बाल नर्मदा की मार्मिक गुहार…. तबाही से बचा लें…….

0
72

जहीर अंसारी
कितनी ख़ुशी की बात है, मेरे घर-आँगन लाखों श्रद्धालु और भक्त आ रहे हैं। मैं तो ख़ुशी से पागल हो रही हूँ कि मेरी देहरी पर देश के प्रधान मंत्री और उनके ढेरों सहयोगी आ रहे हैं। प्रधान मंत्री श्री मोदी मेरे बाल रूप को देखेंगे, मुझे नमन करेंगे, और तो और मेरे जीवन को अक्षुण्य बनाने विस्तृत कार्ययोजना का लोकार्पण करेंगे। प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने काफ़ी क़वायद तथा महीनों मेरी परिक्रमा के बाद ये कार्ययोजना बनाई है। इसमें विशेषज्ञों के दिमाग़ का भी इस्तेमाल किया गया गया। पूरा शासन-प्रशासन 15 मई को प्रधान सेवक के आगमन की तैयारियों में लगा हुआ है। मेरी भी साज-सज्जा की जा रही है। मैं तो यह सब देख कर बावली हुई जा रही हूँ। आज तक किसी काल में ऐसा उत्सव नहीं मनाया गया। वह दिन कितनी उत्सवी और मनोरम होगा जब प्रधान सेवक मेरी स्तुतिगान करेंगे और लाखों भक्त-श्रद्धालु मेरे प्राण रक्षा का संकल्प लेंगे।

आह… पर इन सब की आगवानी कैसे करूँगी। लाखों की भीड़ को कहाँ बिठा लूँगी, कहाँ ठहराऊँगी। मेरा घर आँगन तो बहुत छोटा है, इसमें इतने ढेर सारे लोग कैसे समाएँगे। मैं तो यह सोच कर घबराई जा रही हूँ। मेरी बुद्धि काम नहीं कर रही है, क्या करूँ, क्या न करूँ। मैं तो अभी उम्र बहुत छोटी हूँ। यदि खम्बात की खड़ी के पहले यह आयोजन होता तो मैं सारा इंतज़ाम ख़ुद ही कर लेती क्योंकि वहाँ पहुँचते-पहुँचते मैं सियानी हो जाती हूँ। उम्र, अनुभव और खुली ज़मीन की बिना पर मैं सब व्यवस्थित ढंग से कर लेती।

मेरे सामने विकट समस्या आन पड़ी है। प्रधान सेवक और प्रदेश के मुख्य सेवक तो हेलीकाप्टर पहुँच जाएँगे। इन दोनों की सुरक्षा में तैनात अफ़सर, सुरक्षा कर्मी, प्रशासनिक अधिकारी-कर्मचारियों को कहाँ ठहराऊँगी। जो डेढ़-दो लाख श्रद्धालु आएँगे उन्हें कहाँ रुकवाऊँगी। सुना है हज़ारों बसें, कारें और दीगर वाहनों में सवार होकर सब लोग आएँगे। कई सौ टन अनाज, तेल, सब्ज़ियाँ और गैस सिलेण्डर ट्रकों में भर-भर के आएँगे। हज़ारों वाहनों की पार्किंग मैं कैसे, कहाँ करवाऊँगी, कुछ सूझ नहीं रहा है। मेरा तो पूरा गाँव मैकल की सुंदर पहाड़ियों से घिरा है। वन संरक्षित और प्रतिध्वनि रहित क्षेत्र भी घोषित है। जंगल कटवाकर या छोटे-मोटे पेड़-पौधों को रौंदवाकर वाहनों को खड़ी करवाऊँ क्या? लाखों लोगों के शौच और स्नान के लिए इतने टायलेट्स भी नहीं है। जो आ रहे हैं निश्चित ही शौच और स्नान करेंगे। इसका मतलब तो यही होगा सब ‘खुले में शौच’ करेंगे और मेरी धारा में स्नान करेंगे, मेरे जल को दूषित करेंगे। यहीं पर तो मेरा जल अदूषित है, ये भी दूषित हो जाएगा। यानी जल, जंगल और ज़मीन सब तहस-नहस।

वो तो मुझे स्वच्छ व सुरक्षित रखने का ढिंढोरा पीट रहे हैं। लाखों की भीड़ लेकर मेरी बर्बादी के लिए आ रहे हैं। उन्हें इतनी समझ तो होनी चाहिए कि मेरे उद्गम स्थल का मार्ग अत्याधिक संकरा है। चारों तरफ़ घना जंगल है। बड़े-बड़े मैदान भी नहीं है। फिर भी मेरी तबाही के लिए तामझाम और शानौ-शौक़त से चले आ रहे हैं। मुझे तो आयोजकों के ‘विवेक’ पर तरस आ रहा है।

मैं तो प्रधान मंत्री के संज्ञान में लाना चाहती हूँ कि मुझे आपकी आस्था और शृद्धा पर तनिक भी अविश्वास नहीं है। आपने देश में डिजिटल युग की शुरुआत की है। आपने कई सभाएँ और प्रोग्राम डिजिटल प्रोजेक्टर्स या वीडियो कोन्फरेंसिंग के माध्यम किए हैं। ऐसा ही कुछ करिए कि आपकी उपस्थिति हो जाए और आपका संदेश भी चला जाए। आप नदियों और पर्यावरण के घोर हिमायती हैं, उसकी दुहाई देते हुए विनम्र आग्रह है कि मुझे लाखों लोगों की ‘गंदगी’ से बचा लें। मेरे चारों तरफ़ के हरे-भरे जंगलों को वाहनों के चकों तले कुचलने से बचा लीजिए। प्लीज़……

मैं आप सबसे दया की भीख माँगती हूँ।

नर्मदा (बाल रूप)
उद्गम स्थल, अमरकण्टक (मप्र)

ज़हीर अंसारी की फेसबुक वाल से साभार