एक मौलाना : दो चेहरे

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रवींद्र बाजपेयी
जबलपुर के एक मौलाना साहब है जिन्होंने उन मुस्लिमों को इस्लाम से बाहर करते हुए उनके मरने पर नमाज़ ए ज़नाज़ा और कब्रिस्तान में दफनाए जाने पर रोक लगा दी जो मप्र सरकार द्वारा आयोजित नर्मदा सेवा यात्रा से जुड़े। उन सबका कसूर नर्मदा मैया की जय बोलने के साथ ही नर्मदा कलश सर पर रखना है।
किसी मुस्लिम की शिकायत पर उक्त मौलाना ने फतवा जारी किया।जिन लोगों ने माफी मांग ली उन्हें बख्श दिया गया।
मौलाना इस्लाम के जानकार हैं। हर ईद पर वे भाईचारे और इंसानियत का पैगाम ईदगाह में तकरीर के जरिये देते हैं।
बाहर हिन्दू नेता और अधिकारी उनसे गले मिलकर मुबारकबाद देने खड़े रहते हैं लेकिन मौलाना को किसी अन्य धार्मिक त्यौहार पर बधाई देते शायद ही देखा गया हो।
उल्लेखनीय है जबलपुर में मुहर्रम की सवारियां रखने वालों में हिन्दू काफी होते हैं। वे मूर्ति पूजक भी हैं लेकिन मौलाना ने कभी उन्हें नहीं रोका।
अब मेरे जैसे हिन्दू को सोचना पड़ गया कि मैं मज़ार के सामने निकलते समय सम्मान व्यक्त करूँ या नहीं? अजमेर की दरगाह पर हो आने के लिए किसी हिन्दू धर्मगुरु के सामने जाकर पश्चाताप करूँ और भूलकर भी किसी मुस्लिम मित्र के धार्मिक आयोजन में शामिल न होऊँ।
सवाल और भी हैं।मौलाना चूँकि मुसलमानों के लिए पूज्य हैं इसलिए उनके विरुद्ध कोई नेता नहीं बोल पा रहा क्योंकि मुस्लिम मतों का प्रश्न है।
पता नहीं मौलाना के फतवे का दूरगामी असर क्या होगा लेकिन इससे वे मुस्लिम भाई जरूर असमंजस में पड़ गए जिनका दिन भर हिंदुओं के संग उठना बैठना है।सेकुलर, सहिष्णु और प्रगतिशील तबके की प्रतिक्रिया का इंतज़ार है।

= रवींद्र बाजपेयी जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार और सांध्य दैनिक हिंदी एक्सप्रेस के संपादक है अपनी बेबाक लेखनी के लिए भी जाने जाते है ये आलेख उनकी फेसबुक वाल से साभार लिया गया है