा’ हुआ तो पूरे इलाक़े में इसकी गंध फैल जाएगी या फैला दी जाएगी। पर करिएगा क्या नेता जी, आपको तो जाना ही पड़ेगा। नहीं गए तो अगली बार ‘पत्ता’ साफ़ समझो।
नेता जी, ठीक ही हुआ जो ‘साहब’ ने आप लोगों की ‘बत्ती’ गुल कर दी। हमारी आड़ में काफ़ी ‘अत्त’ किए हैं आप लोगों ने। ग़रीबों को डराया, प्रशासन को धमकाया, पुलिस वालों को चमकाया। अब वक़्त आ गए है शराफ़त से चलने का। बिना बत्ती कोई रसूख़ तो मिलेगा नहीं इसलिए एक सभ्य पुरुष की तरह चले जाइये। हाँ ड्राइवर को भी ताक़ीद कर दीजिएगा कि पुलिस वालों के सामने चपर-चपर न करे, नहीं तो वो ठोक देंगे फिर बाद में कह देंगे कि हम ने चिन्हा नहीं।
‘लाल बत्ती’ के कटाक्ष सुनकर नेता जी आग बबूला हो गए। चित्त पड़े-पड़े सोचने लगे कि ‘साहब’ भी अजीब टाईप का निर्णय कर लेते हैं वो भी बिना रायशुमारी के। पीएम, सीएम व बड़े मंत्रियों के साथ तो बड़ा झनका-मनका रहता है। इन्हें तो उड़न-खटोले की सुविधा भी प्राप्त है। हम पाँच-छः सौ किलोमीटर दूर से जाएँ, और सभा में घुसने न मिले तो जाना अकारत रहेगा। दूसरे साथ चलने वाले चमचे क्या सोचेंगे कि ‘बत्ती’ के बिना साहब की कोई ‘औक़ात’ नहीं।
नेता जी के मस्तिष्क में ‘लाल बत्ती’ का प्रकाश इतने गहरे से घुसा था कि वो चाह कर भी इसे विस्मृत नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने करवट बदला और गहरी साँस लेते हुए ‘लाल बत्ती’ को निहारा। फिर संकल्प लिया कि अब तेरे बिन ही जाऊँगा।
सुबह जल्दी उठने की सोच के साथ नेता जी कब गहरी नींद में समा गए उन्हें पता ही नहीं चला। जब आँख खुली तो टीवी पर पीएम-सीएम की लाईव कव्हरेज चल रही थी। ओह माई गॉड, टिकिट तो गई…

= ज़हीर अंसारी की फेसबुक वाल से साभार